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“राजनीति की खिचडी” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा

 

व्यग्ंय- बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बिरगंज । ईस देश मे सिर्फ मकर संक्रांति के दिन ही नहीं बांकी ३६४ दिन भी खिचडी पकती रहती है । वह भी ऐसी वैसी खिचडी नही षडयंत्र की घी से लबालब राजनीति की खिचडी जो नेतागण बाह्रो मास खाते और खिलाते रहते हैं । जिस तरह वीरबल की खिचडी पकी नहीं उसी तरह ईस देश के नेता और मंत्री भी विकास की खिचडी पकने नही देते और जनता बेचारी भुखी रह जाती है । वीरवल की खिचड़ी में चूल्हे के आंच से खिचडी पकाने वाले वर्तन की बहुत दूरी बहुत ज्यादा थी ईसी लिए खिचडी पक नही पायी थी । उसी तरह देश विकास नाम की खिचडी से योजना और लगानी रुपी आंच की दूरी बहुत ज्यादा है जिसमे नेताओं का कुनियत का चारों तरफ फैल जाता है और जनता बेचारी आगे का कुछ देख नहीं पाती और दिग्भ्रमित हो जाती है ।
यह राजनीति की खिचडी नेताओं के लिए बहुत माफिक और स्वादिष्ट होती है जिसमें वह अपनी ईच्छा से भरपूर घी और दही डालते है और देश के जनता की मजबुरियों को पापड की तरह सेंक कर उनके आंसुओं में अचार जैसा चटखारे ले-ले कर बडे मजे से खाते है । जनता बेचारी के भाग में खिचडी का वह भगौना ही आता है जिसके पेंदी में खिचडी जल कर काली हो जाती है । फिर भी विकास के निम पर उसी जली हूई खिचडी को खा कर भी जनता बेचारी संतोष कर लेती है कि चलो शुक्र है कुछ तो खाने को मिला ।
सत्ता के गलियारे में राजनीतिक उठापटक और षडयंत्र की खिचडी जो हर दिन पकती है उसका तो कहना ही क्या 👌 वह खिचडी बहुत लजीज़ होती है । ईस खिचडी में खाने वाले से ज्यादा खिलाने वाले खुश रहते हैं । जिसको सत्ता पाने की छटपटाहट होती है और जो सत्ता से बाहर है उसकी बेबसी कोई नहीं जान पाता । ईसी लिए वह अपनी बेबसी और गुस्सा खिचडी की माध्यम से निकालता है । सत्ता का खेल बनाने और बिगाड्ने के लिए सांसद खरिद बिक्री ईसी खिचडी को तेज आंच पका कर किया जाता है । जिस सांसद या नेता को खरिदा जाता है उस की खिचडी में ‘घी’ बहुत ज्यादा होता है जिसमे वह सांसद खुद ही डुबने लगता है । जिस सांसद के कारण परेशानी हो रही है सत्ता का समिकरण बिगड रहा होता है उसकी खिचडी मे नमक ईतनी तेज कर देते हैं कि वह बेचारा अपनी खिचडी न निगल पाता है न उगल पाता है ।
एक सीधा ईंसान जब टेंढा नेता बन जाता है तब उसको जैसे भी हो मंत्री बनना ही है । अब मंत्री बनने का ल्याकत तो सबके पास है नहीं तो बेचारा क्या करे । वह नेता वीरवल को गुरु मान कर सत्ता की खिचडी पकाना शुरु कर देता है । अब सत्ता ऐसी है की आंच तेज हो तो खिचडी जलने का डर और आंच कम हो तो खिचडी पके ही नहीं । ईसी लिए होशियारी से हौले हौले हिलाते हुए चापलुसी के कलछुल में घी लगा लगा कर सत्ता के सियारों के लिए खिचडी पकायी जाती है । जब खिचडी पक जाती है तब अपनी टेंढी हूई कमर की तरह पापड को भी सेंक कर टेंढा कर देते है । जब ईनके आका यह खिचडी खाने बैठते हैं तब ईनका चेहरा डर के कारण दही जैसा ही सफेद हो जाता है । जिसे देखते हुए राजनीति के ईनके वरिष्ठ खिलाडी अचार का जैसा स्वाद ले कर पूरी खिचडी हजम कर जाते । खिचडी के चार यार ऐसे ही नहीं कहा गया है । ‘खिचडी के चार यार दही, पापड, घी, अचार’ ही नहीं है । यह चार यार है ईनकी चापलुसी, बेबसी, गुस्सा और जलन ।
बेचारे वीरवल ने एक खिचडी क्या बनायी पिछले पांच सौ साल से आज तक बेचारे यूं ही बदनाम है । वीरवल ने तो सम्राट अकबर को सीख देने के लिए खिचडी बनायी थी पर उन्हें क्या पता था कि उनकी खिचडी ईतनी मशहुर हो जाएगी वह भी राजनीति और लेटलतीफी के कामों मे । वीरवल तो परमधाम हो गए पर उनका खिचडी है कि अभी तक पक ही रहा है । खिचडी न पकने का कारण एक ही है की खिचडी तक चूल्हे का आंच पहुंचा ही नहीं है । क्यों कि चूल्हा ठंडा है और जली नहीं आंच है ही नहीं ईसी लिए विकास की खिचडी पकती नहीं । हां राजनीति के गलियारे में तो खिचडी पकती है और पकायी और खिलाई भी जाती है । ईसी लिए राजनीति की खिचडी कभी ठंडी नहीं होती । हमेशा गर्मागर्म और स्वादिष्ट राजनीतिक खिचडी तयार है नेताओं का पेट भरने के लिए । 👍

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