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‘राष्ट्रीय मुक्ति क्रान्ति’, मधेश से पहाड़ की ओर बढ़ते महतो : डा. श्वेता दीप्ति

राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति
 
राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति
श्वेता दीप्ति, सम्पादक, हिमालिनी ।

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक अप्रैल 2024 । लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी लोसपा के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र महतो ने बीते दिनों पार्टी परित्याग कर नई क्रांति की घोषणा की है । पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने ”“राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति’ अभियान की घोषणा की । उन्होंने नेपाल की वर्तमान स्थिति को एकल जातीय बताते हुए यह भी दावा किया कि वह एक बहुराष्ट्रीय राज्य बनाए ।

महंथ ठाकुर के नेतृत्व में लोसपा में पदाधिकारियों के मनोनयन से असंतुष्ट महतो ने नवंबर में केंद्रीय कमेटी की बैठक और विस्तार का बहिष्कार किया था । इसके बाद से अध्यक्ष ठाकुर से महतो की बातचीत बंद हो गयी थी । लोसपा ने महतो के जाने को एक छोटी घटना माना । क्योंकि उनका मानना था कि अगर महतो की स्थिति लोसपा में मजबूत होती तो वो अपनी बात मनवाने की कोशिश करते ना कि पार्टी छोड़कर जाते । एक हद तक यह बात सही भी लगती है ।

पार्टी से निकलने के बाद से ही महतो सक्रिय हैं । इस बीच, महतो ने भारत जाकर शक्ति केंद्र के संवाद से लेकर देश में पुराने सद्भावना के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की । भारतीय गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से चर्चा के बाद महतो नेपाल लौटे । दिल्ली जाने से पहले उन्होंने नेपाल में भी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और माहौल को समझा । उन्होंने मधेश में जाकर पुराने कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और नई पीढ़ी और पिछड़े समुदायों से बात की ।

इस बीच वो मधेश के जिलों में अपनी यात्रा को निरंतरता देते रहे हैं । जनवरी में गजेन्द्रबाबु की २२ वीं पुण्यतिथि पर ‘गजेंद्रबाबू के विचार और मधेश की वर्तमान राजनीति’ विषय पर संवाद किया और इसे ही विषय बना कर वो आगे बढ़ रहे हैं और अपने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित कर रहे हैं । उनके समूह ने स्वदेशीवाद, बहुलवादी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक समाजवाद को अपना मुद्दा बनाया है । महतो एकबार फिर से स्वयं को स्थापित करने के लिए विगत के ज्ञान प्रणाली को आधार बनाते हुए इसे स्वदेशीवाद का नारा दे रहे हैं । यानि एकबार फिर से अपनी उस प्रसिद्धि को कायम करने की कोशिश कर रहे हैं जिसे धीरे–धीरे उन्होंने गंवा दिया था । २०७३ में, छह मधेश–केंद्रित पार्टियों का विलय होकर राजपा का गठन हुआ था । उस समय तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी, सद्भावना, फोरम लोकतांत्रिक, संघीय सद्भावना, तराई मधेश सद्भावना पार्टी और राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी के बीच एकता हुई थी । पार्टी का नेतृत्व करने के लिए महतो और महंथ एक छत के नीचे आये थे । बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पार्टी को तोड़ने के लिए अध्यादेश ले आये । और फिर रातोरात राजपा और उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी का विलय होकर जसपा बन गई । किन्तु यह भी कहाँ टिकने वाला था क्योंकि नेताओं की महत्त्वाकांक्षा खुद का हित देखती है जनता का नहीं । जल्द ही जसपा में महतो व महंथ गुट का उपेन्द्र गुट से विवाद शुरू हो गया । बाद में जब संसद भंग हुई तो २२ सांसदों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली का समर्थन किया । विवाद इतना बढ़ा कि बात निर्वाचन आयोग तक पहुँची जहाँ आयोग ने उपेन्द्र यादव को वैधता दे दी । बाद में, महंथ और महतो ने पार्टी विभाजन अध्यादेश की मदद से जसपा छोड़ दिया और और इसतरह लोसपा का गठन किया गया था । उसी लोसपा से आज महतो ने अलग होकर ‘राष्ट्रीय मुक्ति क्रान्ति’ की शुरुआत की है । यानि ‘मधेश’ शब्द को छोड़कर ‘राष्ट्र’ शब्द को अपना कर समग्रता की बात कर रहे हैं । किन्तु ये वही महतो हैं जिनसे पहाड़ हमेशा नाराज रहा है । मधेस की राजनीति से निकले राजेंद्र महतो ने अब राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति का गठन कर मधेस से पहाड़ तक ’क्रांति’ के कदम बढ़ा दिए हैं । जबकि राजेंद्र महतो को हमेशा पहाड़ विरोधी कहा जाता रहा है । पहाड़ में महतो का नाम नहीं सुनना चाहते हैं क्योंकि मधेस आंदोलन के दौरान महतो की सबसे ज्यादा आलोचना पहाड़ी इलाकों से हुई थी । नाकाबंदी में उनकी सक्रियता और काठमांडू में दानापानी को रोकने के लिए विभिन्न चौकियों पर धरने पर उनका बैठना, उन्हें सबसे अधिक आलोचना का शिकार होना पड़ा था । वही महतो इन दिनों पहाड़ और पहाडि़यों के जिलों में जा रहे हैं और बहुल राष्ट्र की स्थापना की बात करके राजनीति की तैयारी कर रहे हैं ।

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महतो की राजनीतिक यात्रा को अगर गौर से देखा जाए तो यह स्पष्ट पता चलता है कि वो समय–समय पर नई–नई चीजों का प्रयोग करते रहे हैं । व्यवसाय से जुड़े महतो की मुलाकात २०४६ में काठमांडू के डिल्लीबाजार में नेता गजेंद्र नारायण सिंह से हुई थी । इसके बाद उन्होंने व्यवसाय छोड़ दिया और सद्भावना परिषद में शामिल हो गये । स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह नेता सिंह की ओर आकर्षित हुए थे ।
लोकतंत्र बहाली के बाद २०४८ में हुए चुनाव में महतो ने सर्लाही से नामांकन किया दिया था । उस वक्त राजनीतिक गलियारे में उनकी काफी चर्चा हुई थी, लेकिन वह नेपाली कांग्रेस की उम्मीदवार मीना पांडे से १३०० वोटों से हार गए थे ।

तीन साल बाद २०५१ के मध्यावधि चुनाव में महतो उसी क्षेत्र से उम्मीदवार बने । दूसरी बार उन्हें पांडे ने ३०० वोटों के अंतर से हरा दिया । उस समय पूर्व प्रधानमंत्री सूर्य बहादुर थापा ने भी सर्लाही से चुनाव लड़ा था और वह तीसरे नंबर पर रहे थे । दो बार हार के बाद भी महतो ने हार नहीं मानी । इस तरह उनकी मधेश में चर्चा और लोकप्रियता एक साथ बढ़ी । २०५६ के चुनाव में महतो ने पांडे को हराया था और पूर्व प्रधानमंत्री थापा दूसरी बार हारे थे ।

यह वह समय था जब प्रतिनिधि सभा का सदस्य बनने के बाद महतो का मधेश में दबदबा बढ़ने लगा था । वह नेपाल सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष बने । लंबे समय तक माओवादी सशस्त्र संघर्ष के कारण जब राजनीतिक दल के नेता मुख्यालय में केंद्रित थे तब भी महतो ने अपना गांव नहीं छोड़ा था । इसके परिणामस्वरूप, उन्होंने २०६४ में संविधान सभा का चुनाव बहुमत से जीता । किन्तु दुर्भाग्य से उस समय की संविधान सभा, संविधान नहीं बना सकी । इसका असर महतो पर भी पड़ा । २०७० में हुए संविधान सभा के दूसरे चुनाव में वे तराई–मधेश सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष महेंद्र राय यादव से हार गये ।

२०४६ के जन आंदोलन में एक कार्यकर्ता के रूप में भाग लेने वाले महतो २०६२–६३ के जन आंदोलन में नेतृत्व पंक्ति में थे । इसके बाद वह नेपाली कांग्रेस नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में उद्योग, वाणिज्य और आपूर्ति मंत्री बने । इस तरह उन्होंने पहली बार सिंह दरबार में अपने कदम रखे । संविधान सभा के चुनाव के बाद वह तत्कालीन माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल के नेतृत्व वाली सरकार में भी मंत्री बने । दहाल के बाहर निकलने के बाद, वह तत्कालीन एमाले नेता माधव कुमार नेपाल की सरकार में वाणिज्य और आपूर्ति मंत्री बने । यह क्रम संविधान सभा के प्रथम कार्यकाल तक जारी रहा । तत्कालीन माओवादी नेता बाबूराम भट्टाराई के नेतृत्व में बनी सरकार में भी महतो मंत्री बने । उस वक्त उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी । सत्ता की राजनीति में माहिर महतो उस समय मधेश में भी लोकप्रिय थे । उनका कद मधेश केंद्रित राजनीति में शामिल अन्य नेताओं से ऊंचा था । वह उन्होंने गुडविल पार्टी से कमाया । सद्भावना अध्यक्ष गजेन्द्र सिंह के निधन के बाद पार्टी की कमान संभालने वाले बद्री प्रसाद मंडल तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र शाह द्वारा उठाए गए कदमों के पक्ष में खड़े थे । इसके बाद महतो की सक्रियता बढ़ गयी । उन्होंने गजे न्द्र सिंह की पत्नी आनंदी देवी सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाकर नेपाल सद्भावना पार्टी (आनंदी देवी) की शुरुआत की ।
दूसरे जन आंदोलन की सफलता के साथ ही उनकी पार्टी में सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया । संविधान सभा के चुनाव आये और पार्टी विभाजित हो गयी । उस समय महतो ने अपने नेतृत्व में सद्भावना पार्टी का गठन किया और संविधान सभा के चुनाव में भी सफल रहे । उस सफलता ने सत्ता–केंद्रित राजनीति को जन्म दिया । यह वो समय था जब महतो अपने साथियों को रोक नहीं सके । उनके सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले अनिल कुमार झा और रामनरेश यादव ने अपने–अपने नेतृत्व में अलग–अलग पार्टियां बना लीं ।

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२०७० में संविधान सभा के दूसरे चुनाव के समय तक मधेश में दर्जनों पार्टियाँ बन चुकी थीं । महतो ने सभी पक्षों में सामंजस्य बिठाने की जिम्मेदारी ली । महन्थ ठाकुर नेतृत्व की तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी, शरत्सिंह भण्डारी नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी, अनिल झा नेतृत्व वाली नेपाल सद्भावना पार्टी और महेन्द्र यादव नेतृत्व वाली तराई मधेश सद्भावना पार्टी मिला कर राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया गया । उन्होंने पार्टी को सामूहिक नेतृत्व में चलाने का भी प्रयास किया ।
२०७४ के चुनाव के बाद नेकपा के नेतृत्व में सरकार बनी । प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने उपेन्द्र यादव और बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी को विभाजित कर दो–तिहाई बनाने की कोशिश की । समाजवादी पार्टी के विभाजन को रोकने के लिए महतो खुद आगे बढ़े । इसके बाद रातों–रात महतो का समाजवादी पार्टी में विलय हो गया । एकीकरण के बाद जनता समाजवादी पार्टी नेपाल का निर्माण हुआ । लेकिन यह पार्टी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी क्योंकि नेताओं का ध्यान सत्ता की राजनीति पर केंद्रित था और अंततः ओली के नेतृत्व वाली सरकार में भागीदारी के मुद्दे पर जनता समाजवादी पार्टी विभाजित हो गई ।
२०७८ में, महतो के नेतृत्व में लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी गठन किया गया, जिसमें महंथ ठाकुर की स्थिति को मजबूत बनाई गई । अगले वर्ष २०७९ में आम चुनाव हुए । जिसमें सर्लाही में महतो की हार हुई । अध्यक्ष ठाकुर भी अपनी हार से उदासीन हो गये । पार्टी के भीतर भी महतो कमजोर हो गये थे । स्वार्थ की राजनीति में सभी अलग होते चले गए । मधेश तो पीछे छूट ही गया था वहीं महतो भी मधेश की चर्चा में पीछे हो रहे थे । इस तरह राजनीति के अर्श से फर्श तक के सफर को जारी रखते हुए महतो एकबार फिर नई नीति या यूँ कहें की पुरानी नीति को नया चोला पहना कर वो जनता की नजर में आना चाह रहे हैं । उन्होंने अपने करीबी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ अभियान शुरू कर दिया है । आज तक जिस मधेश केंद्रित राजनीति पर अड़े रहे और मधेश की जमीन से लेकर सिंह दरबार तक का सफर तय किया, वहीं इसबार उनकी निगाह देश के अन्य क्षेत्रों तक जा रही है । अब यह सोचउन्हें कहाँ लेकर जाएगी यह तो भविष्य बताएगा फिलहाल विश्लेषकों का मानना है कि उनहें मधेश के मुद्दों को ही लेकर आगे बढ़ना चाहिए । क्योंकि यह माना जा रहा है कि आज भी केन्द्र की राजनीति में वही पार्टी स्थापित होगी जो मधेश के एजेंडे को मजबूती से उठाएगी ।

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वर्तमान में महतो लगभग हर जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक–एक चरण की ट्रेनिंग दे चुके हैं । राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति के नेता केशव झा ने दावा किया कि प्रशिक्षण के माध्यम से ७,००० कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है । उन्होंने कहा, ‘सात हजार ऐसी जनशक्ति तैयार की गई है, जो किसी भी समय वैचारिक प्रशिक्षण दे सकती है, वह सिर्फ एक वैचारिक दस्ता है ।’
राजेंद्र महतो के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति को कई स्वतंत्र संगठन हैं जो मदद कर रहे हैं । जिनमें समान नेपाल, सोशियो कल्चलर रिसर्च सेन्टर, ज्ञान दबु,सेन्टर फर स्ट्राटेर्जी हिमालय स्टडी,द नर्दन स्कुल, युनाइटेड वान वल्र्ड ग्रूप, नेपाल इन्डिजिनियस चेम्बर अफ कमर्स, नेशनल कोपरेटिभ अलाइन्स आदि हैं । राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति के पास वर्तमान में केवल एक समन्वयक है, अन्य सभी सामान्य सदस्य हैं । राष्ट्रीय क्रांति मुक्ति के अंतर्गत विभिन्न परिषदों का भी गठन किया गया है ।

जहाँ तक राष्ट्रीय मुक्ति क्रान्ति की अवधारणा का सवाल है तो यह प्रत्येक जातीय समुदाय को एक राजनीतिक इकाई मानती है । और इसका मानना है कि प्रत्येक जातीय समुदाय के पास किसी प्रकार की राजनीतिक इकाई, पहचान या परिषद होनी चाहिए । जबकि गजेंद्र नारायण सिंह की ‘मधेस अवधारणा’, ‘बहुल राष्ट्रीय राज्य’ के विचार से भिन्न थी । सिंह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा के अनुसार मधेस के सभी जातीय और भाषाई समुदायों को मधेस की व्यापक छत्रछाया में शामिल करना चाहते थे । सिंह से प्रेरित महतो खुद भी लंबे समय से एकीकृत मधेस, संघवाद और समावेशिता के समर्थक रहे हैं । लम्बे समय तक उन्होंने ‘बहुराष्ट्रीय राज्य’ की वकालत की । ‘बहुल राष्ट्रीय राज्य’ की सोच एक खास बिन्दु पर जाकर स्वयं संघवाद और समावेशी के सिद्धान्त से टकराने की पूरी संभावना नजर आती है ।
महतो का मानना है कि वो अपने अभियान को मधेश के साथ–साथ देशव्यापी बनाकर नई पार्टी का गठन करेंगे । जबकि देखा जाए तो अब मधेश में पहले जैसी स्थिति नहीं है । महंत ठाकुर, उपेन्द्र यादव जैसे नेताओं की शाख कमजोर हो रही है और राउत की जनमत पार्टी खुद को पुरानी मधेश–केंद्रित पार्टियों और नेताओं के विकल्प के रूप में पेश कर रही है । ऐसे समय में महतो के लिए खुद को मधेश की राजनीति के केंद्र में स्थापित करना एक चुनौती है । राजनीतिक दायरे और चर्चा में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उन्होंने जो कदम उठाया है, वह भविष्य में उनके और उनकी मधेस राजनीति के लिए आत्मघाती हो सकता है । इसलिए, इस नई राह में महतो के लिए अवसरों से ज्यादा जोखिम हैं । जनजातियों के समर्थन से खस–आर्य वर्चस्व का मुकाबला करने की प्रक्रिया में वह मधेशियों के अपने पारंपरिक समर्थन और जनमत में हिस्सेदारी खो सकते हैं ।

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