मनोज शाह ‘मानस’ की तीन गजलें , परछाई…तेरी चाहत…इंतजार…
परछाई…”
ये कैसी परछाई है, ये कैसी साया है ।
लौटकर कोई तेरे दर पर आया है ।।
मौसम ए बहार में ठंडी हवाओं के झोंके,
सर्दियों के बहाने सिर्फ होंठ कंपकंपाया है ।
कुछ नादानी पन कुछ दीवानापन मुझ में,
कुछ अतीत के पन्ने कुछ कर्मों का काया है ।
आरज़ू की तलाश कभी ज़ुस्तज़ू की तलाश,
शून्य जिंदगी भटक कर नगण्य ही पाया है ।
दर-दरबदर भटककर तेरे दर पर आया हूं,
प्रेम जाल की भ्रम जाल में जो भरमाया है ।
तुम्हारे पास रहूं नज़र निहायत रहे हमेशा,
ख्यालों में ख्यालों का महल सजाया है ।
यह कैसी परछाई है यह कैसी छाया है ।
मुस्कुराकर कोई तेरे दर पर आया है ।।
“तेरी चाहत…”
कदमों से तेरी आहट पहचान लेती हूं ।
नजरों से तेरी चाहत पहचान लेती हूं ।।
ठंडी हवा के झोंके या दिसंबर की आहट,
बदन में उठी सनसनाहट पहचान लेती हूं ।
सैकड़ों ख्वाहिशें दिल में दफन है मेरे यार,
हर ख्वाहिश पर निकले दम जान लेती हूं ।
डरती हूं जमाने की निगाहों से चंद पहरेदारों से,
चांद सितारे तोड़कर लाने की हठ जान लेती हूं ।
नफरत के कारागारों में उल्फत के शामियानों में,
तुम्हारे बढ़ती हुई हाथों की राहत जान लेती हूं ।
कैद होने लगा है शाम कोहरे के शामियानों में ,
आने वाली सर्दियों की आहट पहचान लेती हूं ।
कदमों से तेरी आहट पहचान लेती हूं ।
नजरों से तेरी चाहत पहचान लेती हूं ।।
“इंतजार…”
भूले हुए नगमे दे दो, खोया हुआ प्यार भी ।
तुम्हारी उम्मीद भी है, तुम्हारा इंतजार भी ।।
जिंदगी की कश्ती डूबोने वाले ज़ालिम वफा,
कर दिया दफन मेरा इश्क़ भी इकरार भी ।
सोया हुआ है कब्र में बेरहम बेवफा मजनूं ,
कफन बेचने वाले बेच दिया संस्कार भी ।
फैसला होगा मंजिलें मुकद्दर के पास तेरा ,
बिगुल बजाएगा जीत की खुदा भी संसार भी।
रुखसत तो कर दिया है नादां हमसफर को,
यादों की शूल चूभेगा हमेशा आर भी पार भी।
भूले हुए नगमे दे दो खोया हुआ प्यार भी ।
तुम्हारी उम्मीद भी है तुम्हारा इंतजार भी ।।


