‘मै सक्षम हूँ’ खुद को इस बात का यकीन दिलाएँ : डॉ श्वेता दीप्ति
अन्तरराष्ट्रीय नारी दिवस की शुभकामनाओं के साथ एक चिन्तन महिला सशक्तिकरण पर । आखिर क्यों आवश्यक है महिला सशक्तिकरण ?
आज के आधुनिक समय में महिला सशक्तिकरण एक विशेष चर्चा का विषय है। हमारे आदि – ग्रंथों में नारी के महत्त्व को मानते हुए यहाँ तक बताया गया है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते है।लेकिन विडम्बना तो देखिए नारी में इतनी शक्ति होने के बावजूद भी उसके सशक्तिकरण की अत्यंत आवश्यकता महसूस हो रही है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का अर्थ उनके आर्थिक फैसलों, आय, संपत्ति और दूसरे वस्तुओं की उपलब्धता से है, इन सुविधाओं को पाकर ही वह अपने सामाजिक स्तर को ऊँचा कर सकती हैं।
श्री श्री रवि शंकर जी का कहना है, कि “यदि महिलाओं को सामाजिक असमानता, पारिवारिक हिंसा, अत्याचार और आर्थिक अनिर्भरता जैसे विकारों से छुटकारा पाना है, तो इसके लिए महिला सशक्तिकरण की बहुत जरुरत है।
पहले ‘मै सक्षम हूँ’ इस बात का महिलाओं ने खुद को यकीन दिलाना जरुरी है। मै एक स्त्री हूँ इस आत्मग्लानि में ना रहें। जब आप आत्मग्लानि में आते हो तब आपकी ऊर्जा, उत्साह और शक्ति कम होने लगती है। अध्यात्म का मार्ग एक ही ऐसा मार्ग है जहाँ आप आत्मग्लानि और अपराधी भाव से मुक्त हो सकती हैं। आत्मग्लानि और अपराधी भाव – इन दोनों में हम अपने मन के छोटेपन अनुभव करते हैं। जिससे आप अपनी आत्मा से और दूर जाती हैं।
खुद को दोष देना बंद कर खुद की तारीफ करना शुरू करें। तारीफ करना दैवीय गुण है, है ना? मै स्त्री हूँ, अबला हूँ, ऐसी सोच भी कभी मन में ना लायें। ऐसी आंतरिक असमानता से कुछ भी हासिल नही होगा। आप डटकर खड़ी हो जायें, अपने अधिकार प्राप्त करने हेतु जिस क्षमता की जरुरत है वह सब आप में है। निःसंदेह समाज में बदलाव आना भी चाहिये। लेकिन आत्मग्लानि के भाव में रहकर यह बदलाव आप नही ला सकतीं।”
हमारे आस-पास महिलायें,सहृदय बेटियाँ , संवेदनशील माताएँ, सक्षम सहयोगी और अन्य कई भूमिकाओं को बड़ी कुशलता व सौम्यता से निभा रही हैं। लेकिन आज भी दुनिया के कई हिस्सों में समाज उनकी भूमिका को नजरअंदाज करता है। इसके चलते महिलाओं को बड़े पैमाने पर असमानता, उत्पीड़न, वित्तीय निर्भरता और अन्य सामाजिक बुराइयों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। सदियों से ये बंधन महिलाओं को पेशेवर व व्यक्तिगत ऊंचाइयों को प्राप्त करने से अवरुद्ध करते रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण आज के युग में विकास और अर्थशास्त्र में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। क्योंकि प्राचीनकाल से यह देखा जा रहा है, की समाज में महिलाओं को पुरुषों के समक्ष तुच्छ समझा जाता था, तथा सती प्रथा, दहेज़ हत्या जैसी बहुत सी कुरीतियाँ समाज में फैली हुई थी। और महिला सशक्तिकरण किसी विशेष राजनीतिक या सामाजिक संदर्भ में अन्य मुद्दों से संबंधित दृष्टिकोणों को भी इंगित कर सकता है।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से तात्पर्य महिलाओं को संसाधनों, परिसंपत्तियों, आय और अपने स्वयं के समय के साथ – साथ जोखिम या कठिनाइयों को नियंत्रित करने और उनके प्रबंधन और जोखिम को प्रबंधित करने के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करने की क्षमता से लाभ उठाने का अधिकार है।
‘सशक्त महिला, सशक्त समाज’ देश के विकास में दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। देश में महिलाओं का सशक्तिकरण होना आज की महती आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण यानी महिलाओं की आध्यात्मिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक शक्ति में वृद्धि करना। महिलाएं शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला व संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान व प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में भागीदारी करती हैं। देश में महिलाओं को सशक्त बनाने वाली सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है और ना ही स्त्री विमर्श करने वालों की। फिर भी लगता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह व्यवहारिक जीवन में हमारे आसपास के परिवेश में नजर नहीं आ रहा है।
सच तो यह है कि कुछ योजनाएं और जागरूक करने वाले विज्ञापन समाज में महिलाओं की स्थिति ना तो बदल पाए हैं और ना ही बदल पाएंगे। अगर सामाजिक-पारिवारिक और वैचारिक बदलाव आए तो शायद महिलाओं की समस्याएं कुछ कम हों। साथ ही, विचारों के इस परिवर्तन को व्यव्हार में भी लाया जाए।
कभी-कभी लगता है कि हमारे आस-पास बहुत कुछ बदल तो रहा है पर ये बदलाव सतही ज्यादा हैं। महिलाएं कामकाजी तो बन रही हैं पर सुरक्षित घर लौट आने की गारंटी नहीं है। एक पढ़ी-लिखी मां भी बेटी को जन्म देने का निर्णय खुद नहीं कर सकती। यही वजह है कि जो बदलाव आए हैं, वे भी पूरी तरह से महिलाओं के पक्ष में ही हों ऐसा नहीं है। इसीलिए वैचारिक बदलाव जब तक हमारे व्यव्हार का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण का नारा बस खेल ही बन कर रह जाएगा।
स्त्री को सृजन की शक्ति माना जाता है अर्थात स्त्री से ही मानव जाति का अस्तित्व माना गया है। इस सृजन की शक्ति को विकसित-परिष्कृति कर उसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, विचार, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, अवसर की समानता का सु-अवसर प्रदान करना ही नारी सशक्तिकरण का आशय है।
महिला सशक्तिकरण के बिना देश व समाज में नारी को वह स्थान नहीं मिल सकता, जिसकी वह हमेशा से हकदार रही है। महिला सशक्तिकरण के बिना वह सदियों पुरानी परम्पराओं और भेदभाव से लोहा नहीं ले सकती। बन्धनों से मुक्त होकर अपने निर्णय खुद नहीं ले सकती। स्त्री सशक्तिकरण के अभाव में वह इस योग्य नहीं बन सकती कि स्वयं अपनी निजी स्वतंत्रता और अपने फैसलों पर आधिकार पा सके।
कम ही सही किन्तु बदलते समाज में महिला सशक्तिकरण के कारण महिलाओं की जिंदगी में बहुत से बदलाव हुए।
(i) महिलाओं ने हर कार्य में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू किया है।
(ii) महिलाएँ अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद कर रही हैं।
(iii) महिलाएँ अपने हक के लिए लड़ने लगी हैं और धीरे धीरे आत्मनिर्भर बनती जा रही हैं।
(iv) पुरुष भी अब महिलाओं को समझने लगे हैं, उनके हक भी उन्हें दे रहें हैं।
(v) पुरुष कुछ हद तक महिलाओं के फैसलों की इज्जत करने लगे हैं। कहा भी जाता है कि – हक माँगने से नही मिलता छीनना पड़ता है और औरतों ने अपने हक अपनी काबिलियत से और एक जुट होकर मर्दों से हासिल कर लिए हैं।
महिला सशक्तिकरण महिलाओं को वह मजबूती प्रदान करता है, जो उन्हें उनके हक के लिए लड़ने में मदद करता है। हम सभी को महिलाओं का सम्मान करना चाहिए, उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए। इक्कीसवीं सदी नारी जीवन में सुखद सम्भावनाओं की सदी है। महिलाएँ अब हर क्षेत्र में आगे आने लगी हैं। आज की नारी अब जाग्रत और सक्रीय हो चुकी है। किसी ने बहुत अच्छी बात कही है “नारी जब अपने ऊपर थोपी हुई बेड़ियों एवं कड़ियों को तोड़ने लगेगी, तो विश्व की कोई शक्ति उसे नहीं रोक पाएगी।” वर्तमान में नारी ने रुढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ना शुरू कर दिया है। यह एक सुखद संकेत है। लोगों की सोच बदल रही है, फिर भी इस दिशा में और भी प्रयास करने की आवश्यकता है।


