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पुलवामा की सज़ा भुगत रहा पाकिस्तान, 2 दिन में 57 हमलें : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

 

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू),बीरगंज । पाकिस्तान में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. विद्रोहियों के लगातार हमलों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।  पिछले 2 दिनों में देशभर में 57 हमले हुए हैं, जिसमें बलूचिस्तान में हुआ ट्रेन हाइजैक शामिल नहीं है। इनमें से अधिकांश हमले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा अंजाम दिए गए हैं।

पाकिस्तान के क्वेटा से ताफ्तान जा रहे सेना के काफिले पर रविवार को विद्रोहियों ने हमला कर दिया। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि इस हमले में 90 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं। इस हमले का दृश्य पुलवामा हमले की याद दिलाता है, जिस तरह पुलवामा में हमला हुआ था, ठीक उसी तरह का हमला पाकिस्तान की सेना पर हुआ। पुलवामा हमले में भारत ने अपने 44 बीर सपूत खोए थे। BLA ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इसे अपनी कार्रवाई बताया। यह हमला क्वेटा से 150 किलोमीटर दूर नोशकी में हुआ। घटना के बाद पाकिस्तानी सेना ने इलाके में हेलिकॉप्टर और ड्रोन तैनात कर दिए हैं।

सेना के काफिले पर हुए आतंकी हमले के बाद एक और आतंकवादी हमला सामने आया है। यह हमला अफगानिस्तान – पाकिस्तान सीमा पर स्थित गरिगल बॉर्डर पोस्ट पर हुआ। इस हमले में फ्रंटियर कॉर्प्स बाजौर स्काउट्स के 9 जवान घायल हो गए हैं।

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स्नाइपर शॉट, ग्रेनेड अटैक और IED ब्लास्ट के जरिए विद्रोहियों ने पाकिस्तान को हिला कर रख दिया है। BLA के दावे के अनुसार, यह संख्या 100 से अधिक बताई जा रही है।

गौरतलब है कि इससे पहले, 14 मार्च को बीएलए ने एक ट्रेन को हाइजैक कर लिया था। घंटों तक पाकिस्तानी सेना और बलूच विद्रोहियों के बीच भारी गोलीबारी हुई। इस हमले को लेकर पाकिस्तान और बलूच विद्रोहियों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। पाकिस्तानी सेना के मुताबिक, इस हमले में 31 लोगों की मौत हुई, जिनमें 18 सैनिक शामिल थे। पाकिस्तान में लगातार हो रहे इन आतंकी हमलों के कारण देश को आर्थिक स्तर पर भी गंभीर नुकसान झेलना पड़ रहा है।

जाफर एक्सप्रेस के बाद पैदा हुए हालात में पाकिस्तान के तीन प्रांतों के 23 जिलों में हिंसा देखी गई है। बलूचिस्तान में हिंसा पाकिस्तान के लिए नई बात नहीं है लेकिन दूसरे सूबों में हमले सरकार और सेना के लिए चिंता का सबब है। खासौतर से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वाह के कुछ इलाकों के बारे में दावा किया जा रहा है कि यहां बीएलए और टीटीपी ने अपना नियंत्रण कर लिया है। पाक सेना ने कहा है कि वह इन गुटों से सख्ती से निपटेगी, ऐसे में देश का बड़ा क्षेत्र गृहयुद्ध जैसे हालात में जाता दिख रहा है।

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सोमवार, बलूचिस्तान और पाकिस्तान के लिए सबसे खूनी दिनों में से एक था। वर्ष 2006 में पाकिस्तानी सेना द्वारा मारे गये बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर बुगती की मौत की 18वीं बरसी पर, अलगाववादियों ने सूबे में हमले किये। बलूच लिबरेशन आर्मी ने कई मौतों के लिए जिम्मेदारी ली है। सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, अलगाववादियों ने बुनियादी ढांचे को क्षतिग्रस्त किया और पंजाब के कई प्रवासी मजदूरों को मौत के घाट उतार दिया। बलूचिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में हमले होना इस विद्रोह की बढ़ती पहुंच और क्षमता को दिखाता है। बुगती की मौत की बरसी पर अतीत में भी हिंसक घटनाएं हुई हैं।

ऐतिहासिक तौर पर, पाकिस्तान ने बलूच समस्या के प्रति बेरहम, सैन्य दृष्टिकोण अपनाया है। प्राकृतिक संसाधनों की अपनी दौलत के बावजूद, बलूचिस्तान देश का सबसे गरीब क्षेत्र है। पाकिस्तान ने इस सूबे की ऐतिहासिक रूप से उपेक्षा की है। दूसरी तरफ पंजाब राष्ट्रीय राजनीति में रसूखदार और आर्थिक रूप से समृद्ध बना। इसने बलूच समुदाय के कई तबकों के भीतर पंजाब-विरोधी रुझानों को जन्म दिया।

जीने के लिए बुरे हालात के साथ-साथ, इसका भी इस्तेमाल अपने मकसद के लिए समर्थन जुटाने में अलगाववादियों ने किया। स्थानीय अर्थव्यवस्था को बिना कोई फायदा पहुंचाये संसाधनों के दोहन के लिए वे संघीय सरकार पर अक्सर हमले करते हैं। सूबे से गुजरने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को बलूच अलगाववादियों ने इस शोषण की एक मिसाल बताया है।

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पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान बलूचिस्तान में नागरिक अधिकार आंदोलनों के साथ संवाद बना पाने में भी विफल रहा है। ऐसा ही एक आंदोलन ‘बलूच यकजेहती कमेटी’ है, जिसने सूबे में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के हनन की ओर संघीय प्राधिकारियों का ध्यान खींचने के लिए इस साल इस्लामाबाद और बलूच शहरों में कई धरने आयोजित किए। ऐसे एक्टिविस्टों को अक्सर पाकिस्तान के दुश्मन के रूप में पेश किया जाता है, जो सेना के पास बस यही विकल्प छोड़ता है कि वह अलगाववादियों के खिलाफ बल प्रयोग करे। लेकिन राज्य की हिंसा ने अलगाववादियों को सिर्फ मजबूत ही किया है, जो ताजा हमलों से जाहिर है। अगर पाकिस्तान अपने सबसे बड़े सूबे में स्थिरता और सुरक्षा को लेकर गंभीर है, तो उसे स्थानीय लोगों की विकास-संबंधी चिंताओं के समाधान के लिए कदम उठाने चाहिए, मानवाधिकार उल्लंघन रोकना चाहिए और बलूचियों के साथ दोबारा रिश्ते कायम करने के लिए शांतिपूर्ण नागरिक अधिकार आंदोलनों के साथ बातचीत करनी चाहिए।

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

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