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देश का विखण्डन मधेश नहीं, पहाड़ी सोच कर देगी

 
yugnath sharma
युगनाथ शर्मा,पत्रकार

युगनाथ शर्मा, पहाड़ और मधेश के नाम पर तो मैं यह महसूस करता हूँ कि सबसे ज्यादा अधिक अगर कोई शोषित है तो वह मधेशी ही है । आन्दोलन में आगे बढ़कर भाग लेने वाले मधेशी ही आज भी सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं । कैसी विडम्बना है कि मधेशी को आप भारतीय मानते हैं और मधेश की धरती को अपना मानते हैं । काठमान्डू के सत्ता की जो मानसिकता है वो काँग्रेस और एमाले की बनाई हुई नहीं है यह राजा महेन्द्र की बनाई हुई है जो आज भी अपने उसी स्वरूप के साथ जीवित है । राजा महेन्द्र ने सगरमाथा को चीन के हाथों बेच दिया । आज वहाँ के छात्र यह पढते हैं कि माउन्ट एवरेष्ट हमारा है । कहने का अर्थ यह है कि क्या राष्ट्रीयता यही है ?
मैं तो कहीं भी मधेश या मधेशियों को राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा नहीं देखता हूँ । जो देश बेचते हैं वो राष्ट्रवादी और जिसकी मेहनत से देश चलता है वो विद्रोही ? ऋतिक रौशन काण्ड में मधेशियों के साथ जो हुआ वह कहाँ तक न्याय संगत था ? आज सी.के.राउत चर्चा में हैं । उन्होंने हमारे पत्रिका के लिए साक्षात्कार दिया था जब उनसे पूछा गया कि आप कैसे इस आन्दोलन में आए तो उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं थी । मैं नेपाली कविता लिखता था नेपाली में सोचता था और नेपाली होने में गर्व महसूस करता था । पर जब यह घटना हुई तो मुझे लगा कि मैं इस धरती का नहीं हूँ, या यह देश मेरा नहीं है । मैं व्यक्तिगत तौर से यह महसूस करता हूँ कि आज हो या कल हो अगर देश की यही मानसिकता रही तो यह देश जरुर बँटेगा । और यह बाँटने वाला कोई मधेशी समुदाय नहीं होगा बल्कि पहाड़ी समुदाय ही होगा । मधेशी विरोधी जो मानसिकता है वही इसे तोड़ने का काम करेगी और कल यही सी.के.राउत उसका नेतृत्व करेंगे । गणेशमान जी ने कहा था कि DSC_0139जो मधेश नहीं समझेगा वो देश नहीं चला पाएगा । आज का जो चरित्र है सत्तापक्ष का वह देश को द्वन्द्ध की राह पर धकेल रहा है । इसे समझना होगा । नहीं तो देश को विखण्डन से कोई नहीं रोक सकता । राज्य के सभी पक्ष की पहचान की स्थापित करनी होगी इसे समझना होगा । आज ये सभी वर्चस्ववादी इस बात से चिन्तित हैं कि, संघीयता अगर बनती है तो एक नई शक्ति का  उदय हर क्षेत्र से होगा और तब इनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा और इनकी जो हैकमवादी सोच है वह खत्म हो जाएगी । इसी बात से ये त्रसित हैं । मुझे लगता है कि अभी जो संघीयता के नाम पर मिल रहा है उसे लीजिए और फिर अपनी शक्ति और विकास की नीति के साथ आगे बढ़िए और जो छूट गया है उसे अपने साथ मिलाइए । क्योंकि अभी जो सत्ता का चरित्र है वह संघीयता देना ही नहीं चाह रही है । इसलिए जो मिल रहा है पहले उसे लीजिए नहीं तो वह भी हाथ से निकल जाने की अवस्था है ।

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