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फिर आया हिंदी दिवस : अनिल कुमार मिश्र

 

हिंदी दिवस

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फिर आया हिंदी दिवस 
रोता-गाता मित्र
हम बसते निज देश में 
धरकर चित्र,विचित्र।
सालों भर अंग्रेज़ी भजें, 
गीता भी आंग्ल में गाएँ
जब आए हिंदी दिवस,
मिलकर मोद मनाएँ।
काहे को हिंदी दिवस,
जब आंग्ल माह और वर्ष 
पल-पल हिंदी घुट रही,
यह कैसा उत्कर्ष ?
अंग्रेज़ी ही सभ्यता,
अंग्रेज़ी जय गान
अंग्रेज़ी भजते रहो,
मिले मान-सम्मान।
हिंदी केवल दिवस भर,
दो घंटे की बात
भाषण जमकर दे दिया,
यह विधि का आघात।
फिर भी दिल मे हिंदी बसे
अंग्रेज़ी परदेश
हिंदी सबकी आत्मा
यह मानस-गणवेश।
हिंदी गरजेगी सदा
यह सबके दिल की बात
सबका प्रेम मिले हिंदी को
हो सदा स्नेह-बरसात!
अनिल कुमार मिश्र
राँची,झारखंड,भारत।

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