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अहिल्या की भांति प्रतीक्षारत वैशाली : अजय कुमार झा

 
     प्राचीन नेपाल में, लिच्छवि नामक एक अधिराज्य था, जो काठमांडू घाटी में था लगभग 400 से 750 ई० में। लिच्छवी वर्तमान भारत के उत्तरी बिहार के प्राचीन वैशाली नगर से थें जिन्होंने काठमांडू पर आक्रमण कर विजय प्राप्त कर ली थी।ईसा पूर्व सातवीं सदी के उत्तरी और मध्य भारत में विकसित हुए सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान महत्त्वपूर्ण था। आज से लगभग अठ्ठाईस सय वर्ष पूर्व में नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जियों तथा लिच्‍छवियों के संघ अष्टकुल द्वारा यहां गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत की गयी थी। यहां का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता था। आज दुनिया भर में जिस गणतंत्र को अपनाया जा रहा है, वह वैशाली के लिच्छवी शासकों की देन है।
     वैशाली बिहार की राजधानी पटना से करीब पचास किमी दूर वैशाली जिले का ऐतिहासिक स्थल है जिसे भगवान महावीर की जन्मभूमि और भगवान बुद्ध की कर्मभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्पूर्ण था। प्राचीन वैशाली अति समृद्ध एवं सुरक्षित नगर था जिसे शत्रुओं से बचाव के लिए तीन तरफ से दीवारों से घेरा गया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार पूरे वैशाली नगर का घेरा चौदह मील के लगभग था। मौर्य और गुप्‍त राजवंश में जब पाटलीपुत्र राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र के व्‍यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
     भगवान बुद्ध ने संभवतः तीन बार वैशाली में लंबा प्रवास किया था। वैशाली के कोल्‍हुआ में उन्होंने अपना अंतिम संबोधन दिया था। उनकी याद में सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सिंह स्‍तम्भ का निर्माण करवाया था। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के सौ साल बाद वैशाली में दूसरे बौद्ध परिषद का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की याद में वहां दो बौद्ध स्‍तूप बनवाये गये। प्रसिद्ध राजनर्तकी और नगरवधू आम्रपाली यहीं की थी जिसने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में तथागत से बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की थी। बौद्ध साहित्य, जातकों, प्राचीन ग्रन्थों और चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में वैशाली की समृद्धि, सुरक्षा-व्यवस्था, वैभव और गणिका आम्रपाली के विशाल प्रासाद तथा उद्यान का विशद वर्णन मिलता है ! वैशाली जैन धर्मावलंबियों के लिए भी एक पवित्र स्थल है। तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म वज्जिकुल में वैशाली के कुंडलपुर या कुंडग्राम में हुआ था जहां वे बाईस साल की उम्र तक रहे थे।
     वैशाली आज विश्व भर के पर्यटकों के लिए लोकप्रिय पर्यटन-स्थल है। वैशाली में आज दूसरे देशों के कई मंदिर भी बने हुए हैं। तथागत को वैशाली तथा उसके निवासियों से आत्मीय लगाव रहा था। उन्होंने यहां के गणप्रमुखों को देवों की उपमा दी थी। अंतिम समय में वैशाली से कुशीनारा आते समय उदास बुद्ध ने कहा था – ‘आनन्द, तथागत अब शायद इस सुंदर नगरी का दर्शन न कर सकेंगे, लेकिन जबतक यहां शासन में जनता की भागीदारी बनी रहेगी इसकी समृद्धि को किसी की नजर नहीं लगेगी !’
     मित्रों, वही वैशाली आज अपनों से उपेक्षित है। वैशाली को इंडोनेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यानमार जैसे अनेकों देशों ने पहचान लिया; उन सभी देशों ने अपनी अपनी उपस्थिति भी जता दी है। लेकिन विहार सरकार और बिहार के जनता को वैशाली की महिमा और गरिमा का भान तक नही है। न उन्हें अपने दिव्य पूर्वजों का नाम याद है न महत्ता की ही समझ है। सौभाग्य से आज मेरा भ्रमण वैशाली का हो पाया। वैशाली निवासी श्री अनुपम सिंह जी ( जो अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक धरोहरों को पुनः संरक्षित करने में तत्पर हैं) के सहयोग से इस परम पूज्य भूमि का दर्शन कर पाया। ए वही भूमि है; जहां अस्तित्वको जितने बाला भगवान महावीर के चरण रज उपलब्ध है। ए वही भूमि है; जहां चार आर्य सत्य के प्रणेता हमारे दसवां अवतार भगवान बुद्ध ने घनघोर तपस्या कर ज्ञान का संचरण किया था। जिसका अवशेष यहां के खंडहरों और प्राज्ञों में देखा जा सकता है। ए वही भूमि है; जहां महा तपस्वी महामोग्लाना अपनी अभाओं से आज भी हमें आंदोलित कर रहे होते हैं। ए वही भूमि है; जहां सारिपुत्त जैसे परम विद्वान के वैचारिक तरंग आज भी महसूस किए जाते हैं। यहां की कण कण में महा कश्यप के मौन को सुना जा सकता है। यह परम सुंदरी आम्रपाली और परम करुणावन बुद्ध का संगम, समर्पण और मनोरम भूमि है। इस धरा पर जन्म लेना और निवास करना दोनो सौभायशाली होने का द्योतक है। इसे यहां के नागरिक और भारत सरकार के सृजनात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यह भूमि अपनी उद्धार के लिए अहिल्या के भांति किसी दिव्य पुरुष के प्रतीक्षा में है। आइए, वैशाली को उसके पौराणिक गरिमा और महिमा लौटाने का प्रयास करें। यह लेख इसी भूमि पर तयार कर रहा हूं। अतः इसका भी ऐतिहासिक मूल्य होगा। धन्यवाद!

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