उपचुनाव नतीजा : नई पार्टी नहीं जगा सकी उम्मीद – लिलानाथ गौतम
लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक दिसम्बर 025 । उप चुनाव को आम निर्वाचन के लिए एक मतसर्वेक्षण माना जाता है । इसमें प्राप्त मत राजनीतिक दलों की ताजा स्थिति को भी दर्शाता है । अगर इस कथन को मानते हैं तो नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले जैसी पुरानी पार्टियों के प्रति प्रकट तीव्र असन्तुष्टि और घृणा के बाबजूद भी इन्हीं पार्टियों को उप चुनाव में अधिक मत मिला है । अर्थात् पुरानी पार्टियों का दबदबा बाकी है, खत्म नहीं हुआ है ।
चुनावी परिणाम
मार्गशीर्ष १६ गते सम्पन्न उपचुनाव का अंतिम मत परिणाम आ चुका है । वि.सं. २०७९ वैशाख में स्थानीय सरकार संचालन के लिए ३६ हजार से अधिक जनप्रतिनिधि चयनित हुए थे । उसके ढाई वर्ष के बाद देशभर में ४४ जनप्रतिनिधियों का स्थान रिक्त हो गया । उसी खाली सीटों के लिए उपचुनाव हुआ था । चुनावी परिणाम के अनुसार उप चुनाव में ७ राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व दिखाई दिया है । साथ में एक स्वतन्त्र उम्मीदवार भी विजयी हुए हैं । एक दर्जन से भी अधिक राजनीतिक पार्टियां चुनावी प्रतिस्पर्धा में थे । उसमें से नेपाली कांग्रेस, नेकपा (एमाले), नेकपा (माओवादी केन्द्र), जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा), नेकपा (एकीकृत समाजवादी) और नेपाल मजदूर किसान पार्टी (नमकिपा) के उम्मीदवारों ने चुनाव में जीत हासिल की है ।

संघीय संसद् में प्रतिनिधित्व करनेवाले राजेन्द्र लिङ्देन नेतृत्व का राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी (राप्रपा), डा. सीके राउत नेतृत्व का जनमत पार्टी, अशोक राई नेतृत्व का जनता समाजवादी पार्टी (जसपा), महन्थ ठाकुर नेतृत्व का लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा), रमेश चौधरी नेतृत्व का नागरिक उन्मुक्ति पार्टी, डा. बाबुराम भट्टराई नेतृत्व का नेपाल समाजवादी पार्टी, प्रभु शाह नेतृत्व का आम जनता पार्टी (आजपा) और चित्रबहादुर केसी नेतृत्व का राष्ट्रीय जनमोर्चा पार्टी के उम्मीदवार भी चुनावी प्रतिस्पर्धा में थे । लेकिन इनमें से किसी भी पार्टी के उम्मीदवारों ने कोई भी जीत हासिल नहीं की । इनमें से कई पार्टियां ऐसी भी हैं, जो खुद को वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति मानती है । लेकिन जनता में उनकी हैसियत शून्य बराबर दिखाई दी । उसमें से दो पार्टियां है– रवि लामिछाने नेतृत्व वाला रास्वपा और डा. सीके राउत नेतृत्व का जनमत पार्टी । कांग्रेस–एमाले जैसे परम्परागत मूल पार्टी के खिलाफ खुद को वैकल्पिक शक्ति माननेवाले और दो–तीन साल पहले राजनीति में धमाकेदार इन्ट्री मारनेवाले जनमत पार्टी हो या राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा), चुनावी परिणाम दोनों पार्टियों के लिए सुखद् नहीं रहा ।
परिणाम अनुसार ४४ सीटों में से नेपाली कांग्रेस अकेले ने १९ सीट पर जीत हासिल की है, जो ४३ प्रतिशत है । कांग्रेस ने कीर्तिपुर नगरपालिका में मेयर पद के साथ–साथ १६ वडाध्यक्ष, २ जिला समन्वय समिति प्रमुख में जीत हासिल की है । वैसे तो इससे पहले विजयी कई स्थानों में कांग्रेस उम्मीदवार पराजित हुए हैं । यहां एक बात स्मरणीय है, ४४ रिक्त स्थानों में से २७ स्थान ऐसा है, जहां इससे पहले नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी । इस तथ्यांक को देखते हैं तो २ पालिका प्रमुख, ३ उपप्रमुख और ३ वडाध्यक्ष पद नेपाली कांग्रेस ने खो दिया है ।

चुनावी परिणाम अनुसार १ पालिका प्रमुख, ३ उपप्रमुख और ७ वडाध्यक्ष के साथ ११ सीट जीत कर प्रमुख प्रतिपक्षी दल माओवादी केन्द्र दूसरे स्थान पर है । यह माओवादी के लिए अनपेक्षित और सुखद परिणाम है । क्योंकि माओवादी खुद में भी विश्वास नहीं था कि उनके पक्ष में इसतरह का जनमत है । दूसरी ओर सत्ताधारी कांग्रेस और नेकपा एमाले का मानना था कि माओवादी पार्टी में अकेले चुनावी प्रतिस्पर्धा करने की हैसियत नहीं है और इसका अस्तित्व कांग्रेस–एमाले के कारण बना रहा है । लेकिन चुनावी परिणाम ने इस कथन को गलत साबित कर दिया । माओवादी इतना भी कमजोर नहीं दिखाई दिया, जो सोचा जा रहा था ।
इसके ठीक विपरित परिणाम केन्द्रीय सत्ता में नेतृत्व करनेवाली प्रधानमन्त्री के पार्टी नेकपा एमाले में दिखाई दी है । उपचुनाव में एमाले उतना शक्तिशाली नहीं दिखा, जो प्रचार किया जा रहा था । एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली प्रधानमन्त्री पद पर बैठक कर बारबार दावा कर रहे थे कि एमाले के विरुद्ध चारों ओर आक्रमण हो रहा है, लेकिन जनता के बीच एमाले और भी शक्तिशाली हो रही है । चुनावी परिणाम ने एमाले को ८ सीटों के साथ तीसरी शक्ति बना दी है । वैसे तो पूर्व चुनावी परिणाम अनुसार ८ सीटों में से एमाले के लिए ३ सीट अधिक है । क्योंकि ४४ रिक्त सीटों में से सिर्फ ५ सीट में ही एमाले के उम्मीदवार रिक्त हो गए थे । ४४ सीटों में से जसपा ने २ सीट प्राप्त किया है । नेकपा समाजवादी, रास्वपा, नेमकिपा और स्वतन्त्र से १–१ उम्मीदवार जीत गए हैं ।
बड़ी पार्टियों के बीच सीटें अदला–बदली
विशेषतः कांग्रेस, एमाले और माओवादी के विरुद्ध सामाजिक संजाल में तीव्र असन्तुष्टि दिखाई देती है । बताया जाता है कि इन्हीं प्रमुख पार्टी के कारण देश आर्थिक रुप में कमजोर बनता जा रहा है, सुशासन नहीं है और वैदेशिक हस्तक्षेप भी बढ़ता जा रहा है । जनता में व्याप्त असंतुष्टि का कयास करते हुए सुशासन, सामाजिक न्याय, आर्थिक समृद्धि, रोजगारी, आत्मनिर्भता जैसे मुद्दों को लेकर रातोरात स्थापित रास्वपा और जनमत जैसी नयी पार्टियों के प्रति दो साल पहले जो आकर्षण था, स्थानीय उपचुनाव में वह नहीं दिखाई दी है । कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसी प्रमुख तीन पार्टियों के बीच में ही मत (सीटें) अदला–बदली हुई है । इसका संकेत यही है कि मतदाता किसी एक पार्टी के प्रति स्थिर नहीं है ।
सम्भावित दिशा
वैसे तो स्थानीय सरकार के लिए हुए उप चुनाव में प्राप्त जनमत को लेकर भविष्यवाणी करना ज्यादा ठीक नहीं है । यह सहज परिस्थिति भी नहीं है । लेकिन राजनीतिक वृत्त में स्थापित कुछ कथन और चुनावी तथ्यांक की ओर गौर करते हैं तो एक सम्भावित दिशा नजर आती है । उप चुनाव यही कहता है कि जनता अस्थिर है, लेकिन भावी दिन प्रमुख तीन पार्टियों के लिए ही सुरक्षित है । नयी–नयी पार्टियां, किसी के लिए भी भविष्य सुरक्षित नहीं है । एक बात तो सच है कि विगत की तुलना में कांग्रेस–एमाले जैसे प्रमुख दो पार्टियों को इस बार कम मत प्राप्त हुआ है । तीसरी शक्ति में रही माओवादी को कुछ ज्यादा ! इससे स्पष्ट होता है कि सत्ता में रहकर अन्टसन्ट बोलने से और गलत प्रचार करने से जनमत हासिल होनेवाला नहीं है ।
दूसरा संकेत है, खुद को वैकल्पिक शक्ति कहने से कोई भी वैकल्पिक शक्ति नहीं हो सकता है । किसी एक चुनाव में रातोरात चुनाव जीतनेवाले व्यक्ति का चरित्र अगर विवादास्पद बन जाता है, उनकी ओर से बारबार गैर राजनीतिक क्रियाकलाप होता रहता है तो उनके नेतृत्व में वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति निर्माण नहीं हो सकता । रास्वपा और जनमत पार्टी के सवाल में यही बात पुष्टि होती है । वैसे तो रास्वपा सम्बद्ध एक उम्मीदवार (काठमांडू–१६ में) ने वडाध्यक्ष में जीत हासिल की है । लेकिन अधिकांश क्षेत्र में उनकी अवस्था दयनीय है । संघीय चुनाव और प्रादेशिक चुनाव में धमाकेदार परिणाम निकालनेवाले रवी लामिछाने हो या डा. सीके राउत ! स्थानीय चुनाव में लाज्जास्पद परिणाम दे रहे हैं । अधिकांश क्षेत्रों में इनके पार्टी के उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए हैं । लगभग यही हालत है– रेशम चौधरी नेतृत्व के नागरिक उन्मुक्ति पार्टी की भी । बार्दिया जिला ठाकुरबाबा–४ का चुनावी परिणाम यही पुष्टि करती है, जबकि बर्दिया जिला नागरिक उन्मुक्ति पार्टी का आधार इलाका है ।
राज्य का चरित्र जब कुशासन, दण्डहीनता और भ्रष्टाचार की ओर अग्रसर होती है, समाज में असन्तुष्टियां बढ़ जाती है । उसी असन्तुष्टि में खेलते हुए कुछ लोग ‘राजनीतिक रोटी’ पकाने लगते हैं । उसमें खुद को वैकल्पिक शक्ति कहनेवाले भी होते हैं । पुरानी राजनीतिक पार्टी तथा नेताओं के बदले में आनेवाले इसतरह की नयी–नयी पार्टी तथा नेता, जब पुराने से भी अधिक कमजोर, कमसल और अविश्वसनीय दिखाई पड़ते हैं तो आम जनता विरोधाभास में पड़ जाते हैं । चुनावी परिणाम इसी की ओर संकेत करता है ।


