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बसंत चौधरी का उपन्यास ’देवयानी’: चेतना से परे एक प्रेम कहानी

 

काठमान्डू ३१ आषाढ

विजेता चौधरी

प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार बसंत चौधरी की पहली कथात्मक कृति ’देवयानी’ उपन्यास हाल ही में प्रकाशित हुआ है। प्रेम के कवि बसंत चौधरी के इस उपन्यास के केंद्र में भी प्रेम है और प्रेम की एक अद्भुत परिभाषा है।
छोटी छोटी कहानियाँ लिखते रहने वाले चौधरी के उपन्यासों का दायरा और क्षेत्र व्यापक है। इसमें सहायक पात्रों की सशक्त और रोमांचक कहानियाँ भी शामिल हैं। जिसने उपन्यासकार की कल्पना के विस्तार को आकार दिया है।
बसंत चौधरी की निबंध, गीत, कविता और दर्शन सहित लगभग दो दर्जन रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। त्रिकोणीय या विवाहेतर संबंधों पर आधारित ’देवयानी’ लेखक चौधरी का पहला उपन्यास है।
उपन्यास ’देवयानी’ मुख्यतः तीन पात्रों के इर्द–गिर्द घूमता है। मुख्य पात्र आदित्य है, और यह उसकी ही कहानी है। एक बड़े रियल एस्टेट व्यवसायी आदित्य की मुलाकात टाउन प्लानिंग के क्रम में देश की एक प्रसिद्ध युवा आर्किटेक्ट देवयानी से होती है। देवयानी के काम और उसके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर आदित्य उसकी ओर आकर्षित होता है। यह आकर्षण कब प्रेम में परिवर्तित हो जाता है यह आदित्य को भी पता नहीं चलता है ।
आदित्य ने अपने अलग अंदाज़ में काम करने के कारण काफ़ी ख्याति अर्जित की है। बड़ी इमारतों और कलात्मक डिज़ाइन, ज़मीन, हवा और पानी को नुकसान पहुँचाए बिना किए गए उसके काम ने उसकी एक ऊँची छवि बनाई है। वह कई लोगों के लिए एक आदर्श है। देवयानी पहले से ही आदित्य से प्रभावित है, और महीनों तक आदित्य के साथ एक ही प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद, दोनों एक–दूसरे को पसंद करने लगते हैं। हालाँकि दोनों की उम्र और सोच में काफ़ी फ़र्क़ है।
उपन्यास में प्रेम का एक सुंदर रूप प्रस्तुत किया गया है, जिसमें तीनों पात्रों का अपना–अपना प्रेम, अनुभव और प्रेम की परिभाषा है। प्रेम शाश्वत है और इसकी योजना नहीं बनाई जाती, प्रेम स्वतः घटित हो सकता है। इसे कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। इसे पात्रों के अनुसार उचित रूप से चित्रित किया गया है। हालाँकि उपन्यास ’विवाहेतर संबंधों’, को प्रोत्साहित नहीं करता, लेकिन इसमें मुख्य संघर्ष विवाहेतर संबंधों का ही है। लेकिन यह सामाजिक, मानवीय और कानूनी मूल्यों की भी वकालत करता है। उपन्यास में दर्शनशास्त्र भी समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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उपन्यास आज के समाज का चित्रण नहीं करता, बल्कि आज से लगभग चालीस दशक पहले के समाज और समय की कहानी कहता है। तत्कालीन समाज की कहानी में भी उपन्यासकार ने महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ी अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है। उपन्यास में महिला पात्रों का चित्रण पुरुषों की तुलना में अधिक सशक्त रूप से किया गया है। विभिन्न दृष्टिकोणों और विचारों वाली महिलाओं का सफल चित्रण इस उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। लेखन शैली और भाषा की मधुरता पाठक को बांधे रखती है।

उपन्यास का मुख्य संघर्ष आदित्य के विवाहित होने को लेकर है। जब देवयानी आदित्य को पसंद करने लगती है और उसके बारे में उसे पता चलता है। लेकिन वह आदित्य को छोड़ नहीं पाती। वह आदित्य के प्रेम में पूरी तरह डूब जाती है। उसके बारे में सब कुछ जानते हुए भी, वह रिश्ता जारी रखती है। आदित्य कई बार अपनी शादी के बारे में बताने की कोशिश करता है, लेकिन देवयानी उसे यह कहकर रोक देती है कि ’ऐसा कुछ मत कहो जिससे मेरा दिल दुखे’।

इस बीच, आदित्य की पत्नी माधवी को उनके प्रेम संबंध के बारे में पता चल जाता है और वह आदित्य से पूरी तरह दूर हो जाती है। इससे उन तीनों के रिश्ते में दरार आ जाती है। आदित्य न तो माधवी से दूर रह सकता है और न ही वह देवयानी को छोड़ना चाहता है।
उपन्यास में माधवी एक सशक्त पात्र है। चाहे वह अंदर से कितनी भी पीड़ा में हो, वह आदित्य से एक शब्द भी नहीं कहती और उसे पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देती है। जो आदित्य को अंदर से कमज़ोर बनाता है। हालाँकि वह अपने पति को आज़ाद छोड़ देती है, लेकिन आदित्य खुद बच्चे और माधवी के प्रति अपने अतिरिक्त प्रेम के कारण उसे छोड़ना नहीं चाहता। माधवी बिना कुछ कहे विद्रोह कर देती है। न केवल उसका विद्रोह, बल्कि उसके प्रति उसका प्रेम भी मौन में दिखाई देता है, जिसकी एक झलक पहले अध्याय में ही मिल जाती है। उपन्यास में आदित्य, माधवी और देवयानी अपनी–अपनी शर्तों पर अड़े हैं।
कथानक में एक और मोड़ तब आता है, जब विक्रांत अप्रत्याशित रूप से देवयानी के जीवन में प्रवेश करता है। विक्रांत की मुलाकात देवयानी से होती है, जो विशेष प्रशिक्षण के लिए सिंगापुर गई है। विक्रांत देवयानी को पसंद करता है और धीरे–धीरे देवयानी भी उसकी ओर आकर्षित होने लगती है।
देवयानी को विवाहित आदित्य के प्यार में पड़कर माधवी का घर बर्बाद करने का अपराधबोध होता है, और इसीलिए वह विक्रांत को अपने जीवन में आने देती है।
आदित्य, देवयानी को समझाने की कोशिश करता है कि वे शादी कर सकते हैं और अलग रह सकते हैं, लेकिन जब देवयानी आखिरकार विक्रांत से शादी करने का फैसला करती है, तो आदित्य को धीरे–धीरे एहसास होता है कि देवयानी के प्रति उसकी जिद सही नहीं है। और उसने जो फैसला लिया है, वह सही है। हालाँकि, वह देवयानी को कभी नहीं भूल पाता। देवयानी हमेशा उसकी यादों में बसी रहती है।

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उपन्यास में माधवी, रेणु और विक्रांत को महत्वपूर्ण पात्रों के रूप में चित्रित किया गया है। इन तीनों पात्रों की उपस्थिति ने कहानी को सशक्त बनाया है। मुख्य सहायक पात्रों में से एक, रेणु एक मजबूत, स्वतंत्र और बुद्धिमान पात्र है। वह आदित्य की सबसे अच्छी दोस्त है, जिसका उसके साथ रिश्ता भी उपन्यास का एक विषय है।

इसके अलावा, अर्पिता, इशिता, अदिति सहित सहायक पात्रों और उनकी साइड स्टोरीज़ ने उपन्यास को रोचक बना दिया है।

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उपन्यास के मुख्य पात्र, आदित्य को एक प्रमुख उद्योगपति के रूप में चित्रित किया गया है जो एक महान कवि भी हैं। वह प्रभास के नाम से कविताएँ लिखता है। उपन्यास पढ़ते समय पाठक के मन में बार–बार यह सवाल उठता है कि क्या यह उपन्यासकार की जीवन गाथा है? यद्यपि उपन्यासकार ने इस विषय पर कई स्थानों पर कहा है, ’यह स्वाभाविक है कि उनकी रचना के कुछ अंश लेखक के जीवनानुभव से मेल खाते हों, लेकिन यह उपन्यास मेरी जीवनगाथा नहीं है। यदि यह किसी के जीवन से मेल खाता है, तो यह मात्र एक संयोग होगा।’ हालाँकि, उपन्यास में संदर्भों के अनुसार, व्यावसायिक घराने और साहित्यिक परिदृश्य व घटनाएँ उपन्यास के व्यक्तित्व के अनुरूप, वास्तविक प्रतीत होती हैं। किन्तु यह भी सच है कि कोई भी लेखक अपने आसपास के परिवेश से ही प्रभावित होकर शब्दों को स्वरुप प्रदान करता है ।

नेपाली साहित्य के बाज़ार पर नज़र डालें तो इन दिनों उपन्यासों में आम आदमी की कहानियाँ या हाशिए पर पड़े लोगों की कहानियाँ होने का चलन है। लेकिन देवयानी का उपन्यास एक कुलीन, सुशिक्षित और आदर्श परिवार–समाज के भीतर प्रेम, संघर्ष, विवशता और समर्पण की कहानी कहता है। और आदर्श का अनुसरण करते हुए कदम–दर–कदम अपनी इच्छाओं और स्वतंत्रता का त्याग करने की विवश परिस्थिति की कहानी भी कहता है। उपन्यास बताता है कि हर चीज़ से भरपूर ऊँचे महल में रहने वाले व्यक्ति की कहानी भी अधूरी है। केंद्रीय पात्र आदित्य एक ऐसा ही पात्र है जिसके जीवन में भी ऐसा ही अधूरापन है।
… पात्रों के अनुरूप सुन्दर संवाद पाठक को अनेक अनुभूतियाँ प्रदान करने में सफल होते हैं। उपन्यास पठनीय है।

 

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