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विनाश की वजह प्रकृति नहीं, मानवजनित गलतियाँ हैं : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर, 024 । नेपाल की जमीन पर आश्विन १२ गते प्रकृति ने जो विध्वंश मचाया उसकी छाप वर्षों तक रहने वाली है । आकाश से बरसने वाली जलधारा ने जो तबाही मचाई उसकी तस्वीर दिल और दिमाग पर छपी हुई है । काठमांडू के ५५ साल के इतिहास में जो नहीं हुआ था, वह हो गया । ये पहली बार नहीं हुआ है, जब देश में कोई आफत आई हो । कुछ वर्षों पहले जब देश महाभूकम्प की त्रासदी को झेल रहा था, तो उस समय भी देश की ऐसी ही स्थिति थी । उस वक्त भी जनता ने अभिभावकत्व की कमी को देखा था और इस बार भी कमोवेश स्थिति वही दिखी । यह सच है कि आपदा बता कर नहीं आती किन्तु आज का विज्ञान हमें पहले सचेत अवश्य कर देता है और यह सचेतता हमें समय रहते सावधानी अपनाने के लिए सतर्क करती है । परन्तु हमारी सरकार ने हमें सचेत रहने की पूर्व सूचना देकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लिया था । शायद ये उनकी जिम्मेदारी नहीं थी कि आने वाली तबाही से बचने के लिए किसी तरह की कारगर तैयारी की जाए । क्योंकि प्राकृतिक विपदा की जानकारी होते हुए भी सरकार की अक्षमता हमारे सामने आ गई है । यह बात स्वयं प्रधानमंत्री ने भी मानी है । लेकिन यह मान लेना ही सरकार की कार्यशैली को आलोचना से नहीं बचा सकता है ।

सरकार की अक्षमता

जल एवं मौसम विज्ञान विभाग ने ७ गते असोज को विशेष बुलेटिन जारी कर बताया कि १२ गते से सभी सात प्रदेशों में भारी बारिश की संभावना है । मौसम वैज्ञानिक ने पूरे नेपाल में इस मानसून अवधि के दौरान भारी बारिश की संभावना जताई थी और कहा था कि गुरुवार से रविवार तक ५६ जिलों को रेड जोन यानी हाई रिस्क जोन में रखा जाए और हाई अलर्ट रखा जाए । यह जानकारी सरकार के तीनों स्तरों सुरक्षा तंत्र से लेकर आपदा प्रबंधन संस्थाओं तक को मिल गई थी । लेकिन आपदा से पहले जितनी तैयारी होनी चाहिए थी, वैसा होता नजर नहीं आया जिसका प्रतिफल हम सबके सामने है । समय की भयावहता को सरकार समझ नहीं पाई और अपनी पुरानी शैली में ही तैयारियां शुरु कर रखी थी । गुरुवार की रात से तेज बारिश शुरू हो गयी थी, लेकिन सरकार ने शुक्रवार को नदी के स्तर में वृद्धि देखने के बाद काठमांडू से रात्रि बसें बंद करने का आदेश दिया । और नदी के तटीय इलाके में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने के लिए ‘अलर्ट संदेश’ जारी किया, तब तक इस भयंकर आपदा से निपटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी ।

शुक्रवार और शनिवार को ललितपुर, नुवाकोट के विदुर, ललितपुर के गोदावरी और मकवानपुर के हेटौंडा के आसपास इतनी बारिश हुई कि घाटी में नदी किनारे की ज्यादातर बस्तियां शनिवार सुबह होने से पहले ही जलमग्न हो गईं थी । वैज्ञानिक तकनीक की मदद से एक सप्ताह पहले आपदा के खतरे की स्पष्ट जानकारी के बावजूद भारी क्षति हुई और बचाव व राहत का पुराना ढर्रा ही कायम रहा ।

रविवार की शाम तक बाढ़ और भूस्खलन से जान गंवाने वालों की संख्या १७० तक पहुंच गई थी । जो अभी तीन सौ का आंकड़ा पार कर चुकी हैं । हालांकि यह सरकारी आँकड़ा है निस्संदेह यह संख्या और भी अधिक होंगी । कितने ही लोग अभी भी लापता हैं । बीपी और पृथ्वी हाईवे पर सैकड़ों लोग कई दिनों तक फंसे रहे । बाढ़ और भूस्खलन के कारण २० राजमार्गों में से ६९ स्थान आज भी अवरुद्ध हैं क्योंकि १६ से अधिक पुल क्षतिग्रस्त हो गए हैं । जिन्हें व्यवस्थित करने की कोशिश की जा रही है किन्तु मौसम की मार यहाँ भी कार्य को पूरा नहीं करने दे रही है । वैसे तो मानसून का असर कम होने लगा है परंतु सड़कों का अवरोध और उनकी मरम्मत का काम तेजी से नहीं हो पा रहा है । काठमांडू घाटी और आसपास के इलाकों में अभी भी कई लोग उद्धार का इंतजार कर रहे हैं और जो बच गए हैं उनके पास ना तो छत है और ना ही भोजन ।

कहते हैं न कि रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था । देश के अभिभावक का यही हाल दिखा । देश में त्राहि मची हुई थी और देश के प्रधानमंत्री विदेश की धरती पर बोस्टन में हावर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ संवाद कर रहे थे । जबकि उन्हें आपदा की इस स्थिति में किसी भी हाल में देश आ जाना चाहिए था । यहाँ जिस कार्यवाहक के हाथों देश को सौंप कर गए थे कहीं से भी इस आपदा की घड़ी में उनमें वो तत्परता या गंभीरता नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थी । उप प्रधान मंत्री और शहरी विकास मंत्री प्रकाशमान सिंह को कार्यवाहक भूमिका दी गई थी । लेकिन ‘कार्यवाहक सरकार’ न तो संकट से पहले तैयारी कर पाई और न ही संकट के बाद पूरे देश को बचाव कार्यों में जुटा पाई ।

सरकार ही यह चेतावनी दे रही थी कि भारी बारिश होने की संभावना है तो ऐसे में जोखिम वाले इलाकों की पहचान की जा सकती थी और वहां रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सकता था । नदी में जलस्तर बढ़ने पर तटीय क्षेत्र के निवासियों को सूचित करने के लिए एक तंत्र बनाया जा सकता था । लेकिन सरकार ने ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया । संभावित जोखिमों का कोई आकलन नहीं हो पाया था तो उसके अनुसार तैयारी करने की तो कोई बात ही नहीं थी । रेस्क्यू के दौरान यह स्पष्ट दिखा । नदी किनारे की बस्तियां डूबने के बाद तीनों सुरक्षा एजेंसियों के सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था, लेकिन उनके पास पर्याप्त नावें और लाइफ जैकेट तक नहीं थे । तैयारी ही नहीं बचाव में भी सरकार ने तीनों स्तरों पर मजबूत पहल नहीं की ।
शुक्रवार की रात से देश में बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित होने के बावजूद सुबह कार्यालय समय शुरू होने तक अधिकांश जिम्मेदार अधिकारी सिंह दरबार में मौजूद नहीं थे । शनिवार सुबह १० बजे गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव के नेतृत्व में कमांड पोस्ट की पहली बैठक हुई । बैठक में गृह मंत्री रमेश लेखक और गृह सचिव गोकर्णमणि दावाड़ी भी मौजूद थे । सभी की बातें सुनने के बाद उन्होंने तत्काल राहत एवं बचाव के निर्देश दिए । बैठक में सड़क विभाग से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक के अधिकारी शामिल हुए और आपदा के खतरे पर चर्चा की । फिर गृह मंत्री ने केंद्रीय सुरक्षा समिति की बैठक की । उस बैठक में भी देश के हालात और गृह मंत्री के निर्देशों के बारे में ब्रीफिंग हुई थी । लेकिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री सिंह इस संकट में कहीं भी आगे बढ़ते नजर नहीं आये । उन्होंने कैबिनेट की आपात बैठक तक नहीं की । और जब बैठक हुई तब भी नेताओं में कोई सजगता या तत्परता दिखाई नहीं दे रही थी ।

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अब सवाल यह है कि क्या यह विनाश सिर्फ प्रकृति की वजह से हुआ या हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं ?
शहरीकरण ने बरबादी के द्वार खोले
१२ गते अश्विन को २४ घंटों में काठमांडू घाटी के विभिन्न स्थानों पर अत्यधिक वर्षा मापी गई । त्रिभुवन हवाई अड्डा वर्षा मापक केंद्र ने २३९.७ मिमी बारिश दर्ज की, जिसने २२ साल पहले के १७७ मिमी के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया । काठमांडू में शुक्रवार सुबह से शुरू हुई भारी बारिश रविवार दोपहर के बाद ही रुकी और तब तक तो विनाश ने अपना रंग दिखा दिया था । काठमांडू की नदियों में बाढ़ अपने उफान पर थी और नदियों के आसपास के शहर और सड़कें जलमग्न हो गई थीं । आलम ये रहा कि इस विध्वंश ने जाने कितने लोगों की जानें ले ली, कितने लोगों को घर विहीन बना दिया । कितने ही लोग अभी भी लापता हैं । घाटी में पहले भी छोटी–बड़ी बाढ़ें आती रही हैं, लेकिन उस समय नदी अपने प्रवाह क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से बहती थी, जिससे नदी के दाएं और बाएं किनारों पर ऐसी अप्रत्याशित बाढ़ और क्षति महसूस नहीं होती थी । लेकिन मानवीय अतिक्रमण के कारण वर्तमान स्थिति जटिल हो गई है ।

नदियों में कूड़ा–कचरा मिलने से जल प्रवाह अवरुद्ध होने से आसपास के इलाकों में बाढ़ की आशंका बहुत बढ़ गयी है और साथ ही विश्व भर में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण अप्रत्याशित घटनाएं घट रही हैं । वैश्विक स्तर पर हम यह प्रत्यक्ष रूप से देख भी रहे हैं ।

काठमांडू घाटी में जल अवशोषण और भंडारण प्रणाली अव्यवस्थित है । पहले घाटी के खेत, खुली जमीन और हरे–भरे इलाके पानी को सोख लेते थे, पानी के बहाव के वेग को कम कर देते थे और धीरे–धीरे जमीन में समा जाते थे । लेकिन अब घाटी में असंगठित शहरीकरण के कारण जल अवशोषण क्षमता कम हो गई है । काठमांडू की प्रमुख नदियाँ, जैसे बागमती, विष्णुमती, धोबी खोला, नक्खू खोला, मनोहरा, हनुमंते आदि मानव अतिक्रमण के कारण संकीर्ण हो गई हैं । विष्णुमती, धोबी खोला, मनोहरा, हनुमंते, गोदाबरी खोला और नक्खू खोला सहित नदियाँ बागमती नदी की सहायक नदियाँ हैं । हनुमंते और गोदाबरी नदियाँ मनोहरा नदी में मिलती हैं और शंखमुल योग पार्क के पास बागमती नदी में मिलती हैं, जबकि नक्खू नदी चोभार पहाड़ी के ऊपर की ओर और बागडोल बटिका के नीचे की ओर बागमती नदी में मिलती है ।

नदी के निचले तटीय क्षेत्र में जो प्रभाव और क्षति हो सकती है, वह ऊपरी तटीय क्षेत्र में की गई गतिविधियों से अत्यधिक संबंधित है । जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन के बिना एक स्वस्थ और व्यवस्थित नदी प्रणाली संभव नहीं है, जो निचले तटीय क्षेत्रों में बाढ़, गेग्रान कटाव जैसी जल–जनित आपदाओं से संबंधित समस्याओं को कम करने और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है । हालांकि इन नदियों में पर्याप्त जलग्रहण क्षेत्र हुआ करते थे, लेकिन अब नदी के किनारों पर बसी आबादी के कारण बाढ़ की समस्या गहरा गई है । इससे नदी तंत्र और जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा में चुनौती पैदा हो गई है । वर्तमान बाढ़ और जल प्लावन का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अतिक्रमण है । उदाहरण के लिए, नक्खू खोला क्षेत्र की पहाडि़यों में वनों की कटाई और बेतरतीब खनन के कारण, निचले तटीय क्षेत्र में भूमि को उर्वरित किए बिना मिट्टी, पत्थर और मिट्टी नदी में बह कर नदी की गहराई को कम करते हैं और यह स्थिति बाढ़ को आमंत्रित करते हैं ।

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इसी तरह, लेले नल्लू में दमसिडोल सामुदायिक वन की कुछ पहाडि़याँ अब उजाड़ दिखती हैं, वहाँ कोई पेड़ नहीं हैं, केवल भूस्खलन की संभावना वाली चट्टानें हैं । नंगे उत्खनित पहाड़ों से निकलने वाले पत्थर, धूल और मिट्टी सीधे नदी में मिल जाते हैं ।

एक अध्ययन के अनुसार, काठमांडू के ६६ प्रतिशत से अधिक शहरी क्षेत्र को निर्मित क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया गया है, जिससे जमीन की सतह के नीचे पानी के रिसाव की दर बहुत कम हो गई है । जलस्रोत का सतह भी घटता जा रहा है । यही कारण है कि सदियों से जो पानी के स्रोत रहे हैं वह अब सूखने लगे हैं ।
दूसरी ओर जमीन का खुरदरापन गुणांक बहुत कम हो गया है और जिसके कारण पानी जमीन पर बिना कहीं अटके बहता चला जाता है । जो कम बारिश होने पर भी बाढ़ का कारण बन जाता है । ऊपरी तटीय क्षेत्र में प्राकृतिक और मानव–जनित तलछट कटाव के कारण, नदी का स्तर बढ़ रहा है और नदी चैनल की वहन क्षमता बहुत कम हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप नदी के दाएं और बाएं हिस्से में अत्यधिक बाढ़ और क्षति हो रही है ।
काठमांडू में आई मौजूदा बाढ़ निश्चित तौर पर ५४ साल की सबसे बड़ी बाढ़ है, लेकिन टिस्टुंग में ५४० मिमी और कंचनपुर में ६०० मिमी की तुलना में यहाँ कम ही पानी मापा गया है फिर भी जो आपदा आई वह हमारी पूर्व तैयारी की कमी को ही उजागर करता है । काठमांडू में अनियोजित शहरीकरण और निर्माण कार्य से बाढ़ का खतरा बढ़ गया है । जैसे–जैसे लोग नदी के किनारे घर बनाते जा रहे हैं, नदी के बहने की जगह कम होती जा रही है । इससे बाढ़ आ सकती है और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है, लेकिन किसी ने भी निर्माण से पहले इन मुद्दों का गंभीरता से अध्ययन नहीं किया है । और आज प्रत्यक्ष इसका परिणाम देखने को मिल रहा है । बारिश हुई और नदियों के आस–पास के घरों को बहा ले गई ।

यदि उचित योजना बनायी गयी होती तो ऐसी समस्या उत्पन्न नहीं होती । अब जबकि कई लोगों ने नदी के किनारे घर बना लिए हैं, तो ऐसे में नुकसान की संभावना काफी बढ़ गई है । इसलिए, अब हमें बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के उपाय खोजने होंगे । बाढ़ और बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए एक एकीकृत नदी प्रबंधन योजना लागू करना आवश्यक है ।
नदी के किनारे बेतरतीब बनी संरचनाओं और बस्तियों का प्रबंधन किया जाना चाहिए । भविष्य में बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अब हमारा ध्यान बाढ़ की तैयारी और उपलब्ध क्षेत्रों के प्रबंधन पर होना चाहिए ।
बाढ़, भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएँ अक्सर बिना किसी चेतावनी के आती हैं, और इन घटनाओं को पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है, लेकिन निश्चित रूप से, आपदा से पहले और बाद में पर्याप्त तैयारी के साथ, क्षति की मात्रा को कम किया जा सकता है ।

अब आगे क्या करना चाहिए ?
नेपाल को बाढ़, भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से अधिक खतरा है । भूकंप और मिश्रित आपदाओं के जोखिम के मामले में नेपाल क्रमशः ११वें और १६वें स्थान पर है । नेपाल उस भूमि पर स्थित है जहां भारतीय और यूरेशियन भूमि आपस में टकराती हैं, जिसके कारण यहां अक्सर बड़े भूकंप आते रहते हैं । मेपलक्रॉफ्ट की जलवायु परिवर्तन भेद्यता सूची में नेपाल चौथा सबसे असुरक्षित देश है, जिसके अनुसार नेपाल “उच्चतम जोखिम” समूह में है । जलवायु परिवर्तन के असर से नेपाल भी खतरे में है और यहां तापमान भी बढ़ रहा है और बारिश भी अनियमित हो रही है ।

जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़ और प्रतिकूल मौसम जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ती जा रही है । इसके परिणामस्वरूप महामारी और सूखा फैलने से समुदाय के जीवन और कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । यद्यपि जलवायु परिवर्तन सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है, लेकिन सबसे पहले इसका आपदा स्थितियों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है ।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ के खतरे के मामले में नेपाल दुनिया में ३०वें स्थान पर है । हम जानते हैं कि बाढ़ पूर्णतः प्राकृतिक आपदा नहीं है । वनों की कटाई, शहरीकरण, नदियों और नालों के किनारों पर मानवीय गतिविधियाँ, जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि के कारण हिम नदी में बाढ़ आने और बांधों के टूटने से बाढ़ आती है । यदि समय रहते विभिन्न आपदा जोखिम न्यूनीकरण उपायों को अपनाकर बाढ़ का प्रबंधन किया जाए तो इससे होने वाली मानवीय एवं शारीरिक क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है । नदियों में बाढ़ के सकारात्मक पहलू भी हैं । विश्व की प्रमुख सभ्यताएँ एवं शहर नदियों के किनारे पाए जाते हैं । नदियों में बाढ़ स्वच्छ जल का स्रोत है । बाढ़ तब आती है जब अत्यधिक वर्षा और बर्फ के पिघलने के कारण नदी में जलस्तर एक निश्चित ऊंचाई से अधिक हो जाता है । उचित बाढ़ प्रबंधन से आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ प्राप्त करने और मानव संसाधनों की वार्षिक हानि को कम करने के लिए एकीकृत बाढ़ प्रबंधन पद्धति को अपनाना प्रासंगिक है ।

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बाढ़ प्रभावित क्षेत्र चिकनी मिट्टी, सिंचाई के लिए पानी की सुविधा और नदियों और नालों के किनारे जल परिवहन सुविधाओं के मामले में उपयुक्त हैं । यदि ठीक से प्रबंधन किया जाए, तो बाढ़ वाले क्षेत्रों की आर्द्रभूमियाँ जैविक विविधता से समृद्ध हो सकती हैं । अतः सामाजिक, आर्थिक एवं जैविक विविधता की दृष्टि से बाढ़ को नियंत्रित करने के बजाय उसका प्रबंधन करना उचित माना जाता है ।
नेपाल में नदियों, नहरों और असंख्य झरनों से पानी के निरंतर प्रवाह का उपयोग बिजली पैदा करने, पीने और खेतों की सिंचाई के लिए पर्याप्त रूप से नहीं किया जा सका है । यही वजह है कि जब इन प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन नहीं किया जाता है, तो बरसात के मौसम में खेतों में बाढ़ आ जाती है, आसपास की भूमि बह जाती है, जिससे जन–धन की भारी हानि होती है ।
वार्षिक बाढ़ का जोखिम विश्लेषण और लेखांकन तथा आपदा शमन योजनाएँ तैयार करना और कार्यक्रम लागू करना मुख्य कार्य है जो आपदा से पहले किया जाना चाहिए । किन्तु आपदा न्यूनीकरण में लगे सरकारी और गैर–सरकारी संगठन आपदा राहत और बचाव पर उतना व्यवस्थित रूप से काम नहीं कर रहे हैं जितना वे करते हैं ।

कुछ अध्ययनों से पता चला है कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर होने वाले व्यय से लगभग ६०० से १,००० प्रतिशत अधिक राशि राहत और बचाव पर खर्च की जाती है । इसका मतलब यह भी है कि आपदा से होने वाली मानवीय और भौतिक क्षति और राहत और बचाव की लागत को बचाने के लिए प्रभावी आपदा जोखिम न्यूनीकरण का कोई विकल्प नहीं है । इस कारण से, पिछले कुछ दशकों में, दुनिया भर में आपदा प्रबंधन का ध्यान राहत से आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर स्थानांतरित हो गया है । बाढ़ के कारण मानव संसाधनों के नुकसान को कम करने और भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जोखिम–संवेदनशील भूमि–उपयोग पद्धति को अपनाना सबसे अच्छा तरीका है । अनुमान है कि नेपाल में ६ हजार से अधिक नदियाँ और नाले हैं । यह पाया गया है कि बाढ़ से ४००,००० हेक्टेयर से अधिक भूमि सीधे तौर पर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं ।
बाढ़, कटाव और कटाव के आधार पर नदी क्षेत्रों में होने वाले संभावित जोखिमों और क्षति का आकलन, पहचान और मूल्यांकन करने की आवश्यकता है । लेकिन ऐसा कम ही पाया जाता है कि ऐसी आपदाओं का जोखिम और क्षति के लिए गहन अध्ययन और मूल्यांकन किया गया हो । संभावित जोखिम और क्षति के आधार पर भूमि को वर्गीकृत करने के लिए भूमि उपयोग नीति का प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है । सरकार को ही नहीं आम नागरिक को भी जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रबंधन हेतु वृक्षों का रोपण करना चाहिए । जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के कटाव को कम करने के लिए चेक डैम और बायोइंजीनियरिंग का निर्माण होना चाहिए । जलग्रहण क्षेत्रों में छोटे पैमाने पर जल संचयन जलाशयों और जल रिचार्जिंग तालाबों का निर्माण करना भी आवश्यक है । इतना ही नहीं आवासीय क्षेत्रों में निजी या सार्वजनिक भवनों का निर्माण करते समय, कानून द्वारा यह निर्दिष्ट किया जाना चाहिए कि पर्याप्त खुली भूमि रखी जानी चाहिए । गेग्रान÷तलछट प्रबंधन योजना तैयार की जानी चाहिए और उसी आधार पर नदी सामग्री का उपयोग करके खनन किया जाना चाहिए और नदी के बीच में गेग्रान पाटन से बने ढेरों का भी प्रबंधन किया जाना चाहिए ।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, बाढ़ की वापसी की अवधि के आधार पर नदी का हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन और बाढ़ और बाढ़ के कारण होने वाले जोखिम क्षेत्रों को वर्गीकृत करते हुए जोखिम के आधार पर निर्धारण किया जाना चाहिए । इसके अलावा, आपदा प्रभावित समुदायों को उनकी आपदा–प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए बाढ़, आपदा–संबंधी प्रशिक्षण और आवश्यक जानकारी के माध्यम से सूचित किया जाना चाहिए ।
वर्तमान में प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में पैसा जमा किया जा रहा है । अपने अपने स्तर पर सभी सहयोग कर रहे हैं । लेकिन भ्रष्टाचार से पीडि़त इस देश में राहत कोष का क्या हश्र हो सकता है यह भी विचारणीय है । क्योंकि इस स्थिति से यह देश भूकम्प के समय गुजर चुका है । इस देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ये आपदाएँ कभी भी कहीं भी घटित हो सकती हैं और होती रही हैं बावजूद इसके कभी भी किसी भी सरकार में इन बातों से निपटने के लिए कोई गंभीरता या तत्परता दिखाई नहीं दी है । जिसका खामियाजा जनता अपना जीवन गंवा कर देती आई है और फिलहाल दे रही है ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

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