नेपथ्य का रहस्य
सम्पादकीय

प्रयत्न करने से ही कार्य पर्ूण्ा होते हैं, किन्तु इसमें सम्बन्धित पक्ष की प्रतिबद्धता आवश्यक होती है र्।र् इमानदारी से अगर किसी कार्य के पीछे लगा जाय तो निश्चित रूप से वह कार्य सिद्ध होता है । जिस वक्त का इंतजार नेपाली जनता उत्सुकता के साथ कर रही थी, वो वक्त आया भी और गुजर भी गया । सत्तापक्ष आज भी तत्पर हैं कि किसी भी हाल में संविधान का तोहफा जनता को मिल जाय, भले ही यह तोहफा जनता की पसन्द का हो, या किसी और की पसन्द का । बहरहाल, स्थिति जो दिखा रही है उससे तो यही जाहिर हो रहा है कि यह तोहफा कहीं और से ही आयात हो रहा है । कल तक जो ओली, पडÞोसी मित्र भारत के करीबी जाने जा रहे थे, आज उनके सुर बदले हुए हैं । झलनाथ खनाल चीन यात्रा के पश्चात कुछ अधिक ही मुखर नजर आ रहे हैं । ऐसे ही कई और भी नाम हैं जिनके चेहरे विदेश यात्रा के पश्चात् कुछ अलग ही रूप में दिख रहे हैं । अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है, जब मोदी की जनकपुर यात्रा रुकवाने के पीछे चीन का नाम दबी जुवान से सामने आया था । सत्ता के बदलते सुर ने शंका और सवाल दोनों को जन्म दे दिया है । आज के जो हालात दिख रहे हैं, उसमें कहीं ना कहीं नेपाल और भारत के रिश्तों को कमजोर करने की साजिश नजर आ रही है । भारत के ऊँचे होते कद से चीन और पाकिस्तान दोनों की पेशानी पर बल पडÞे हुए हैं । नेपाल में भी मोदी जी का प्रभाव दिखने लगा था और नेपाल के साथ बढÞती नजदीकी भी इन्हें नागवार गुजर रही होगी । बदले हुए नेपाल के परिवेश में चीन की पकड बढती हर्ुइ दिख रही है । झलनाथ खनाल तो खुलकर चीन की तारीफों के पुल बाँधते नजर आ रहे हैं । उनका यह कहना कि एक चीन ही है जो संविधान निर्माण हेतु कोई आन्तरिक दवाब नहीं दे रहा है और जिस तरह सभामुख ने मर्यादाविहीन होकर सभा को छावनी में तब्दील कर के प्रस्ताव को पढÞा और पारित करवाया यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कहीं चोर की दाढÞी में तिनका तो नहीं । कुछ तो है जो नजर नहीं आ रहा, कहीं महरा प्रकरण जैसी कोई बात पर्दे के पीछे तो नहीं – अगर ऐसा कुछ है तो वो ज्यादा दिनों तक जनता की निगाहों से छुप नहीं पाएगा क्योंकि, गलती कोई ना कोई निशानी अवश्य छोडÞ जाती है ।
विवेकानन्द ने कहा था, “किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ, जबतकर् इश्वर की कृपा हमारे ऊपर है कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है – यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना । सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो ।” कल की हवा का रुख भी बदल सकता है बशर्ते नेताओं की सोच बदले । मधेश की निगाहें मधेशी नेताओं पर टिकी हैं किन्तु, इनकी निगाहें कर्ुर्सर्ीीर ही टिकी हर्ुइ हैं । अभी भी इनकी अवसरवादी फितरत खत्म नहीं हर्ुइ है । ऐसे में भलार् इश्वर की भी कृपा कब तक बनी रहेगी ये देखना है ।
बिजली और गैस की त्रासदी को झेलता हमारा देश हर सुबह एक नई उम्मीद के साथ अपनी आँखें खोलता है पर ढलते र्सर्ूय के साथ वो उम्मीद दम तोडÞ देती है । गैस के लिए बेहाल हुए लोगों की लम्बी कतारें और डीजल, पेट्रोल के लिए गाडिÞयों की लम्बी कतारों के दृश्य राजधानी के लिए कुछ नया नहीं है । लोगों को भी अब आदत सी हो गई है । एक शेर है
उम्रेदराज मांग कर लाए थे चार दिन,
दो आरजु में कट गए दो इंतजार में,
जाने कब इन्तजार की इन्तहा होगी । खैर, कल बेहतर हो इन्हीं आकांक्षाओं के साथ हिमालिनी का नया अंक आपके लिए ।
श्वेता दीप्ति

