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आज अपने ही अस्तित्व की तलाश में नारी : निशा अग्रवाल

 

नारी : विचार मंथन

निशा अग्रवाल, धरान । नारी सृष्टि है ,नारी प्रकृति है ,नारी जननी है, जीवनदायिनी है। नारी के बिना सृष्टि का ही अस्तित्व नहीं तो कोई कैसे बांधे शब्दों में नारी की भूमिका। तुलसीदास जी के शब्दों में कहूं तो पूरी धरती को कागज बना लूं और समुद्र की स्याही बनाकर सभी वृक्षों की अगर मैं लेखनी बना भी लूं तो भी नारी की भूमिका स्पष्ट नहीं की जा सकती क्योंकि नारी के बिना सब अधूरा है।

यह पूरा ब्रह्मांड पुरुष और प्रकृति से बना है। प्रकृति यानी नारी। अब विडंबना यह है कि पुरुष संसार में अपनी भूमिका जानता है ,मानता है और जताता भी है। और नारी जताना तो बहुत दूर की बात यथार्थ में जानना भी नहीं चाहती है, ना मानती ही है।

नारी शक्ति स्वरूपा दुर्गा है तो माया स्वरूपा लक्ष्मी भी है। नारी विद्यादायिनी सरस्वती है तो भक्तिदायिनी तुलसी भी है। दुष्टों का संहार हेतु काली है नारी ,संतानों के पालन हेतु अन्नपूर्णा है नारी। नारी एक भाव है ,जो दया ,करुणा ,ममता ,कृपा के रूप में जन-जन में प्रवाहित है। नारीत्व एक गुण है जो इंसान को मृदु, कोमल और सहज बनाता है ।पत्थर की इस दुनिया को जीवंत बनाती सुगंधित -सुवासित बयार है नारी ।अपने आसपास के सभी विषमताओं के कांटो को समेटती झेलती फिर भी सहजता से खिला सुंदर सुगंधित कोमल पुष्प है। देह को जीवन देती प्राण है नारी ।नारी चंद शब्दों में वर्णित हो जाए वह चरित्र नहीं वह तो विचारणीय है।

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पर विडंबना यह है कि जिसे अपनी आभा अपने अस्तित्व से गौरवान्वित होना चाहिए था वह आज अपने ही अस्तित्व की तलाश में भटक रही है ।पुरुष हमेशा शारिरिक बल में आगे रहा और स्त्री मानसिक और चारित्रिक रूप से ।पर इतनी सक्षम होने के बावजूद कब उसने पुरूष के शारीरिक बल के आगे घुटने टेक दिए ,उसे खुद को पता ना चला।

नारी जीवन ने सदियों से पुरुष के अहंकार का सामना किया है । फिर भी नारी ने आज हो या कल हमेशा अपने आप को साबित किया है। आज नारी हर क्षेत्र में ऊंचाइयों को छू रही है। जमीन से लेकर आसमान तक, आसमान से लेकर अंतरिक्ष तक, चाहे कोई भी क्षेत्र हो । नारी ने हर जगह अपनी सफलता के झंडे लहराए हैं।

हमारे तो देश की राष्ट्रपति भी सुश्री विद्या देवी भंडारी एक महिला ही है। आज बेटियों को तो हर कोई प्रेरित कर रहा है ।जरूरत है आज अपनी बहुओं को प्रेरित करने का ताकि उनकी प्रतिभा विवाह के बाद घर और बच्चे की जिम्मेदारियों में खो ना जाएं। और इसका सबसे बड़ा बड़ा उदाहरण आज हमारे सामने प्रेमलता अग्रवाल जी हैं। जिन्होंने 50 की उम्र में दो बेटियों की मां होते हुए भी ना केवल माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की बल्कि सेवन सम्मिट भी किया। हमारे समाज में यह कोई छोटी बात नहीं है ।यह इतनी बड़ी उपलब्धि उन्हें उनके आत्म- बल और पारिवारिक सहयोग से प्राप्त हुआ। यह तो आज की बात हुई, ऐसे हजारों उदाहरण हमारे इतिहास में हैं जो नारी शक्ति का विश्लेषण करते है। जब भी नारी ने अपने अस्तित्व को पहचाना है उसने हर असंभव कार्य कर दिखाया है। आदिकाल से नारी अपने घर परिवार को संभालती और सवांरती आई है उसी की मेहनत से उसी के त्याग के बल पर बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किए। पर कभी भी, कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर, नारी के बलिदान को, नारी की निस्वार्थ सेवा और कर्तव्य परायणता का सही आंकलन नहीं किया गया। वह हमेशा मौन और अदृश्य ही बनी रहे। परंतु उसकी सहनशक्ति उसकी धैर्य धारण करने की शक्ति को जब चुनौती दी गई उसकी भावनाओं को जब कुंठित किया गया, तब वही नारी मुखर हो उठी।

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दुर्गा हो, लक्ष्मी हो या शारदा, वह हम सब में अंश रूप में सन्निहित है ।जरूरत है उसे जागृत करने की ।नारी को समझना होगा कि वह केवल पूजा का ‘दिया’ नहीं,वह वो प्रचंड अग्नि है जो लंका जला सकती है। नारी का नारीत्व खुद में ही इतना गर्विला है कि उसे किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं। अपने अंतर की कस्तूरी को पहचानो।अपनी आभा से तुमने जगत को देदीप्यमान किया है। अब समय है तुम खुद को उजागर करो। आज की नारी केवल अपने घर परिवार तक ही सीमित नहीं वह अपने प्रतिभाओं से समाज देश और विश्व में अपना परचम लहरा रही है फिर भी अभी बहुत जागरूकता की जरूरत है। हर नारी को जागने की जरूरत है। उसे अपने होने के अर्थ को समझना होगा। और अपने साथ साथ हर नारी को प्रोत्साहित करना होगा हर नारी को अंधेरे से निकालना होगा उसे उसे सम्मान से और स्वाभिमान से जीना सिखाना होगा जानती हूं यह सब इतना आसान नहीं पर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चलें तो यह रास्ते भी तय हो ही जाएंगे।

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नारी को कहीं भी बाहर अपने अस्तित्व की तलाश करने की जरूरत नहीं उसे अपने ही अंदर अपने ही मंथन की जरूरत है नारी के बिना न सृष्टि में कुछ था न कुछ है ना होगा।

निशा अग्रवाल

 

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