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अहंकार व संस्कार : डॉ. मुक्ता

 

अहंकार दूसरों को झुका कर खुश होता है और संस्कार स्वयं झुक कर खुश होता है । वैसे यह दोनोंं विपरीत दिशाओं में चलने वाले हैं, विरोधाभासी हैं । प्रथम मानव को एकांगी व स्वार्थी बनाता है; मन में आत्मकेंद्रितता का भाव जाग्रत कर, अपने से अलग कुछ भी सोचने नहीं देता । उसकी दुनिया खुद से प्रारंभ होकर, खुद पर ही समाप्त हो जाती है । परंतु संस्कार सबको सुसंस्कृत करने में विश्वास रखता है और जितना अधिक उसका विस्तार होता है; उसकी प्रसन्नता का दायरा भी बढ़ता चला जाता है । संस्कार हमें पहचान प्रदान करते हैं; दूसरों से अलग करते हैं, परंतु अहंनिष्ठ प्राणी अपने दायरे में ही रहना पसंद करता है । वह दूसरों को हेय दृष्टि से देखता है और धीरे–धीरे वह भाव घृणा का रूप धारण कर लेता है । वह दूसरों को अपने सम्मुख झुकाने में विश्वास करता है, क्योंकि वह सब करने में उसे केवल सुकÞून ही प्राप्त नहीं होता; उसका दबदबा भी कायम होता है ।

दूसरी ओर संस्कार झुकने में विश्वास रखता है और विनम्रता उसका आभूषण होता है । इसलिए स्नेह, करुणा, सहानुभूति, सहनशीलता, त्याग व उसके अंतर्मन में निहित गुण…उसे दूसरों के निकट लाते है; सबका सहारा बनते हैं । वास्तव में संस्कार सबका साहचर्य पाकर फूला नहीं समाता । यह सत्य है कि संस्कार की आभा दूर तक फैली दिखाई पड़ती है और सुकÞून देती है । सो ! संस्कार हृदय की वह प्रवृत्ति है; जो अपना परिचय स्वयं देती है, क्योंकि वह किसी परिचय की मोहताज नहीं होती ।

भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में सबसे महान् है; श्रद्धेय है, पूजनीय है, वंदनीय है और हमारी पहचान है । हम अपनी संस्कृति से जाने–पहचाने जाते हैं और सम्पूर्ण विश्व के लोग हमें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं; हमारा गुणगान करते हैं । प्रेम, करुणा, त्याग व अहिंसा भारतीय संस्कृति का मूल हैं, जो समस्त मानव जाति के लोगों को एक–दूसरे के निकट लाते हैं । इसी का परिणाम हैं…हमारे होली व दीवाली जैसे पर्व व त्यौहार, जिन्हें हम मिल–जुल कर मनाते हैं और उस स्थिति में हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन हो जाता है; शत्रुता का भाव तिरोहित व लुप्त–प्रायः हो जाता है । लोग इन्हें अपने मित्र व परिवारजनों के संग मना कर सुकÞून पाते हैं । धर्म, वेशभूषा, रीति–रिवाजÞ आदि भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं, परंतु इससे भी प्रधान है– जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, आस्था, आस्तिकता, जीओ और जीने का भाव…यदि हम दूसरों के सुख व खुशी के लिए निजी स्वार्थ को तिलांजलि दे देते हैं, तो उस स्थिति में हमारे अंतर्मन में परोपकार का भाव आमादा रहता है ।
परंतु आधुनिक युग में पारस्परिक सौहार्द न रहने के कारण मानव आत्मकेंद्रित हो गया है ।

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वह अपने व अपने परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के बारे में सोचता ही नहीं और प्रतिस्पर्द्धा के कारण कम से कम समय में अधिकाधिक धन–संपत्ति अर्जित करना चाहता है । इतना ही नहीं, वह अपनी राह में आने वाले हर व्यक्ति व बाधा को समूल नष्ट कर देता है; यहां तक कि वह अपने परिवारजनों की अस्मिता को भी दाँव पर लगा देता है और उनके हित के बारे में लेशमात्र भी सोचता नहीं । उसकी दृष्टि में संबंधों की अहमियत नहीं रहती और वह अपने परिवार की खुशियों को तिलांजलि देकर उनसे दूर‘ बहुत दूर चला जाता है । संबंध–सरोकारों से उसका नाता टूट जाता है, क्योंकि वह अपने अहं को सर्वोपरि स्वीकारता है । अहंनिष्ठता का यह भाव मानव को सबसे अलग–थलग कर देता है और वे सब नदी के द्वीप की भांति अपने–अपने दायरे में सिमट कर रह जाते हैं । पति–पत्नी में स्नेह–सौहार्द की कल्पना करना बेमानी हो जाता है और एक–दूसरे को नीचा दिखाना उनके जीवन का मूल लक्ष्य बन जाता है । मानव हर पल अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने में प्रयासरत रहता है । इन विषम परिस्थितियों में संयुक्त परिवार में सबके हितों को महत्व देना–उसे कपोल–कल्पना –सम भासता है, जिसका परिणाम एकल परिवार–व्यवस्था के रूप में परिलक्षित है । पहले एक कमाता था, दस खाते थे, परंतु आजकल सभी कमाते हैं; फिर भी वे अभाव–ग्रस्त रहते हैं और संतोष उनके जीवन से नदारद रहता है । वे एक–दूसरे को कोंचने, कचोटने व नीचा दिखाने में विश्वास रखते हैं । पति–पत्नी के मध्य बढ़ते अवसाद के परिणाम–स्वरूप तलाकÞ की संख्या में निरंतर इजÞापÞmा हो रहा है ।

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पाश्चात्य सभ्यता की क्षणवादी प्रवृत्ति ने ‘ लिव– इन’ व ’तू नहीं और सही’ के पनपने में अहम् भूमिका अदा की है…शेष रही–सही कसर ’मी टू व विवाहेतर संबंधों’ की मान्यता ने पूरी कर दी है । मदिरापान, ड्रग्स व रेव पार्टियों के प्रचलन के कारण विवाह–संस्था पर प्रश्नचिन्ह लग गया है । परिवार टूट रहे हैं, जिसका सबसे अधिक खÞामियाजÞा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है । वे एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं ।’हेलो– हाय’ की संस्कृति ने उन्हें उस मुकÞाम पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां वे अपना खुद का जनाजÞा देख रहे हैं । बच्चों में बढ़ती अपराध– वृत्ति, यौन–संबंध, ड्रग्स व शराब का प्रचलन उन्हें उस दलदल में धकेल देता है; जहां से लौटना असंभव होता है । परिणामतः बड़े–बड़े परिवारों के बच्चों का चोरी–डकैती, लूटपाट, पिÞmरौती, हत्या आदि में संलग्न होने के रूप में हमारे समक्ष है । वे समाज के लिए नासूर बन आजीवन सालते रहते हैं और उनके कारण परिवारजनों को बहुत नीचा देखना पड़ता है

आइए ! इस लाइलाज समस्या के समाधान पर दृष्टिपात करें । इसके कारणों से तो हम अवगत हो गए हैं कि हम बच्चों को सुसंस्कारित नहीं कर पा रहे, क्योंकि हम स्वयं अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं । हम हैलो–हाय व जीन्स कल्चर की संस्कृति से प्रेम करते हैं और अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में शिक्षित करना चाहते हैं । जन्म से उन्हें नैनी व आया के संरक्षण में छोड़, अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं और एक अंतराल के पश्चात् बच्चे माता–पिता से घृणा करने लग जाते हैं । रिश्तों की गरिमा को वे समझते ही नहीं, क्योंकि पति–पत्नी के अतिरिक्त घर में केवल कामवाली बाईयों का आना–जाना होता है । बच्चों का टीड्डवीड्ड व मीडिया से जुड़ाव, ड्रग्स व मदिरा–सेवन, बात–बात पर खीझना, अपनी बात मनवाने के लिए गलत हथकंडों का प्रयोग करना… उनकी दिनचर्या व आदत में शुमार हो जाता है । माता–पिता उन्हें खिलौने व सुख–सुविधाएं प्रदान कर बहुत प्रसन्न व संतुष्ट रहते हैं । परंतु वे भूल जाते हैं कि बच्चों को प्यार–दुलार व उनके स्नेह–सान्निध्य की दरकÞार होती है; खिलौनों व सुख–सुविधाओं की नहीं ।

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सो ! इन असामान्य परिस्थितियों में बच्चों में अहंनिष्ठता का भाव इस कÞदर पल्लवित–पोषित हो जाता है कि वे बड़े होकर उनसे केवल प्रतिशोध लेने पर आमादा ही नहीं हो जाते, बल्कि वे माता–पिता व दादा–दादी आदि की हत्या तक करने में भी गुरेजÞ नहीं करते । उस समय उनके माता–पिता के पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प शेष नहीं रह जाता । वे सोचते हैं– काश ! हमने अपने आत्मजों को सुसंस्कृत किया होता; जीवन–मूल्यों का महत्व समझाया होता; रिश्तों की गरिमा का पाठ पढ़ाया होता और संबंध–सरोकारों की महत्ता से अवगत कराया होता, तो उनके जीवन का यह हश्र न होता । वे सहज जीवन जीते, उनके हृदय में करुणा भाव व्याप्त होता तथा वे त्याग करने में प्रसन्नता व हर्षोल्लास का अनुभव करते; एक–दूसरे की अहमियत को स्वीकार विश्वास जताते; विनम्रता का भाव उनकी नस–नस में व्याप्त होता और सहयोग, सेवा, समर्पण उनके जीवन का मकÞसद होता ।

सो ! यह हमारा दायित्व हो जाता है कि हम आगामी पीढ़ी को समता व समरसता का पाठ पढ़ाएं; संस्कृति का अर्थ समझाएं; स्नेह, सिमरन, त्याग का महत्व बताएं ताकि हमारा जीवन दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सके । यही होगी हमारे जीवन की मुख्य उपादेयता… जिससे न केवल हम अपने परिवार में खुशियां लाने में समर्थ हो सकेंगे; देश व समाज को समृद्ध करने में भी भरपूर योगदान दे पाएंगे । परिणामतः स्वर्णिम युग का सूत्रपात अवश्य होगा और जीवन उत्सव बन जायेगा ।

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