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“टूटी फूटी पार्टी” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा,

 

बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज  (व्यंग्य) l ईस देश में जितने उद्योग धंदे नहीं है उस से राजनीतिक पार्टियां खूल गई है । उद्योग धंदे जितने थे बहुदल और गणतंत्र आने से पहले वह सब बंद हो कर नेताओं के पेट में और बांकी म्यूजियम में चलू गए है । ईस देश में.सब से बडा ब्यापार या उद्योग ही राजनीति है ईसी लिए नित नई पार्टियां खूल रही है और कार्यकर्ताओं को ईन राजनीतिक दल नामक उद्योग में रोजगार मील गया है । सरकार के सामने मुंह बाए खडी रोजगार की विकराल समस्या भी ईन नए खुले राजनीतिक दलों नें कम कर दी है । जितने ज्यादा नए राजनीतिक दल नामक उद्योग खुलेगें देश उतना ही विकसित, समृद्ध और हराभरा होगा । ईसी लिए नए-नए दल खोलते जाओ और अपने पेट का साईज भी बढाते जाओ ।
औसत में हर हप्ते एक नई राजनीतिक पार्टी जनम ले रही है । शहर मे एक नंया चाय का दूकान खुलने में दिक्कत है पर नंया दल तुरत-फुरत दर्ता हो रहा है । जिस नेता का भी अपनी पुरानी पार्टी से थोडा सा भी अनबन हुआ नहीं कि नंया दल.खोल कर वह असंतुष्ट नेता उस दल का अध्यक्ष बन कर संतुष्ट नजर आने लगता है जैसे कि चुनाव ही जीत लिया हो । जब -जब चुनाव नजदीक आने लगता है बरसाती मेढक की तरह नईं पार्टियां टर्राने लगती है । नेपाल में नंया दल खुलना.कोइ अनोखी बात नही है पर उसका बिना टूटे-फूटे सलामत रहना या टिके रहना जरुर अनोखा या बडी बात है । अभी कुछ दिन.पहले ही मीडियाकर्मी रवि लामिछाने कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी अस्तित्व में आई जिसने स्वतंत्रता शब्द का ही अपहरण कर दिया । उस पर सोने में सुहागा यह हूई कि ईनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह फेसबुक, ट्विटर के नोटिफिकेशन कि तरह घंटी है । कंही मतदाता चुनाव में ईनकी ही घंटी न बजा दे जरा सम्हल कर रहना । नेकपा एमाले के वरिष्ठ नेता वामदेव गौतम ने भी असंतुष्ट हो कर नंया दल खोल लिया पर बेचारे को उनके ही दल से खदेड दिया गया । अब बेचारे न ईधर के रहे न उधर के त्रिशंकु बन कर बीच में लटक गए ।
बडे हुए पढ लिख कर नौकरी या ब्यापार किया, खुब अनाप-शनाप पैसा कमा लिया । दो चार लोग पहचानने लगे तो खुद को देश का प्रतिष्ठित व्यक्ति होने का भ्रम पाल लिया । जब भ्रम होने लगा तो पुराने काम से बोरियत होने लगी । अब नंया क्या किया जाए ? चलो नंयी राजनीतिक पार्टी खोल कर समाज सेवा का ढोंग करें और भरपूर मेवा खाएं । सतह मे जो देशप्रेम और राष्ट्रियता का जो तानाबाना दिख रहा है और देश और अवाम के नाम पर जो घडियाली आंसू बहाए जा रहे हैं उसके अन्तर्य में सिर्फ नाम और दाम की भुख है । नहीं तो समाज या देश सेवा करने के लिए और भी तरिके है राजनीति में ही कूद कर अपना तमाशा दिखाना जरूरी नहीं है ।
अभी सब को स्वतंत्र होने और खुद को स्वतंत्र मानने का बुखार चढा है । और.यह टाईफाईड के बुखार कि तरह उतरने का नाम नही.ले रहा । कोई खुद को स्वतंत्र सावित कर रहा है तो कोई हाल ही में हुए नगरपालिका के चुनाव मे स्वतंत्र रुप से खडे हो कर और जीत कर सबको हैरत में डाल दिया । जो न स्वतंत्र है न पिछले चुनाव में उम्मीदवार बन पाए वह अगले संसदीय चुनाव को ताक में रख स्वतंत्रता नामक पार्टी गठन कर के कोई बडा तीर मारना चाहते हैं । अब यह तीर निशाने पर लगा कि नहीं यह तो संसदीय चुनाव का मत परिणाम ही बताएगा । फिलहाल नंया दल खोलने का जुनून सवार है । न कोई दृष्टि है न कोई बिचार है न घोषणापत्र में कोई नई बात है फिर भी मतदाताओं को रिझाने कि कवायद जारी है । बस जोड-ओड से बोलना और अपने विरोधी दल और उसके नेताओं को गाली देना और उनकी खटिया खडी कर देना बस ईतना जानते है यह नवेले नेता और पार्टि के लोग । ईसमें ईनकी अपनी भी खटिया खडी हो जाती है पर कोई बात नहीं राजनीति के हमाम मे सभी नंगे है ईसी लिए एक दुसरे को शेम-शेम करना बेकार है ।
यदि ईन नेता नाम के प्राणियों में थोडी सी भी नैतिकता बांकी होती तो यह नंया दल खोलने के बजाय कोई नंया उद्योग स्थापना करते या कोई बडा ब्यापार करते जिससे हजारों बेरोजगारों को रोजगार मिलती और देश की ढूलमूल आर्थिक अवस्था कुछ तो सम्हलती । पर ईससे न ईन नेताओं का कोई प्रचार या नाम होता न ईनको जल्दी दाम ही मिलता । ईनको तो बस शर्टकर्ट तरिके से सब कुछ चाहिए । ईसके लिए राजनीति से बढिया क्या होगा ? ईसी लिए वही कर रहे हैं जो ईनको आता है । अब उद्योग चलाने या ब्यापार करने के लिए ब्यवस्थापन का दिमाग भी तो होना चाहिए । ईसी लिए तो देश में सामान उत्पादन करने वाले कारखाने तो बंद है पर निकम्मे नेता उत्पादन करने वाले राजनीति फलफूल रही है और बिना लगानी के ही यह वनमारा झार हो कर फैल रहा है । पर अफशोच कि बात यह भी है कि यह नंए खुले राजनीतिक दल ज्यादा दिन टिकती नहीं है । विगत में सदभावना और साझा पार्टी का हश्र हम देख चूके हैं । ईसी लिए ईन बरसाती मेढक पार्टियां हमारी नींद हराम भले ही कर ले पर यह कुछ बिगाड नहीं पाएगी । जिस तर नारियल या बेल.के फुट्ने या टुट्ने से कुछ नहीं होता उसी तरह ईन राजनीतिक पार्टियों के नंया खुलने या टुट्ने फुट्ने से भी कुछ नहीं होने वाला ।

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बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बिरगंज

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