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आज की शिक्षा क्या खोया क्या पाया ?:कैलाश दास

 
kailash das
कैलाश दास

२०६२-०६३ में जनआन्दोलन हुआ था और इसी आन्दोलन ने राजतन्त्र का अन्त किया और गणतन्त्र की स्थापना हुई । इसे परिवर्तन का आन्दोलन भी कहा जा सकता है । पर आज नेपाल की जनता इस आन्दोलन शब्द से वैसे ही परिचित हो गई है जैसे जीने के लिए साँसों से । आन्दोलन शब्द ही खिलवाड़ बन गया है । नेतागण ये नहीं सोचते कि यह आन्दोलनरूपी भूत कब खड़ा करना है । इसका आम जन जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है इन सारी बातों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है ।
आज भी एमाओवादी—मधेशवादी तीस दलीय मोर्चा गठबन्धन ने एसएलसी से एक सप्ताह पहले आन्दोलन का कार्यक्रम सार्वजनिक किया  है । चैत्र ८ से २६ तक बन्द हड़ताल, सरकारी, गैर सरकारी कार्यालय का कामकाज अवरुद्ध मोर्चा का निर्णय है । राजनीतिक दलों के आन्तरिक द्वन्द्व का कारण ‘संविधान निर्माण’ शब्द आम जनता को कन्फ्युज नही फ्युज कर दिया है तो दूसरी ओर शिक्षा जैसे सम्वेदनशील क्षेत्र को भी तहस—नहस कर दिया है । करीब १० वर्षो तक विभिन्न समस्याओं को झेलते आ रहे विद्र्यािर्थयों को इस बार भी परीक्षा की चिन्ता तो थी ही आन्दोलन का भय भी सता रहा था । विद्यार्थियो के लिए एसएलसी वह नींव है जिसके सहारे अभिभावक अपने बच्चों को आगे पढ़ाने की उम्मीद रखते हैं । वैसे शिक्षा विश्लेषको का मानना है कि जो भी छात्र इस वर्ष की परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे वह प्रतिभाशाली विद्यार्थी होंगे । सत्तालोलुपता और सरकार की उदासीनता का प्रभाव सबसे ज्यादा शिक्षा में देखा गया है ।
जनआन्दोलन और मधेश आन्दोलन पश्चात छात्र स्वतन्त्रतापूर्वक पढ़ेंगे, अच्छी नौकरी मिलेगी, देश में विकास होगा, शान्ति सुरक्षा की गायरेण्टी होगी और किसी से शासित नही होेंगे ऐसी उम्मीद आम जनता में थी । उन्हें क्या पता था कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा तो क्या अच्छी शिक्षा भी हासिल नही कर पाएँगे ? पुलिस की लाठी, अश्रु गैस का धूआँ, पत्थरों की वर्षा और नारा जुलूस का शोर सुनना पड़ेगा । रोजगार की जगह बेरोजगारी और उपभोग्य वस्तु के लिए भी दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर होना होगा ।
अन्तरद्वन्द्व में देश इस प्रकार फंस चुका है कि शिक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है । आज सम्पन्न परिवार के विद्यार्थी विवश होकर शिक्षा अध्ययन के लिए विदेश पलायन हो रहे हैं तो वहीं मध्यम या सामान्य परिवार के विद्यार्थी वैदेशिक रोजगार में जाने के लिए बाध्य हैं । ऐसा भी नहीं है कि सरकार शिक्षा में निवेश नहीं करती है किन्तु शिक्षा में सरकार के निवेश का प्रतिफल शून्य है । वास्तव में सरकार की कमजोरी के कारण ही शिक्षा क्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक केन्द्र के रूप में स्थापित हो चुके हैं । सरकार की स्पष्ट नीति नियम नहीं होने के कारण सरकारी विद्यालय अस्तव्यस्त बना हुआ है तो गैर सरकारी विद्यालय में वृद्धि हुई है । लेकिन वहाँ भी जिस प्रकार का वातावरण एवं सरकार की निगरानी होनी चाहिए वह बिलकुल नहीं है । भले ही गैर सरकारी विद्यालय से सरकार को टैक्स आता होगा लेकिन शिक्षा प्रणाली कमजोर ही है ।
किसी देश का विकास उस देश की शिक्षा प्रणाली पर निर्भर होता है, क्योंकि देश की उन्नति के लिए हर व्यक्ति जिम्मेदार है और वो ही देश को अपने ज्ञान, संस्कार और अच्छे आचरण के जरिये  बुलंदियों पर पंहुचा सकता है । आज का शिक्षित वर्ग ही देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चला सकता है किन्तु अगर शिक्षा प्रणाली ही ठीक न हुई तो उस देश का भविष्य अंधकारमय होगा ही । आज जरुरत है एक अच्छी शिक्षा प्रणाली की, जिससे आज का छात्र ज्ञानवान और एक अच्छे आचरण वाला व्यक्ति बन सके ?
लेकिन जनआन्दोलन पश्चात देश विकास की ओर जो परिवर्तन होनी चाहिए थी वह नही हुई और देश रसातल की ओर चला जा रहा है । राजनीतिक अन्तरद्वन्द के कारण विद्यार्थियों को समस्या ही समस्या भोगना पड़ा । विद्यार्थी जीवन में जो सीखना चाहिए असतो मा
सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय ।। मृत्योर्मा अमृत गमय ।। (हे प्रभु ! हमें असत्य सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो । मृत्यु के भय से अमरत्व की ओर ले चलो ।) उसकी जगह बन्द, हड़ताल, नारा, जुलुस, हत्या—हिंसा, अपहरण, चन्दा वसूली, बलात्कार जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है । भय–त्रास की जिन्दगी बितानी पड़ रही है ।
जबकि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों के अंदर अच्छे संस्कार पैदा करना तथा उन्हें आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाना होता है । किन्तु विद्यार्थीयों को लोडसेडिङ्ग, महँगाई यहाँ तक की खाना पकाने वाले एलपी गैस का अभाव सृजना कर मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है । छात्रा जब स्कूल जाती है और जबतक सुरक्षित लौटकर घर नही आ जाती तब तक उनके माँ बाप को चिन्ता सताए रहती है । एक ओर छात्राओं को शिक्षित करने का अभियान चल रहा है तो दूसरी ओर स्कूली छात्राओं के साथ बलात्कार की घटना में वृद्धि हो रही है ।
एक और सबसे बड़ी समस्या समय पर पुस्तकें उपलब्ध नही होना भी है । परीक्षा सम्पन्न होने के बाद भी चार चार महीने तक विद्यालय में पुस्तकों का अभाव बना रहता है ।  शिक्षक÷प्राध्यापक सरकारी विद्यालय से ज्यादा ट्युशन में एवं निजी कैम्पस÷विद्यालय में ज्यादा समय और ध्यान देते हैं । प्रायः स्कूल कैम्पस का प्राध्यापक÷प्राचार्य राजनीतिक दल का दवाव या स्वयं किसी दल में होने कारण अधिकांश समय राजनीति में बिताते हैं । सरकार द्वारा शिक्षा में दिया गया बजट कुछ ही विद्यालय या विद्यार्थी तक पहुँचता होगा । इससे स्पष्ट होता है कि सरकारी अनुगमन उदासीन है जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है ।
विद्यालय व्यवस्थापन समिति को भ्रष्टाचार का अखाड़ा कहना नाजायज नहीं होगा । क्याेंकि जिसके पास रुपैया है और जिसके विद्यार्थी गैर सरकारी में पढ़ते हों वही अपने शक्ति के दम पर व्यवस्थापन अध्यक्ष वा सदस्य में चयन होते हैं । जिसका बच्चा उस स्कूल में नही पढ़ता हो उन्हें सुधार से क्या लेना देना । उनकी एक ही मंसा होती है, विद्यालय में दिए गए बजट को मिल बाँटकर खाना ।
नेपाल में सरकारी शिक्षण संस्था के शिक्षक तथा प्राध्यापक बहुत कम होंगे जो अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में पढ़ाते हाेंगे । सरकार का तलव खाकर राजनीति में व्यस्त रहने वाले शिक्षक, कर्मचारी, राजनीतिकर्मी के बच्चे प्रायः बोर्डिङ्ग स्कूल या विदेश में पढ़ते हैं । जबकि भारत में ८०, श्रीलंका में ९८, बेलायत ,अमेरिका में ९३ प्रतिशत और क्यानाडा सहित कुछ देश में शतप्रतिशत विद्यार्थी सरकारी स्कुल और कॉलेज में पढते हैं । नेपाल में राजनीतिक द्वन्द कहा जाए या हस्तक्षेप के कारण शिक्षक पढ़ाई में कम और राजनीति मेंं ज्यादा ध्यान देते है ।
अगर हम केवल मधेश तराई की बात करें तो एसएलसी रिजल्ट बहुत ही कम है । इसबार एसएलसी में सबसे बड़ी आश्चर्यजनक बात यह है कि परीक्षा प्रारम्भ है और विद्यार्थी वैदेशिक रोजगार में जा रहे हैं । धनुषा में कुल विद्यार्थी में से ८ सौ विद्यार्थी एसएलसी में अनुपस्थित थे । अनुसन्धान करने पर पता चला कि कुछ विद्यार्थी विवाह में व्यस्त हैं तो कुछ वैदेशिक रोजगार में जानेवाले हैं । ऐसे भी विद्यार्थी देखने को मिले जो  विद्यालय से प्रवेश पत्र लेने के वाद भी एसएलसी परीक्षा का महत्व कम और वैदेशिक रोजागरी को ज्यादा दे रहे हैं । अभिभावको का मानना है कि रोजगार का वीसा आ गया था । अगर वह नही गया तो करीब एक लाख का घाटा कौन उठाएगा । पढ़ाई से नौकरी तो मिलती नही फिर भी सोचे कि अगर वीसा देर से आऐगा तो परीक्षा दे देगा, लेकिन परीक्षा के बीच में ही आ गया । इस प्रकार की समस्या ग्रामीण अभिभावक एवं विद्यार्थियों में ज्यादा देखा गया है ।
एक और समस्या यह भी है कि नेपाल सरकार के पास योजना ही नहीं है कि किस क्षेत्र में कितना विद्यार्थी उत्पादन करना है, उन्हें कैसा व्यवस्थापन करना है । समय–सापेक्ष पाठ्यक्रम के अभाव में पढ़े लिखे युवाओं की बेरोजगारी की संख्या बढ़ने पर अभिभावक सबसे ज्यादा चिन्तित हैं ।
शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या सरकारी विद्यालय में पढ़ाई नही होने से गैर सरकारी विद्यालय पठन–पाठन की दृष्टि से अपेक्षाकृत सफल दिखते हैं । सरकारी विद्यालय को निजी विद्यालय के साथ किस प्रकार की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए इस विषय पर सरकार ने ध्यान ही नही दिया है । अरबों खर्च कर सञ्चालित किया गया शिक्षा मन्त्रालय, सरकारी विश्वविद्यालय, कैम्पस और स्कूल के सम्बन्धित पक्ष को इस पर संवेदनशील होना चाहिए ।
नेपाल में विद्यमान २०२८ को शिक्षा नीति समयानुकूल नहीं है । इसमें तत्काल परिवर्तन की आवश्यकता है । जो वर्तमान का प्रतिनिधित्व करता है, उसी प्रकार नया नेपाल की शिक्षा नीति तथा पाठ्यक्रम निर्धारण करना चाहिए । शिक्षा के लिए बना अन्तर्राष्ट्रीय मापदन्ड को लागू करना चाहिए । नीति में आमूल परिवर्तन नहीं हुआ तो शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन सम्भव नही है । फिलहाल नेपाल का अधिकांश शिक्षण संस्था और उससे संबंधित विद्यार्थी राजनीतिक कुचक्र में फंसा है । विद्यार्थियों के हक हित के लिए विद्र्यािर्थयाें को संगठित होने का संवैधानिक और कानूनी अधिकार होने के बावजूद भी विगत में देखा जाए तो विद्यार्थी राजनीतिक विद्यार्थियों के हकहित में नहीं होकर राजनीति दल के स्वार्थ पूर्ति में लगे है । विद्यार्थियों का संगठन पूर्ण राजनीतक दल हो चुका है । राजनीतिक दलों के विद्यार्थी संगठन ने विद्यार्थी राजनीति के नाम में शिक्षण संस्था के गतिविधियों को समाप्त कर दिया है जिससे लाखाें विद्यार्थी को अध्ययन करने से वञ्चित कर विद्यार्थियों के भविष्य के साथ विद्यार्थी नेता ही खिलवाड़ करते हैं । इसलिए किसी प्रकार की माँग पूरी करने के लिए दूसरा वैकल्पिक उपाय खोजना होगा और शिक्षण संस्था कभी बन्द न हो ऐसा वातावरण सृजन करना होगा और आज के सन्दर्भ में विद्यार्थिंयों का भी यही कर्तव्य है ।
तराई मधेश में शिक्षा का वातावरण बिल्कुल बिगड़ता जा रहा है । मधेश में सरकार की सही नीति न होने के कारण ही यहाँ के विद्यार्थी बड़ी संख्या में भारत में अध्ययन करने के लिए बाध्य हंै ।

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