आखिर कब तक –
“मेरा जनाजा निकला, सब निकले, लेकिन वे नहीं निकले, जिनकी खातिर मेरा जनाजा निकला”
प्रो. नवीन मिश्रा:दलों के प्रत्याशियों के बीच टिकट पाने की होडÞबाजी चल रही है, वहीं दूसरी ओर वैद्य समूह -माओवादी) का दावा है कि हमारी पार्टर्ीीो अनदेखा करके नियत समय पर चुनाव सम्पन्न कराना असम्भव है। बीच-बीच में चल रहे क्रियाकलाप भी नियत समय पर चुनाव होने की सम्भावना को क्षीण करते नजर आ रहे हैं। तो क्या संविधान सभा की तर्ज पर ही अंतिम समय में क्या संविधान की तारीख बढÞा दी जाएगी। सवाल है कि आखिर कब तक चलेगा यह राजनीतिक ड्रामा और देश कब तक राजनीतिक अस्थिरता की धुरी में पीसता रहेगा। देश में बहुदलीय प्रजातन्त्र की स्थापना के बाद हुए पहले आम चुनाव में जनता ने अपनी सुलझी हर्ुइ मानसिकता का परिचय देते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। संसदीय प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के लिए उन्हीं बातों की आवश्यकता होती है। पर्ूण्ा बहुमत प्राप्त दल की सरकार और सशक्त विपक्ष। जनता ने इन दोनों बातों का खयाल रखते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग कर नेपाली कांग्रेस को पर्ूण्ा बहुमत प्राप्त सरकार बनाने का मौका दिया था और एमाले को सशक्त विपक्षी दल के रुप में स्थापित किया था। लेकिन दर्ुभाग्य, गिरिजाप्रसाद कोइराला की पर्ूण्ा बहुमत प्राप्त सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी, जिसने देश में अस्थिरता को जन्माया। जबकि पडÞोसी देश भारत में नरसिंह राव की सरकार, बाजपेयी सरकार और दो बार मनमोहन सिंह की गठबन्धन वाली सरकारों ने भी सफलतापर्ूवक अपना कार्यकाल पूरा किया।
संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन कि
या गया। लेकिन उपलब्धि के नाम पर शून्यता ही हाथ लगी। एक शेर है- ‘मेरा जनाजा निकला, सब निकले, लेकिन वे नहीं निकले, जिनकी खातिर मेरा जनाजा निकला।’ संविधानसभा में सब कुछ हुआ, लेकिन वही नहीं हुआ जो होना था। पासपोर्ट काण्ड, भ्रष्टाचार, कदाचार, संविधान सभा की अवधि बढर्Þाई गई, देश और जनता के अरबों रुपए खर्च हुए लेकिन संविधान नहीं बना।
बडÞी प्रसन्नता हर्ुइ, जब देश के सबसे सुशिक्षित व्यक्ति डा. बाबुराम भट्टर्राई प्रधानमन्त्री बने। आशा जागी कि कुछ सकारात्मक कार्य होंगे। लेकिन हुआ क्या – अंत में उन्होंने भी अपनी असक्षमता का परिचय देते हुए सत्ता की बागडÞोर कर्मचारियों के हाथों में सौंप दी। वर्तमान सरकार का गठन तो हुआ था, चुनाव कराने के लिए। लेकिन अवकाश प्राप्त प्रशासकों की तो मानो लाँटरी ही लग गई। कौन बनेगा करोडÞपति या फिर स्लमडाँग मिलिनियम की तर्ज पर। फिर क्या था – शुरु हुआ ट्रान्सफर, पोस्टिंग और नियुक्ति का सिलसिला। यूँ तो आचारसंहिता के नाम पर यह सिलसिला अभी कुछ धीमा पडÞा हुआ है लेकिन आवश्यकता पडÞने पर चुनाव आयोग से अनुमति प्राप्त कर पर्दे के पीछे से काम हो रहा है।
संविधान सभा की तरह ही चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी नेपाली जनता त्रस्त है। चुनाव की तारीख अभी तक १९ नवंबर ही घोषित है लेकिन घोषित तारीख पर चुनाव होगा या नहीं, राजनीतिक दलों के क्रियाकलापों से इस पर संशय बढÞता जा रहा है। अगर चुनाव की तारीख बढÞती है तो यह पहली बार नहीं होगा, दो बार पहले भी संविधान सभा के चुनाव की तारीख टल चुकी है। दूसरे देशों की तुलना में राजनीतिक पार्टियों ने इस नियमित प्रक्रिया को मजाक बना कर छोडÞ दिया है। अब चुनाव अयोग ने भी स्वयं कुछ पार्टियों की इच्छानुसार मतदाता पंजीकरण की अंतिम तारीख एक हफ्ते के लिए बढÞा दी थी। उम्मीदवारों के नौमिनेशन -पर्चा दाखिल) करने की तारीख भी बढÞा दी गई है। इससे यह भी कयास लगाया जा रहा है कि १९ नवंबर की तिथि को हल्के में लिया जा रहा है। इस बीच यह बात भी उभर कर सामने आई है कि उच्च स्तरीय राजनीतिक समिति चुनाव विरोधी पार्टियों को मनाने में जूट गई हैं। वास्तव में यह अपने आप में उस बुनियादी लोकतान्त्रिक विचारधारा के विपरीत है, जो नियमानुसार चुनाव को जरूरी समझती है। वास्तव में इन पार्टियों की चाहना है कि संविधान सभा के चुनाव को टाल दिया जाए। असंतुष्टों की जो मांगें हैं, उन्हें पूरा करना किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। ऐसे में सब से दर्ुभाग्यपर्ूण्ा बात यह है कि कई राजनीतिक पार्टियाँ या तो एक तरह की मांग करती हैं या दूसरी तरह की, लेकिन वे निजी स्वार्थो के चलते जनता के अधिकार का प्रयोग नहीं होने देना चाहती हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि उन्होंने अपनी मागों को पूरा करने की समय सीमा स्वयं निर्धारित कर रखी हैं। यह एक हास्यास्पद स्थिति है- जिससे जनता का गुस्साना स्वाभाविक है। यह बात तो तय है कि राजनीतिक पार्टियाँ निर्धारित चुनाव का सामना करने से घबरा रही हैं और एक दूसरे के मत्थे कलंक लगा कर १९ नवंबर के चुनाव को टालना चाहती हंै और इस का संकेत है- मतदाता पंजीकरण की आखिरी तारीख को बढÞाना। यह भोज के समय कोम्हरा रोपने जैसा है। अब चुनाव आयोग के सामने समस्या यह है कि उसे मतदाता पंजीकरण के लिए अपनी नीति व तैयारी में बदलाव लाना होगा और ऐसे में शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि चुनाव आयोग अपने इतने व्यस्ततम कार्यक्रमों के बीच नियत समय पर चुनाव करा पाएगा –
जब पूरे देश का जनमानस उद्वेलित हो, तब इस तरह का सरकारी बचाव तीन ही स्थितियों में हो सकता है। एक वर्तमान सत्तासीन वर्ग प्रजातन्त्रिक शर्म व संसदीय जबावदेही को भूल गया हो। दूसरे वह देश की जनता की समझ को ठेंगा दिखाकर यह सोच रहा हो कि क्या कर लोगे – और तीसरा उसकी बुद्धि का पूरी तरह ह्रास हो रहा हो। आज खतरा यह नहीं है कि सत्ताधारी वर्ग सत्ता में बने रहने का औचित्य सिद्ध कर रहा है। खतरा यह है कि इस पूरी प्रजान्त्रिक व्यवस्था पर देशवासियों का विश्वास तिल-तिल कर टूट रहा है। गीता के अध्याय २ के ६२वें और ६३वें श्लोकों में व्यक्ति के पतन की आठ चरणों में क्रमबार विवेचना की गई है और आखिरी श्लोक में कहा गया है कि जब अंत में उसकी बुद्धि का ह्रास होने लगे तो पतन सन्निकट होता है। नेपाली राजनीतिक वर्ग खासकर सत्ताधारी समूह में लगता है कि बुद्धि का लोप हो रहा है। तुलसी ने प्रभुता पाने पर मदांध होने की बात तो कही थी, लेकिन बुद्धि का लोप क्यों होता है, इसे समझने के लिए गीता को देखना होगा। देश में हाल में हर्ुइ कुछ घटनाओं में सत्तापक्ष या उससे जुडे पार्टियों व नेताओं ने जिस तरह अहम मुद्दों पर अपने कर्ुतर्क से अपने को सही सिद्ध करने की कोशिश की है, उससे लगता है कि जनता का प्रजातन्त्र पर विश्वास का आखिरी अबलंवन भी टूट रहा है।
नेपाल का वर्तमान संवैधानिक संकट वास्तव में प्रमुख राजनीतिक दलों की मौलिक सोच में भिन्नता के कारण तथा सत्तावादी मानसिकता और दलों की आपसी गुटबाजी के कारण तथा दल विशेष के कारण किसी प्रकार के निर्ण्र्ाापर न पहुँचने की अक्षमता है। प्रथमतः राजनीतिक दलों खास कर तीन प्रमुख राजनीतिक दलों और मधेशीवादी दल का आन्तरिक कलह और गुटबाजी तथा सत्तालिप्सा इस के मूल कारण हैं। नेपाली कांग्रेस, नेकपा माओवादी, नेकपा एमाले तथा मधेशी दल ही तुलनात्मक दृष्टि से नेपाल की राजनीति के मुख्य कारक घटक हैं। नेपाली कांग्रेस में गिरिजाप्रसाद कोइराला ने अपने दल तथा शासन पर अपना एकछत्र राज्य आजीवन कायम रखा। उनके व्यक्तित्व ने नेपाली कांग्रेस में सभापति पद सम्हाले रखने की उनकी क्षमता को मदद की। ऐसा नहीं है कि उनके समय में दल के अन्दर अनेक गुट उपगुट की गतिविधि नहीं रही लेकिन गिरिजाप्रसाद ने उन्हें भोथरा बनाने में कभी कोई कसर बांकी नहीं रखी। उनके इसी स्वभाव के कारण नेपाली कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई थी। दोनों दलों का विलय तो हो गया लेकिन दूसरा अभी भी कायम है। प्रधानमन्त्री पद किसी दूसरे को नहीं सौंपने के कारण ही उन्होंने अपनी पार्टर्ीीी बहुमत की सरकार को बर्खास्त कर देश को आम चुनाव की आग में तथा नेपाली राजनीति को अस्थिरता के मुँह में धकेल दिया। सुशील कोइराला गुट, शेर बहादुर गुट और रामचन्द्र पौडेल गुट में अभी भी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। एक दूसरे को हराकर आगे बढÞने की प्रवृत्ति स्पष्ट देखी जा सकती है। नेपाल कम्युनिष्ट पार्टर्ीीएमाले में केन्द्र से लेकर गाँव स्तर तक माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल तथा केपी ओली का प्रतिद्वन्द्वात्मक स्तर पर गुटबाजी है। नेकपा -एकीकृत माओवादी) अपने आन्तरिक विरोध के परिणाम स्वरुप दो गुटों में विभाजित हो चुकी है। मधेशी दलों की स्थिति भी आपसी गुटबाजी से ग्रस्त है।
नेपाल की संविधान सभा द्वारा बनने वाले संविधान के निर्ण्र्ााको सरकार निर्माण की सभा बना कर सविधान निर्माण की प्रक्रिया को अपने पथ से सत्ता लोलुपों ने विचलन करने में कोई कसर नहीं छोडÞा। यह स्मरणीय है कि संविधान सभा संसद नहीं था। जनता ने संविधान बनाने के लिए इसका निर्वाचन किया था। अगली संवैधानिक व्यवस्था होने तक मात्र एक काम चलाऊ सरकार का गठन करना था ताकि देश का दैनिक सामान्य कार्य संचालन हो सके। लेकिन इसे अपने दलीय वर्चस्व वाला सरकार बनाने का अखाडÞा बना दिया गया। लोकतान्त्रिक संविधान निरंकुश सत्ता को रोकता है, लेकिन इन लोगों ने संविधान निर्माण को ही निर्वाण प्रदान कर दिया। लोकतान्त्रिक संविधान की भ्रूण हत्या गर्भ में ही करा दी गई। एक दुःखद प्रश्न विचारणीय है, चिन्तनीय है। ऐसे लोगों से क्या आशा की जा सकती है। ताज्जुब नहीं कि सभी दल एक जूट हो समय पर चुनाव नहीं करा पुराने संविधान सभा को ही फिर से पर्ुनजीवित करने का प्रयास करें। िि
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