उत्तर प्रदेश की राजनीति अब होली खेलेगी : योगेश मोहनजी गुप्ता
योगेश मोहनजी गुप्ता, मेरठ । होली पर्व के प्रारम्भ होने से पूर्व वातावरण पूर्णतया प्रसन्नता, अह्लाद तथा विभिन्न रंगो की खुशबू का अहसास कराना प्रारम्भ कर देता है। इसी प्रकार राजनीतिक चुनावों से पूर्व चुनावी रैलियाँ, नेताओं का दल बदलना, नगाड़ो के साथ जनसम्पर्क करना, समय-समय पर चुनावी सभा का आयोजन करना आदि आगामी चुनावों का आगाज़ करा देता है। भारत का सर्वाधिक वृहद प्रदेश अब राजनैतिक होली खेलने के लिए तत्पर है। यहाँ की सभी छोटी-बड़ी पार्टियों ने अपने राजनैतिक दांव-पेचों को तैयार करना उसी प्रकार प्रारम्भ कर दिया है, जिस प्रकार होली से पूर्व जनता विभिन्न रंगो के गुलाल का संग्रह करना प्रारम्भ कर देती है। यह राजनीतिक होली रंगो तक ही सीमित रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है इसके विपरीत यदि इसमें कीचड़ उछलना प्रारम्भ हो गया तो इसका दुष्प्रभाव किस सीमा तक होगा, इसकी कल्पना चुनावी प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से (अर्थात् 4 माह पूर्व) नहीं की जा सकती, परन्तु जिस प्रकार चुनावों से पूर्व ही परस्पर कटाक्ष किया जाना प्रारम्भ हो चुका है उससे यही आशंका प्रकट होती है कि इस बार राजनीतिक पतन की कोई सीमा शेष नहीं बचेगी।
वास्तव में राजनीति अब मात्र एक सेवा कार्य न होकर एक व्यवसाय बन चुकी है। देशप्रेम अथवा राज्य प्रेम की भावना सिर्फ चुनावी जीत के लिए लगाए गए नारों में ही प्रदर्शित होती है। नेता के लिए परिवार प्रेम, जाति प्रेम एवं स्वहित प्रेम ही सर्वोपरी हो गया है, अतः येन-केन-प्रकारेण चुनावों को जीतना राजनेताओं का प्रमुख उद्देश्य बन गया है।
अब हम उत्तर प्रदेश में वर्ष 2022 में चुनावी होली खेलने वाले राजनेताओं पर दृष्टिपात करें तो मुख्यतः भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस, लोकदल, आप, अमीम, ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, राकेश टिकैत की भारतीय किसान यूनियन, चन्द्रशेखर की आजाद समाज पाटी हैं। इनमें से किस-किसका गठजोड़ बनेगा यह कहना मुश्किल है, परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि इनमें कुछ छोटी पार्टियों का एक मात्र उद्देश्य स्वहित को वरीयता देना है। यदि हम ओवेसी की पार्टी को देखें तो उनका उत्तर प्रदेश में कोई भी राजनीतिक अस्तित्व नहीं है परन्तु यह निश्चित है कि वे किसी बड़े दल को सहयोग देने के लिए ही अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारेंगे। ओम प्रकाश राजभर और कश्यप का यही प्रयास होगा कि वे 8-10 सीटों पर जीत प्राप्त करने के पश्चात जिस पार्टी का भी पलड़ा भारी देखेंगें उससे राजनीतिक समझौता करके अपने हित की पूर्ति करेंगे।
बसपा की प्रमुख नेता सुश्री मायावती यह भलीभांति जानती है कि उनका राजनीतिक करिश्मा अब समाप्ति की ओर है। उनकी पार्टी के लोग भी उनको पूर्णतया समझ चुकें हैं और जैसा कि उनके बारे में सुना जाता है कि वो टिकट बेचती हैं, यदि इस तथ्य में तनिक भी सच्चाई है तो सम्भवतया इस बार उनको पार्टी के टिकट का कोई भी खरीदार नहीं मिल पाएगा। कांग्रेस पार्टी भी अपना जनाधार पुनः प्राप्त करने का पूर्ण प्रयास करेगी। इसके लिए प्रियंका गांधी एव राहुल गांधी राजनैतिक मैदान में उतर चुके हैं। राहुल जी ने तो जीत के लिए मंदिरों में देवी-देवताओं के दर्शन करने भी प्रारम्भ कर दिए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वे ब्राह्मण वोटरो को अपने साथ लाने का पूर्ण प्रयास करेंगे, क्योंकि वर्तमान में वे भाजपा पार्टी से रुष्ट हैं।
चन्द्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण एक युवा नेता हैं और वे राजनीति में बहुत ही सक्रिय हैं। उन्होंने पिछड़ी जातियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है यह चुनाव वे स्वतंत्र रूप से अथवा सपा के सहयोगी के रूप में लड़ेंगे इसका प्रकटीकरण अभी शेष है, परन्तु यह निश्चित है कि बसपा की कब्र खोदने में उनकी प्रमुख भूमिका रहेगी। आप पार्टी भी उत्तर प्रदेश में दस्तक दे रही है, इसकी मुख्य भूमिका में संजय सिंह रहेंगे। उनकी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल एक वैश्य है। दिल्ली में उन्होंने अपनी अच्छी छवि बनाई हुई है। इससे यह सम्भावना है कि वे वैश्य बाहुल्य की कुछ सीटों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर पायें। भारतीय किसान यूनियन ने भी किसानों के हित के लिए अत्यधिक संघर्ष किया है और जाट बाहुल्य क्षेत्रों में निःसन्देह उनका प्रभाव है, परन्तु अभी यह अनिश्चत है कि वे सपा अथवा लोकदल के साथ मिलकर भाजपा को नुकसान पहुँचाएगें अथवा अपना अस्तित्व अलग से स्थापित करेंगे। वह कितनी सीटों पर जीतेगे यह तो अनिश्चित है परन्तु उनके द्वारा लोकदल को समाप्त कर भाजपा को परोक्ष रूप से लाभ पहुँचाना निश्चित है।
इन चुनावों में सपा, भाजपा का मुख्य विरोधीदल होगा। सपा की हार अथवा जीत छोटे दलों के व्यवहार पर भी निर्भर करेगी, साथ ही यह भी निश्चित है कि वे मुस्लिम, यादव एवं 5/6 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट भी अवश्य प्राप्त कर लेंगे। दूसरी ओर भाजपा का प्रमुख चेहरा योगी जी और मोदी जी ही होंगे। उनके पास जहाँ विगत पाँच वर्षो के कार्यकाल की योगी जी के नेतृत्व की उपलब्धि और मोदी जी का लोकप्रिय चेहरा जनता को आकर्षित करेगा, वहीं दूसरी ओर ठाकुर तथा वैश्यों का भी समर्थन प्राप्त होने की आशा है। इसके इतर संघ का निष्ठावान कार्यकर्ता जो हर चुनौती का सामना करने के लिए तत्पर रहता है वो भी भाजपा को शक्ति प्रदान करेगा। अतः मुख्य मुकाबला भाजपा तथा सपा का ही होगा। तनिक भी वोटरों के झुकाव की अधिकता ही किसी भी पार्टी की जीत के लिए निर्णायक सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

चेयरमैन
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ, भारत

