‘नशा ‘-पुष्पलता सिंह
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, जा खाय बौराय नर बा पाय बौराय,,,,
आदरणीय कवि बिहारी लाल जी द्वारा लिखी ये पंक्तियाँ आज चरितार्थ हो रहीं हैं;जब छोटे छोटे बच्चे नशे में घूमते हैं, तरह तरह का नशा करते घूमते हैं । कभी तो सुनने को मिलता है कि आयोडेक्स, विक्स तक को नहीं छोड़ते हैं । लाल बत्ती पर आकर गाडि़यों के बंद शीशे से झांकते हुए जब पैसा मांगते हैं तो दुःख होता है;ये पीढी, ये समाज, ये देश कहाँ जा रहा है ?
सोच कर भी डर लगता है अगर पीढी यूँ ही नशा करती रही तो आने वाले समय में देश की बागडोर कौन संभालेगा ? धीरे–धीरे ये नशा सभी को जकड़ रहा है ।
सोने की चिडि़या कहलाने वाला भारत अंग्रेजों के हाथ ऐसा बिका की गरीब कहलाने लगा । झोपडि़यों में रहने वालों के पास न खाने को भोजन है न तन ढकने को कपड़ा न रहने को घर,,, वो अपनी भूख मिटाने के लिए नशा का सहारा ले रहे हैं । और जिनके पास पैसा है वो अपनी पोजीशन को बरकरार रखने के लिए नशा कर रहे हैं ।
बड़े शहरों में तो ये शौक बन गया है;जहाँ लड़कियाँ डिस्पोजÞल गिलासों में शराब डाले सामने कुछ नमकींन रखे, अपने हाथ की उंगलियों में सिगरेट फसायें सरेआम पीती हैं, राहगीर भी देखते हुए निकलते हैं । ये कैसा आधुनिक युग है ?
आज इस महंगाई के दौर में दो वक्त की रोटी जुटाना कठिन हो गया है, वही ये पीढी अपने माता पिता के इस पैसे का दुर्पयोग कर रही है , उन्हें धोखा दे रही है;ये कैसी आधुनिकता में जी रहे हैं हम ? शर्म आती है जब लड़कियाँ लड़कों से भी बुरी गाली अपने मुँह से निकालती हैं्र तो क्या इस दिन के लिए हमारे शहीदों ने अपनी शहादत देकर देश को आजÞाद किया था
“नशा शराब में होता तो नाचती बोतल“
आदरणीय अंजान साहब ने सही लिखा है्र
नशे को खत्म करने की पहल हमको ही करनी होगी, धीरे–धीरे ये आने वाले कल को निगल रहा है,, हमें आने वाले कल को बचाना है तो आज से ही पहल करनी पड़ेगी ।

