Mon. Sep 7th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

‘हिमालिनी’ के साथ सफरनामा (हिंदी दिवस पर विशेष) : डॉ. मुकेश भटनागर

 

 

दक्षिण एशिया की सम्पूर्ण मासिक पत्रिका

मुकेश भटनागर, वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली, हिमालिनी अगस्त 2021 । मेरी व्यवसायिक जीवन यात्रा “पंजाब नैशनल बैंक” से आरम्भ हुई और सेवानिवृत्ति तक पहुंचते–पहुंचते उसमें कई आयाम जुड़ते गए । अपने ही देश में बहुत से राज्यों में काम किया, अनपढ़, पढ़े–लिखे, बुद्धिजीवी, अमीर–गरीब, साधारण–असाधारण हर तरह के ग्राहकों से सम्पर्क बना, सभी से बहुत कुछ सीखने को मिला । जो सीखा समझा वह आम जनता में बांटने का प्रयास किया । कुछ संस्मरण और एहसास के पलों को पुस्तक का स्वरूप दिया । सेवानिवृत्ति के पश्चात एक खूबसूरत साहित्यिक मोड़ हिमालिनी पत्रिका समुह के साथ मिला जब इत्तफाक से मेरी मुलाकात भारत में नियुक्त उसके चीफ ब्यूरो और वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेन्द्र सिंह डोगरा से हुई । दिसंबर २०१८ में ग्वालियर के एक इन्जिनियरिंग कॉलेज के सभागार में चल रही गोष्ठी में उन्होंने मिडिया से संबंधित अपने प्रेरक प्रसंग सुनायें । विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति, बुद्धिजीवी एवं विद्यार्थियों से खचाखच भरे सभागार में ‘मिडिया का समाजिक दायित्व’ विषय पर उन्होंने विस्तार से चर्चा करी । उनकी पेशकश ने सभी को प्रभावित किया और मुझे भी एक नई दिशा मिली । कुछ समय पश्चात उन्होंने मुझ से एक साक्षात्कार के लिए अनुरोध किया । 

जमीनी हकीकत से जुड़े होने के नाते उन्होंने साक्षात्कार को एक प्रेरक गाथा में पेश कर दिया और हिमालिनी के अगस्त २०२० के अक में वह प्रकाशित हुआ । तब पत्रिका के अंतराष्ट्रीय स्वरूप को पहचाना जो काठमांडू नेपाल से प्रकाशित होती आ रही है । यह जान कर अपार प्रसन्नता हुई कि गत जनवरी को २०२१ को पत्रिका 24 वेन वर्ष में प्रवेश कर गई है । अगला वर्ष 25वां वर्ष होगा । सिल्वर जुबली वर्ष स्वयं में एक मील का पत्थर व महत्वपूर्ण पड़ाव होता है । पिछले एक वर्ष में मैंने पत्रिका में प्रकाशित सभी आलेखों को एव सामग्री को ध्यान से पढ़ा, देखा और समझा । प्रकाशित लेखों में पत्रिका की गुणवत्ता साफ झलकती है जो पाठकों को न केवल रुचिकर अपितु उनकी विचारधारा को ओर प्रबल व नयी दिशा प्रदान करती हैं । 

यह भी पढें   नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका से क्यों मांगा ‘क्लाइमेट मुआवजा’ ? क्या यह सचमुच कानूनी हक है ?

 

इसका मुख्य श्रेय सम्पादक सुश्री डॉ श्वेता दीप्ति, समस्त सम्पादक मंडल, विशेष संवाददाता (नेपाल तथा भारत) एवं प्रबंध निदेशक श्री सच्चिदानंद मिश्र को देता हूं । डॉ दीप्ति के सम्पादकीय खण्ड, विचार एवं आवरण आलेख बड़े सारगर्भित और प्रभावशाली हैं । 

 

जीवन की अब तक की यात्रा में मुझे बहुत से मुसाफिर मिले, कुछ मुझे समझ पाये, कुछ को मैं नहीं समझ पाया और कुछ समझ कर भी अनजान बने रहें लेकिन समझने और सरहाने वालोें की संख्या उनके मुकाबले कहीं अधिक रहीं । जो व्यक्ति नहीं समझ पायें वो अधिक प्रिय लगे । वे ही अंततः ज्योर्तिमय साबित हुए । हम अक्सर भूल जाते हैं दीपक की लौ निःसंदेह रोशनी देती पर उसके ठीक नीचे अंधेरा होता है । उस अंधेरे का भी अपना अभिमान होता है । उसी अभिमान के ऊपर बहुत उजाला है । व्यक्ति को वहीं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां से उजाला चारों ओर हो रहा था । 

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 7 सितंबर अगस्त 2026 सोमवार शुभसंवत् 2083

उजाला सदैव विकास का मार्ग प्रशस्त करता है । किसी के लिए विकास व्यक्तिगत होता है तो किसी के लिए सामुहिक तथा मानवता के लिए । अपनी कर्मभूमि पंजाब नेशनल बैंक में कार्य करते हुए यह बखूबी एहसास हुआ कि दृष्टिकोण क्या होता और बड़ा सपना क्या होता है । लाला लाजपतराय ने जो सपना २४–२५ वर्ष की उम्र (१८९०) में देखा वह उन्होंने अपने हमख्याल रखने वाले ७ अन्य साथियों से मिल कर (१८९४) देश का पहला स्वदेशी बैंक खोला । २०२१ में पंजाब नैशनल बैंक के स्थापना के १२७ वर्ष हो गये । इस बैंक ने कई उतार चढ़ाव देखें परन्तु जब प्रबंधन की नींव सुदृढ़ हो तो विकास की गति रुक नहीं सकती । ऐसा परिदृश्य हिमालिनी पत्रिका के लिए देख पा रहा हूं । पत्रिका भारत और नेपाल के बीच एक वैचारिक सेतु बनाने में कारगर साबित हुई है । 

 

बीते १२ महीनों के अंकों को जब में देखता हूं तो मुझे अनायास ही मार्च २०२१ के अंक पर ध्यान जाता है । यह अंक अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस विशेषांक था । डॉ दीप्ति ने अपने आवरण लेख ‘नारी नहीं, बस हमें इंसान रहने दो’ बड़ी आत्मीयता एवं सहजता से लिखा – “नर और नारी दोनों महत्वपूर्ण हैं, दोनों के कार्य महत्वपूर्ण हैं, इसलिए यहां यह सवाल नहीं उठाना चाहिए कि, किसका काम अधिक है और किसका कम । अपनी–अपनी क्षमता के हिसाब से दोनों काम करते हैं और दोनों ही एक अहम् भूमिका का निर्वहन करते हैं । जिस पर समाज और परिवार टिके हुए हैं । समाज के ऊपर भी यह जिम्मेदारी है कि वह समाज और परिवेश की बदलती परिस्थितियों को समझें और उसके अनुसार ही आज की नारी को अवसर प्रदान करें ।” इस उद्घोषक लेख के पश्चात नारी सशक्तिकरण व अस्तित्व की कड़ी बनी उसने पाठकों को निःसंदेह झंझावत कर दिया जैसे – ‘सृष्टि की अनमोल धरोहरः नारी’; ‘नारी सभ्यता की वाहक एवं समाज का दर्पण है’; ‘अपने पर विश्वास रखिए जिन्दगी आपके कदम चूमेगी’; ‘नारी जननी है, संपूर्णता का सशक्त हस्ताक्षर हैं’; ‘शिक्षा के प्रति गंभीर रहें और आत्मनिर्भर बनें; ‘जरूरत है अपनी शक्ति को जानने और पहचानने की’; ‘औरत होना ही हमारी मजबूती है’; ‘महिलाओं को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा’ और अंत में उल्लेख करना चाहूंगा एक अन्य सारगर्भित लेख का – ‘अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करती नारी’ । इन शीर्षकों के अंतर्गत लेखकों ने नारी के प्रति जो भावनाएं, सच्चाई, जमीनी हकीकत, योगदान तथा वर्चस्व व्यक्त किया वह हिमालिनी के माध्यम से पूरे विश्व ने जाना और नारी के प्रति नवचेतना का प्रसार करने में सफल प्रयास साबित हुआ । निःसंदेह पत्रिका इस प्रकार अपना समाजिक दायित्व बखूबी निभाती जा रही हैं ।

यह भी पढें   शिक्षक दिवस पर शांतिनिकेतन आदर्श विद्यालय में शिक्षकों का हुआ सम्मान
मुकेश भटनागर*
*वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाज सेवी*
*दिल्ली, भारत से*

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com