किश्तों में आदमी
पुस्तक समीक्षा, माला मिश्रा, विराटनगर । अखिलेश शर्मा कि कविताएँ शीर्षक ‘किश्तों में आदमी’ उनके कई भावों का समीकरण लगती है। ये कविताएँ हमें इन्हीं भावों कि यात्रा कराती हैं। साथ ही ऐसा लगता की कवी किसी तलाश में भी है, कहीं कहीं लगता की वो खुद की खोज में निकले है। इनकी कविताओं में हम ये भी पाते है की इंसान को किसी बात की पीड़ा हो सकती है, कहीं वो हतोत्साहित भी हो सकता है, कभी सब कुछ छोड़-छाड़ वो यात्रा में निकल पड़ता है! वैसे एक कविता में यात्रा भी दर्ज हुई है जहाँ अखिलेश कहते हैं, “आओ सबकुछ भूल कर अनहद, अलहदा हम घूमते रहते है..दर-बदर फिरते रहते है..चलते-चलते मंजिल मिल जाएगी.. ये आस हम खुद में जगाए रखते है..ये ज़िदादिली हम बनाए रखते हैं।”
अखिलेश शर्मा की कविताएँ पढ़ के एक बात तो समझ आती है की वो एक ज़िम्मेदार सामाजिक नागरिक, और संवेदनाओं से लबरेज है। इसका उदहारण हमें एक जगह मिलता है जहाँ कवि ने चाँद को वक्त का पहिया बनाया है, होली और दीपावली पर्व पर भी कवी ने एक सुन्दर समाज बनाने की कल्पना करी है, कवी ने “निश्छल प्रेम” की सुन्दर व्याख्या करी है।
‘किताबें’ जैसी कुछ कविताओं में उन्होंने किताब के जरिए अतीत कि संरचना में मानवीय संबंधों, आदतों, व्यवहार-विचारों और दैनिक क्रिया-कलापों कि ऐसी संवेदनशील व जीवंत बुनावट कि है जिन्हें पढ़ते-पढ़ते प्रत्येक मनुष्य अपनी-अपनी यादों में खो जाएगा।
अखिलेश शर्मा ने “मै नारी हूँ” पे भी लिखा है और नारी को चट्टान सा मजबूत बताया है, दुर्गा देवी सा बताया है..इस सृष्टि का अस्तित्व बताया है। अखिलेश की कविताओं में उनका नदी प्रेम उभर के आता है और “गंगा नदी” से लगता जैसे उनका कोई बेहद ख़ास नाता है। अखिलेश की कविताओं में उनका प्रकृति प्रेम भी खूब छलका है।
अखिलेश की कविताओं से प्रेरणा भी मिलती है एक कविता उन्होंने “तुम बहुत कुछ कर सकते हो” पर लिखी है.. और ये बताया है की जीवन उद्देश्य लेकर मनुष्य को चलना चाहिए। एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ना चाहिए, अपने कर्म पुरे उत्साह से के साथ करना चाहिए। हार होने पर कतई निरास नहीं होना चाहिए।
अखिलेश शर्मा की कविताओं कि विशेषता यह है कि कहीं-कहीं ये संस्मरण जैसे लगते हैं। इनमें कहीं किसी के बिछड़ने कि टीस है तो कहीं रिश्तों को नए सिरे से जोड़ने कि ख्वाहिश। इनमें कहीं एकाकिपन का भी आनंद मिलता है। इनमें घर, गाँव, पीपल कि छाँव हैं और उस छाँव में कट जाने या टूटे जाने का दर्द भी सतह तक आता है। कहीं आधुनिकता के बीच जीवन-मूल्यों में आ रही गिरावट को लेकर चिंता जाहिर होती है तो कहीं वे अपने वजूद को लेकर अपने आप से सवाल भी करते हैं और खुद से पूछते हैं, “रूह को संभालना था तुम्हें, पर तुम तो सूरत संवारने लगे!”
“बनारस” पर कवी ने जो लिखा है वो पढने योग्य है। बनारस का चित्रण ऐसा लगता इनकी कविता में की मानो जो इस पवित्र नगरी में कभी ना गया हो वो भी वहां तुरंत जाने को उत्सुक हो जाए! वहीँ दिल्ली मेट्रो पर जो लिखा है इन्होने वो गुदगुदाता भी है साथ ही साथ हमारी सोच, हमारी मानसिकता, व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुवे हमें एकता के सूत्र में बंधे रहने की बात भी करता है।
इन कविताओं में जिंदगी कि कश्मकश और उसे मुकाम तक पहुँचाने के लिए दर-दर हाजरी एक साथ दिखती है। इन कविताओं में आत्मबल भी मिलता है।
लेकिन, इन सबके बीच से उन्हें अपने देशकाल कि परवाह भी है और अपना सामाजिक दाइत्व निर्वाह करते हुवे वे ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ कविता में बेरोजगारी कि मार और जनमानस कि परेशानी का जिक्र करना नहीं भूलते और कहते हैं, “की हम कब अपनी सोच में परिवर्तन लाएंगे और हर एक देशवासी को उसके आगे बढ़ने के सपने को आगे बढ़ाएंगे और शिक्षा और जागरूकता की अलख जगाएंगे.. हम ऐसा कर पाए तभी आजादी का अमृत महोत्सव बना पाएंगे!
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