किसी भूगोल का राजनैतिक बंटवारा होता है भाषा और संस्कृति का नहीं : सुदर्शनलाल कर्ण
सुदर्शनलाल कर्ण, जनकपुर धाम, |संसार मे किसी भूगोल का राजनैतिक परिवर्तन मारकाट अथवा सन्धि से होता आया है यह एतिहासिक सत्य है । पृथ्वी नारायण शाह के गोरखा राज्य विस्तार से पहले जनकपुरधाम मकमानपुर राज्य मे था । मकमानपुर राज्य की सीमा पूरब मे टिष्टा से नारायणी नदी तक, काठमांडू उपत्यका के दक्षिणी भाग से भारत का चम्पारण मुजफ्फरपुर दरभंगा, जलपाईगुडी जिलों के उत्तरी भाग तक फैला हुआ था । तो स्पष्ट है नेपाल का प्रदेश न २ तत्कालीन मकमानपुर राज्य का ही भाग है । यहां की भाषा और संस्कृति वही होगी जो मकमानपुर राज्य के समय थी क्योंकि राजनैतिक नामाकरण भूमि का हो सकता है पर भाषा और संस्कृति का नहीं होता है ।
मकमानपुर राज्य नेपाल अंतर्गत आ गया । फिर भारतीय कम्पनी सरकार और नेपाल सरकार के बीच सन् १८१६ सुगौली सन्धि तहत पुनः सीमा निर्धारण हुआ । मिथिला भी दो भागो में बंट गया । मैथिली भाषा और संस्कृति नेपाल और भारत में भी होना स्वाभाविक ही है । तो प्रश्न है क्या इस नेपाल की अन्य भाषा और संस्कृति नेपाल भारत की सीमा (दस गज्जा) मे अटक नहीं सकती है । चम्पारन और मुजफ्फरपुर दरभंगा जलपाईगुडी की अपनी अपनी भाषा रही होगी । मातृभाषा जो भी रही हो सम्पर्क भाषा हिन्दी ही रही होगी । तो सवाल है नेपाल में हिन्दी भाषा उपेक्षित क्यो है ? उपेक्षित हिन्दी इसलिए नही कि हिन्दी भारत मे बोली जाती है । मैथिली और भोजपुरी भी तो भारत मे बोली जाती हैं । सच तो यह है कि खस भाषा का विकसित रूप नेपाली भाषा को नेपाल मे विशेष महत्व दिया जाना है । पर हिन्दी भाषा को नेपाल मे सरकारी स्तर से मान्यता देने पर नेपाली भाषा यहाँ कमजÞोर हो सकती है । यह सच है कि हिन्दी नेपाल मे तराई पहाड़ सभी जगह बोली जाती है ।
नेपाल मे सरकारी स्तर से खास कर शैक्षणिक संस्थानों मे युवाओं को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि नेपाली भाषा ही यहाँ महत्वपूर्ण है और यही भाषा उन्हें रोजी रोटी दे सकती है । नेपाल के युवक–युवती और गुरुवर यहाँ की अन्य भाषा की तुलना मे नेपाली भाषा को महत्व देने के लिए बाध्य है । भारत के दार्जीलिंग और सिक्किम मे रहने वाले नेपाली भाषी को भी सहज रूप से नेपाल मे राष्ट्रीयता और नागरिकता प्राप्त हो जाता है । पर मैथिली, भोजपुरी और मगही भाषी का जन्म भले ही नेपाल सीमा के अन्दर हुआ हो उनके नागरिकता पर शंका राज्य की ओर से किया जाता है । इस तरंह का भेद भाव देश विकास में बाधक तो होता ही है और यह विभेद ना जाने कितने सि के राउत को जन्म दे सकता है ।


