“पेट और प्यार” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा,

व्यगंय-बिम्मी कालिन्दी शर्मा, वीरगञ्ज। फरवरी के महिने में सब को प्यार का खुमार चढता है और प्रेमरोगी बन जाते है । अभी निकर पहनना ठीक से आया नहीं, दूध के दांत भी टूटे नहीं खाना मम्मी अपने हाथों से पुचकारते हुए खिलाती है । रात में लोरी सुने बिना नींद नही आती पर छोटे उस्ताद को बैठे बिठाए प्यार हो जाता है । यह प्यार किस मुहुर्त्त में कौन से नक्षत्र में पैर रखने पर होता है ? रोमांस की दूलत्ती खा कर धडाम से गीर जाते है पता नहीं चलता । कमर और बटुआ दोनों को पकडे हुए जैसे तैसे होश में आते है पर ईन्हे प्यार जरुर हो जाता है । पेट भरा हो, बटुए में पैसे खनखन बज रहे हों तो प्यार भी आसानी से हो ही जाता है ।
ईंसान का पहला प्यार तो पेट ही है । भूखे पेट कोई हरि का नाम तो नहीं ले सकता प्यार क्या खाक करेगा ? हां बेरोजगारों के लिए प्यार भी एक टेम्प्ररी रोजगार है जो एक दिन रेस्टोरेंट के बील और मोबाईल के रिचार्च पर शहीद हो जाता है । और प्रेमी या प्रेमिका फूर्र से चीडिय़ा की तरह उड जाते है और दुसरे डाल पर दाना चुगते हुए किसी और के साथ प्यार की पिगें बढाने लगते है । अब प्यार महसुस करने के लिए भावनाओं से लबरेज़ दिल तो है नहीं । तो प्यार भी मैगी की तरह टू-मिनट वाला ‘ईन्सटेंट’ हो गया है । मोबाईल में ही रेडिमेड प्यार हो जाता है और कुछ महिने पहनने ओढ्ने के बाद प्यार की सिलाई उधड जाती हे । प्यार करते समय बिश्वास के धागे से टांके नहीं लगाए थे न ईसी लिए । तो प्यार मजबुत कैसे होता ?
जिस तरह गर्मी, जाडे और बरसात का मौसम होता है । उसी तरह प्यार का भी मौसम होता है जो फरवरी महिने मे आता है । ईस महिने मे हरेक दिन प्यार के नाम पर ईलू-ईलू करते हुए कभी रोज-डे तो कभी चकलेट-डे के नाम पर जेब शहीद हो जाता है । प्यार सस्ता सौदा तो है नहीं की एक किलो गोभी का फूल दे कर अपने प्रेमी या प्रेमिका को खुश कर दें । जो पेट का मारा है वह पेट को ही ढोते हुए जिंदगी गुजार देता है । उसके लिए अपना पेट ही सब कुछ है । हां जिसका पेट भरा है प्यार का ज्यादा नखरा भी वही करता है । नौ महिने मां के पेट में रह कर निकलने के बाद जो उसी पेट को लात मारे और उस कोख को भूल कर किसी पराए या पराई पर अपना तन-मन लुटाए वह प्यार नहीं मतलब का सौदा है ।
प्यार में लोग गमगीन हो जाते हैं । प्रेमी नहीं मिला और मंजिल पर नहीं पहुंच पाए तो आत्महत्या कर के अपना जीवन भी समाप्त कर देते हैं । उस समम किसी मां जाए को अपनी मां की याद नहीं आती न उस पहले पेट का ही जंहा वह नौ महिना रह कर ईस दुनिया में आया । बस प्यार के नाम पर किसी कजरारी आंखवाली या बाईक पर सवार कोई हैंडसम ही एक दुसरे की तरफ आकर्षित होते हैं । कोई भी लडकी अपना जीवनसाथी या प्रेमी किसी मजदुर को नहीं बनाती । उसके सपनें में कोई कारवाला ही घोडे पर सवार हो कर आता है । और लडका भी किसी सब्जी बेचनेवाली या बर्तन मांझनेवाली को अपना दिल नहीं देता न उसके सपने या ख्यालों में ऐसी कोई लडकी प्रेमिका या जीवनसाथी के रुप में नही आती । सब को सजा संवरा सुंदर सम्पन्न और रेडिमेड प्यार ही भाता हे । गोबर के उपले थापनेवाली ‘गोबरमती’ किसी को पसंद नहीं आती । उस से तो गोबर की बदबू आती है प्यार तो असंभव है ।
प्यार को मानते सभी हैं पर जानता कोई नहीं । साहित्य या सिनेमा में प्रेम कहानी पढ सुन और देख कर भावुक होने वाले जब असल जिंदगी म़े अपना ही कोई प्यार के नाम पर पागल हो जाता है तो यही लोग अपनी आन बान और शान के लिए तरवारे खींच लेते है और प्यार का गला घोंट देते है । यह पाखण्डी लोग जात और धर्म की दुहाई दे कर प्यार को नफरत में बदल देते हैं । फिर कुछ समय बाद ऐसा ही कोई प्रेम कहानी वाली सिनेमा देख कर भावुक हो जाते हैं और जार-जार रो कर नौटंकी करते है ।
प्यार संवेदना की मांग करता है । पर हमारे समाज में संवेदनाहीन लोग ही ज्यादा है वह प्यार और उसकी भावनाओं को क्या समझेगें ? प्यार बाद मे हैं पहले पेट है । पेट ही पाप कराता है और पेट ही पूण्य और प्यार भी । पेट भरा हो तो प्यार ही नहीं दुनिया में और भी बहुत कुछ हो सकता है । पर पेट भूखा या खालि हो तो यह सिर्फ अपराध ही करवाएगा । अब प्यार के नाम पर ‘रोज-डे’ नहीं रोजगार -डे होनी चाहिए । जो प्यार को परवान चढा सके । गुलाब का एक फूल दे कर प्रेम प्रस्ताव करने से एक दिन बित सकता है पर जिंदगी नहीं । और जिंदगी बिताने के लिए सभी को ‘रोज’ नही रोजगार चाहिए तभी प्रेमी प्रेमिका जीवन भर खुश रह सकेगें । ईसी लिए प्यार से ज्यादा जरुरी पेट है और पेट ही पहला प्यार भी है ।
फरवरी का महिना,
प्यार करे शोर,
जियरा ऐसे घुमे,
जैसे चितचोर ! ❤️💛💚 ☺️😊

