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मधेश और डा. संगीता मिश्रा प्रकरण – चुप्पी, अवसरवाद और भेदभाव की राजनीति

 

काठमांडू। २९ सितम्बर । डा. संगीता कौशल मिश्रा प्रकरण एक बार फिर चर्चा के केन्द्रमें है। मधेश की इस योग्य और वरिष्ठ महिला अधिकारी को लगातार राजनीति, स्वार्थी समूहों और जातीय मानसिकता का शिकार बनाया जा रहा है—यह आरोप पूर्व प्रदेश प्रमुख हरिशंकर मिश्र सहित कई बुद्धिजीवी वर्ग से सामने आया है।

पूर्व प्रदेश प्रमुख मिश्र का कहना है कि डा. मिश्रा केवल मधेशी होने के कारण बार–बार अन्याय और अत्याचार की शिकार बनीं। उनके अनुसार अतीत की सरकारों से लेकर वर्तमान सत्ता तक, विभिन्न शक्ति–समूहों ने मिलकर डा. मिश्रा जैसी सक्षम मधेशी महिला को शीर्ष पद तक पहुँचने से रोका है।

सचिव पद से मंत्री तक का विवाद

प्रधानमन्त्री सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार ने डा. मिश्रा को स्वास्थ्य तथा जनसंख्या मन्त्री नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए उन्हें सचिव पद से इस्तीफा दिलाया गया और मन्त्रिपरिषद् की सिफारिस राष्ट्रपति कार्यालय तक पहुँची। लेकिन अन्तिम क्षणों में स्वार्थी समूहों और तथाकथित दलाल तंत्र ने अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग (CIAA) में मुद्दा दर्ता कराने की धमकी, “वे भारतीय मूल की हैं” जैसी अफवाहें, तथा खसवादी मानसिकता फैलाकर उन्हें मन्त्री बनने से रोक दिया।

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ओली सरकार काल का अन्याय

मिश्र ने आरोप लगाया कि केपी शर्मा ओली नेतृत्वकाल में भी कांग्रेस का दबाव ही था, जिसके चलते डा. मिश्रा को सचिव पद पर वैधानिक बढुवा नहीं दिया गया। तत्कालीन स्वास्थ्य मन्त्री प्रदीप पौडेल और महामन्त्री गगन थापाको चलखेल से, कानून के विपरीत एक जूनियर कर्मचारी को करोड़ों की लेनदेन कर बढुवा कर दिया गया।

उनका कहना था कि यह साफ संकेत है कि सत्ता–तंत्र में मधेशी और पहाड़ी के बीच विभेद की मानसिकता आज भी गहरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस तरह मधेशियों पर अन्याय जारी रहा तो कांग्रेस पार्टी स्वयं कमजोर होती जाएगी।

शिवचन्द्र चौधरी का आरोप

सर्लाही निवासी एवं समाजसेवी श्री शिवचन्द्र चौधरी ने कहा कि मनरा सिस्वा नगरपालिका के नवनिर्मित भवन के उद्घाटन समारोह में भी डा. संगीता मिश्रा का अन्यायपूर्ण मामला उठा। स्वयं कांग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा उस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे। मंच से साफ–साफ कहा गया कि तत्कालीन स्वास्थ्य मन्त्री प्रदीप पौडेल ने, गगन थापा की राजनीतिक पकड़ के सहारे, डा. मिश्रा को सचिव बनने नहीं दिया। लेकिन देउवा ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह रवैया केवल उपेक्षा नहीं, बल्कि मधेशी समुदाय के प्रति गहरी मानसिक दूरी का प्रतीक है।

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आज कई लोग मानते हैं कि देउवा अपने शुरुआती तीन कार्यकालों तक सही राह पर थे। लेकिन उसके बाद उन्होंने पार्टी और सत्ता को “पैसा और चाकरीबाज़ों” के हवाले कर दिया। नतीजा आज कांग्रेस के सामने साफ़ है—गिरती साख, बिखरती संगठनात्मक शक्ति और मधेश में गहराता आक्रोश।

देउवा के बचाव में जो लोग सामने आते हैं, उन्हें अब “झोले” यानी चापलूस कहा जाता है। वे कांग्रेस को और गहरे संकट में धकेलने वाले तत्व हैं।

संघीय लोकतांत्रिक मोर्चा के नेताओं की चुप्पी भी उतनी ही निराशाजनक है। राष्ट्रपति के पास मन्त्रिपरिषद् से नाम पहुँच चुका था, लेकिन जब डा. मिश्रा को शपथग्रहण से रोका गया, तब भी उन्होंने सामूहिक विरोध दर्ज नहीं किया। सुशीला कार्की के समक्ष जाकर दबाव बनाने की जगह वे चुपचाप मौन साधे बैठे रहे। इससे साफ होता है कि वे भी अवसरवादी राजनीति से आगे नहीं बढ़ सके।

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आज मधेश और मधेशी समाज का दुर्भाग्य यही है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले अधिकांश नेता अलग–अलग “पसल” चलाकर सिर्फ अपनी सम्पत्ति और शक्ति बढ़ाने में लगे हैं। गलत निर्णय को सुधारने के लिए न दबाव बनाया गया, न ही जनपक्षीय हस्तक्षेप हुआ।

गजेंद्र सिंह ने भी कहा—
“देउवा जी खुद मधेश विरोधी हैं। आश्चर्य है कि मधेश के कुछ लोग ऐसे नेताओं का समर्थन करने को तैयार रहते हैं। यही कांग्रेस को रसातल तक ले जाएगा।”

निष्कर्ष

डा. संगीता कौशल मिश्रा का मामला केवल एक व्यक्ति का अन्याय नहीं, बल्कि यह नेपाल की राजनीति और सत्ता संरचना में गहराई से बैठे जातीय विभेद और मधेश के प्रति भेदभाव का आईना है। पूर्व प्रदेश प्रमुख हरिशंकर मिश्र से लेकर स्थानीय स्तर तक उठे स्वर यही बताते हैं कि मधेशी समुदाय आज भी बराबरी और सम्मान की तलाश में है।

👉 सवाल यह है कि क्या नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति इस अन्याय को स्वीकार करती रहेगी या फिर कभी इसे सुधारने की हिम्मत दिखाएगी?

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