नेपाल–भारत सीमा विवाद – कब होगा समाधान ? : डॉ. श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी मई 2924 । नेपाल और भारत दोनों ही देश एक दूसरे के लिए महत्व रखते हैं । सदियों से चले आ रहे भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंधों के कारण दोनों ही देशों में विदेश नीति का भी विशेष स्थान है । वर्ष १९५० की ‘भारत–नेपाल शांति और मित्रता संधि’ दोनों देशों के बीच मौजूद विशेष संबंधों का आधार है । यह नेपाल और भारत के मध्य द्विपक्षीय संधि है जिसका उद्देश्य दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक संबंध स्थापित करना है । यह संधि दोनों देशों के बीच लोगों और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही और रक्षा एवं विदेशी मामलों के बीच घनिष्ठ संबंध तथा सहयोग की अनुमति देती है । साथ ही यह संधि नेपाल को भारत से हथियार खरीदने की सुविधा भी देती है । इस संधि के द्वारा नेपाल को एक भू–आबद्ध देश होने के कारण कई विशेषाधिकारों को प्राप्त करने में सक्षम बनाया है । भारत–नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के संबंधों की विशिष्टता है, जिससे दोनों देशों के लोगों को आवागमन में सुगमता रहती है । दोनों देशों के बीच १८५० किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है, जिससे भारत के पाँच राज्य–सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं ।
भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं है । लगभग ९८% प्रतिशत सीमा की पहचान व उसके नक्शे पर सहमति बन चुकी है, कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद है जिसे बातचीत के माध्यम से सुलझाने की प्रक्रिया चल रही है । किन्तु समय समय पर यह विवाद तूल पकड़ने लगता है । २०२० नेपाल और भारत के बीच तनाव उस समय उत्पन्न हुआ जब भारत ने कालापानी क्षेत्र में सड़क निर्माण किया । जिसका नेपाल ने विरोध किया क्योंकि नेपाल का कहना था कि यह सड़क बिना किसी वार्ता के भारत सरकार ने बनाई है । नेपाल ने इस संबंध में वर्ष १८१६ में हुई सुगौली संधि का जिक्र किया और यह कहा कि, सुगौली संधि (वर्ष १८१६) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख शामिल हैं, और यह नेपाल का अभिन्न अंग हैं ।
एंग्लो–नेपाली युद्ध के पश्चात् वर्ष १८१६ में नेपाल और ब्रिटिश भारत द्वारा सुगौली की संधि हस्ताक्षरित की गई थी । उल्लेखनीय है कि सुगौली संधि में महाकाली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में परिभाषित किया गया है । किन्तु यह भी जग जाहिर है कि नदियाँ रास्ता बदलती हैं और इसकी सीमा भी परिवर्तित होती है ।
आखिर क्या है पूरा विवाद ?
भारत के उत्तराखंड और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रदेश प्रांतों के बीच दोनों देशों की सीमा पर एक इलाका है, जिसे काला पानी इलाका कहते हैं । ये इलाका कालापानी नदी की घाटी में फैला हुआ है । भारतीय श्रद्धालु इसी घाटी से हो कर कैलाश–मानसरोवर की तीर्थ यात्रा पर जाते हैं । इस इलाके में सबसे ऊंचाई पर एक दर्रा है जिसे लिपुलेख दर्रा कहते हैं । वहां से उत्तर–पश्चिम की तरफ कुछ दूर एक और दर्रा है जिसे लिम्पियाधुरा दर्रा कहते हैं । भारत के उत्तराखंड और नेपाल के धारचूला के बीच बहती शारदा नदी, जिसे नेपाल में काली या महाकाली नदी भी कहा जाता है । लिपुलेख और कालापानी घाटी से ले कर लिम्पियाधुरा तक पूरा का पूरा विवादित इलाका है । भारत इसे अपने अधीन होने का दावा करता है और नेपाल अपने । १९९८ से दोनों देशों के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत चल रही है । ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के रिश्ते दोस्ताना हैं इसलिए ये विवाद कभी भड़कता नहीं है और इसके प्रबंधन की प्रक्रिया चलती रहती है ।
लेकिन २० मई २०२० को मामला अचानक गंभीर हो गया जब नेपाल ने अपना एक नया नक्शा जारी कर दिया जिसमें पहली बार विवादित इलाके को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया । भारत के विरोध के बावजूद १८ जून, २०२० को, नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन करके रणनीतिक रूप से तीन महत्वपूर्ण इलाकों लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को शामिल करके देश के राजनीतिक मैप को अपडेट करने का प्रोसेस पूरा किया । इस फैसले पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे “एकतरफा कार्यवाही” कहा ।
वर्तमान में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर भारत अपना अधिकार रखता है । नेपाल पांच भारतीय राज्यों– सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साथ १,८५० किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा साझा करता है । सीमा विवाद का मुद्दा समय–समय पर उठता रहा है खास कर जब भी सत्ता में माओवादी की सरकार रही है, यह मसला सामने आता रहा है । जून २०२३ में प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल ‘प्रचंड’ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान दोस्ती की भावना के तहत सीमा विवाद को हल करने की बात कही थी ।
किन्तु पिछले दिनों सौ के नोट पर नेपाल के नए नक्शे को छापने के निर्णय के साथ ही सीमा विवाद फिर से चर्चा में है । वैसे जारी किए जाने वाले १०० रुपये के नोटों की छपाई को लेकर भारत की नाराजगी पर प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल ‘प्रचंड’ की सरकार ने कहा है कि इस फैसले में नया कुछ नहीं है । नेपाल सरकार की प्रवक्ता और सूचना एवं संचार मंत्री रेखा शर्मा ने भी कहा है कि ये एक नियमित प्रक्रिया है । उन्होंने एक अन्तर्वार्ता में कहा कि, “नेपाल राष्ट्र बैंक में पुराने नक्शों वाले बैंक नोट खत्म होने वाले हैं, इसलिए उन्हें नए नोट छापने की अनुमति दी गई है ।” इससे अधिक कुछ नहीं है ।
वहीं भारत में चुनाव का समय है और वहाँ की सरकार का ध्यान पूरी तरह से फिलहाल चुनाव केन्द्रित है । फिर भी ऐसे में ही नेपाल सरकार के इस फैसले पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि, “नए नोटों में दोनों देशों के बीच विवादित क्षेत्र का नक्शा शामिल करने के नेपाल के एकतरफा फैसले का वास्तविक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा ।”
उन्होंने आगे कहा, “हमारी स्थिति बहुत स्पष्ट है । हम एक स्थापित मंच से अपनी सीमाओं के बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन इस बीच, उन्होंने जो एकतरफा फैसला लिया, वह हमारे बीच की स्थिति या उस जगह की वास्तविकता को नहीं बदल सकता ।”
एक और जहां नेपाल सरकार के इस फैसले से भारत सरकार में नाराजगी है, वहीं नेपाल के ही कूटनीति और अर्थव्यवस्था के कुछ विशेषज्ञों ने भी इसे प्रचंड सरकार का ‘अपरिपक्व’ कदम बताया है । नेपाल ने साल २०२० के जून महीने में देश का आधिकारिक मानचित्र जारी किया था जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को दिखाया गया है । इसी महीने नेपाल ने संविधान में संशोधन किया और उसके बाद से देश के आधिकारिक दस्तावेजों और मोहरों में नए नक्शे का इस्तेमाल किया जा रहा है । वर्तमान परिस्थिति में जब निरंतर सरकार की लोकप्रियता घट रही है और अस्थिरता बनी हुई है ऐसे में कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार का ये फैसला, “केवल लोकप्रियता के लिए लिया गया” है, यह माना जा रहा है । विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के नए नक्शे को जो चार साल पहले जारी किया गया था उसे अभी तक अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल पाई है । ऐसे में सरकार का यह निर्णय भारत को उकसाने जैसा ही है ।
पिछले साल अगस्त में जब चीन ने अपने देश का नया नक्शा जारी किया था तो उसमें नेपाल के पुराने नक्शे को ही अंकित किया गया है । इससे जाहिर है कि नेपाल के नए नक्शे को चीन भी नहीं मान रहा है । जबकि हमेशा से एमाले माओवादी के इस निर्णय के लिए यह कहा जाता रहा है कि यह चीन के प्रभाव से लिया गया है । संसद की अंतरराष्ट्रीय संबंध समिति में पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल समेत कई सांसदों ने ये सवाल किया कि नेपाल के अपडेटेड नक्शे के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जानकारी दी गई या नहीं । क्योंकि इसका कोई रिकार्ड सरकार के पास नहीं है । तत्कालीन विदेश मंत्री ज्ञावली कहते रहे हैं कि “काठमांडू में अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों को नेपाल के नए नक्शे के बारे में जानकारी दे दी गई है ।” किन्तु यहाँ भी सरकार के पास कोई रिकॉर्ड प्राप्त नहीं है । सरकार भले ही यह कहे कि नोट पर नक्शा छापने का निर्णय एक नियमित निर्णय है परंतु सरकार के इस फैसले से चर्चा का बाजार तो अवश्य गर्म हो गया है । बिना किसी पूर्व तैयारी के आखिर यह निर्णय क्यों लिया गया । जबकि नए नक्शे को लेकर कई सवाल पूर्ववत है । इसी विषय पर राष्ट्रपति के आर्थिक सलाहकार और नेपाल राष्ट्र बैंक के पूर्व गवर्नर चिरंजीवी नेपाल ने यह कहा कि “राष्ट्र बैंक को नोटों पर नया नक्शा लगाने की अनुमति देने के सरकार के फैसले से नेपाल को भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में दिक्कत हो सकती है । नेपाल का संविधान केवल देश के भीतर ही लागू होता है । लेकिन नेपाली रुपये के नोट पड़ोसी भारत के साथ सीमा क्षेत्रों में भी प्रचलन में हैं । नेपाल के तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में कारोबारी लेनदेन आम तौर पर नेरु (नेपाली रुपया) और भारु (भारतीय रुपया) में किया जाता है । जैसे ही नए नक्शे वाले १०० रुपये के नेपाली नोट बाजार में आएंगे, संभावना है कि ये भारत से लगने वाले सीमावर्ती बाजारों में ये काम नहीं करेंगे । इस वजह से खतरा है कि भारत सीमावर्ती इलाकों में १०० रेट के नोटों के साथ–साथ अन्य मूल्य वर्ग के नेपाली नोटों के इस्तेमाल पर भी रोक लग सकता है । हमें सबसे पहले नए मानचित्र की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ानी चाहिए थी ।
देश के आर्थिक स्थिति के जानकार चिरंजीवी नेपाल का उक्त वक्तव्य यथार्थ को दर्शाता है । किन्तु उनके सही आकलन पर राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है । अन्य विशेषज्ञों का भी यह मानना है कि नेपाल को अपनी जमीन पर दावा अवश्य करना चाहिए किन्तु इससे पहले उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए और नक्शे को मान्यता दिलानी चाहिए । यह मुद्दा भी उठाना चाहिए ताकि इसका असर भारत के साथ अन्य संबंधों पर न पड़े । नए मानचित्र को संसद से पारित करने के बाद, इसकी सूचना उन देशों और संयुक्त राष्ट्र निकायों को दी जानी चाहिए थी जिनके साथ हमारे राजनयिक संबंध हैं ।
अंतरराष्ट्रीय संबंध समिति के अध्यक्ष राजकिशोर यादव का कहना है कि सरकार ने दीर्घकालिक प्रभाव को देखे बिना ही नक्शे को नोटों में डालने का फैसला किया है । उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह निर्णय केवल घरेलू मुद्दों के आधार पर लिया गया है । इस बात को ध्यान में नहीं रखा गया है कि यह हमारे हितों की कितनी रक्षा करता है या उन्हें कैसे प्रभावित करता है ।”
नेपाल द्वारा पहले जारी किए गए मानचित्र में शामिल क्षेत्रों तक सरकार की पहुंच न होने के कारण नेपाल उस क्षेत्र में जनगणना भी नहीं करा पा रहा है । कुछ कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल द्वारा नक्शा प्रकाशित करने के बाद नेपाल–भारत सीमा समस्या के समाधान के लिए बने स्थायी और अस्थायी तंत्र के काम पर भी असर पड़ा है ।
वैसे नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह दो देशों के मध्य घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक संधि, दस्तावेजों, तथ्यों और नक्शों के आधार पर सीमा के मुद्दों का कूटनीतिक हल प्राप्त करने के लिये प्रतिबद्ध है । वहीं भारत को भी अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की भी जरूरत है । भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति दूरदर्शी बनानी होगी और यथाशीघ्र इन विवादों का हल ढूंढना होगा ।
सीमा विवाद समस्या समाधान के लिए की गई पहल
नेपाल और भारत के अधिकारी कहते रहे हैं कि ९८ फीसद सीमा क्षेत्र की मैपिंग हो चुकी है । लेकिन सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक और सीमा विशेषज्ञ बुद्धिनारायण श्रेष्ठ का कहना है कि दोनों देशों के बीच करीब ६०६ वर्ग किलोमीटर के इलाके को लेकर विवाद है । उनका कहना है कि कालापानी, लिपुलेक, लिम्पियाधुरा में ३७२ वर्ग किलोमीटर, गंडक क्षेत्र स्थित सुस्ता में १४५ वर्ग किलोमीटर और शेष ६९ स्थानों में लगभग ८९ वर्ग किलोमीटर पर अतिक्रमण किया गया है । नेपाल और भारत के बीच १९८१ से ही सीमांकन का काम शुरू किया गया था । साल २००५ में, पश्चिमी नेपाल में दारचुला के गरबांग क्षेत्र में सीमा सर्वेक्षण पर गए नेपाल और भारत के सीमा तकनीशियनों के बीच महाकाली नदी कहां से निकलती है, इसी बात पर सहमति नहीं बन पाई थी । साल २०१४ में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान, दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने सीमा मुद्दे को हमेशा के लिए ठीक करने का संकल्प लिया था ।
इस विषय पर २०२३ में सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक और सीमा विशेषज्ञ बुद्धिनारायण श्रेष्ठ ने कहा था कि समस्या पहले से जटिल हो चुकी है और तकनीकी दक्षता के बजाय राजनीतिक और कूटनीतिक तंत्र की भूमिका अधिक अहम है । श्रेष्ठ के अनुसार, नेपाल और भारत के तकनीशियन सीमांकन के मुद्दों पर काम कर रहे हैं, लेकिन यह बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है । साल १८१६ में नेपाल और तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई सुगौली संधि में महाकाली नदी को सीमांत नदी माना गया था । लेकिन महाकाली नदी के उद्गम को लेकर नेपाल और भारत के बीच चल रहे विवाद के चलते दोनों देश कालापानी पर दावा करते रहे हैं । नेपाली अधिकारी कहते रहे हैं कि संधि के बाद बनाए गए कई मानचित्र कालापानी को नेपाली क्षेत्र के रूप में दिखाते हैं ।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है काला पानी ?
साल १९५१ में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था, इससे पैदा होने वाले जोखिमों के मद्देनजर भारतीय चेकपोस्टों को नेपाल की उत्तरी सीमा की ओर रखा गया था । ‘नेपाल भारत सीमा विवाद महाकाली और सुस्ता’ पुस्तक के अनुसार, कालापानी क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी कब से शुरू हुई इसकी अलग–अलग तारीखें हैं, लेकिन चीन के साथ युद्ध में बुरी तरह हारने के बाद १९६२ में भारतीय सुरक्षा दस्तों की वहां मौजूदगी मजबूत हुई थी । पंचायत काल में पूर्व प्रधानमंत्री कीर्तिनिधि बिष्ट के कार्यकाल में भारतीय सेना की चौकियों को हटा दिया गया, लेकिन कालापानी में भारतीय सैनिक वहीं रह गए । हालांकि कुछ का कहना है कि राजा महेंद्र ने अस्थायी रूप से भारतीय सैनिकों को इलाके में रहने की अनुमति दी थी, इसका कोई ठोस सबूत नहीं दिखता है । इस तरह कालापानी सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन गया जब १९९६ में नेपाल और भारत के बीच महाकाली संधि को संसद द्वारा अनुमोदित किया गया । अब तक यह समझौता लागू नहीं हो पाया है, जिसका एक मकसद महाकाली पंचेश्वर परियोजना बनाना भी है । तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा द्वारा विपक्षी नेता माधव कुमार नेपाल को लिखी चिट्ठी में जिक्र है कि महाकाली के स्रोत का पता लगाने और उसकी मैपिंग करने के लिए एक संयुक्त सर्वेक्षण दल भेजने के लिए नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ था । समझौते के मुताबिक, “सीमांकन के बाद, किसी भी विदेशी सैनिक को नेपाली इलाके के अंदर रुकने या रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी ।”
साल १९९७ में, भारत के तत्कालीन पीएम इंद्र कुमार गुजराल की नेपाल यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने काला पानी समेत अन्य इलाकों के बारे में एक महीने के अंदर जरूरी सबूतों का अध्ययन करने और सुझाव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, लेकिन यह पूरा नहीं हो सका । २०१४ में पीएम मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान, दोनों देशों के विदेश सचिवों को निर्देश दिया गया कि काला पानी और सुस्ता विवादों को सीमा संबंधी विदेश सचिव स्तरीय बातचीत की मदद से हल किया जाए । लेकिन एक बार भी उनका बैठक नहीं हुई है । बल्कि चीन और भारत ने लिपुलेख में एक व्यापार चैनल खोलने पर सहमति जताई, जिसके खिलाफ नेपाल ने दोनों देशों के साथ विरोध दर्ज कराया । भारतीय एक्सपर्ट का कहना है कि १९५४ से २०१५ के बीच दोनों देशों में कई समझौते हुए और बयान जारी हुए लेकिन नेपाल ने कोई सवाल नहीं उठाया ।
किन्तु यह नया नक्शा नेपाल के संविधान का अंग बन चुका है, इसलिए सीमा समस्या के समाधान के लिए नेपाल और भारत में व्यापक सहमति बनाने की और सीमा विवाद को सुलझाने की जरूरत है । संप्रभुता से कोई भी समझौता नहीं कर सकता । दोनों देशों के बीच एक विशेष रिश्ता है और किसी को भी इसे जटिल बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ।

