Fri. May 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

23 और 24 भाद्र की घटनाएं: नेपाल की सियासत में नया मोड़, उथल-पुथल का विश्लेषण

 

काठमांडू, २९ सितम्बर । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में 23 और 24 भाद्र 2082 की घटनाएं एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो चुकी हैं। इन घटनाओं ने न केवल देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया, बल्कि यह भी दर्शाया कि कैसे जनआंदोलन, सैन्य हस्तक्षेप और नेताओं की रणनीतियों ने मिलकर एक अभूतपूर्व स्थिति को जन्म दिया। इस लेख में इन घटनाओं का विश्लेषण करते हुए यह समझने की कोशिश की जाएगी कि कैसे संसद विघटन की सिफारिश तक पहुंचा गया और इसके पीछे की गतिशीलता क्या थी।

जेनजी आंदोलन और संसद विघटन की मांग

23 भाद्र को संसद भवन के सामने हुए प्रदर्शन में 74 युवाओं पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई ने जेनजी आंदोलन को और उग्र कर दिया। इस हिंसा ने न केवल जनता के बीच आक्रोश को भड़काया, बल्कि संसद विघटन की मांग को भी बल दिया। हालांकि यह मांग आंदोलन की औपचारिक मांग का हिस्सा नहीं थी, लेकिन काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने इसे अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए सार्वजनिक कर दिया।

इस पोस्ट ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी और यह मांग तेजी से जेनजी आंदोलन के एक हिस्से के बीच लोकप्रिय हो गई। इस आंदोलन की शुरुआत युवा नेतृत्व और सुशासन की मांग को लेकर हुई थी, लेकिन हिंसा और सैन्य हस्तक्षेप ने इसे एक अलग दिशा में ले गया। 24 भाद्र को तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद सियासी शून्यता पैदा हो गई। इस बीच, नेपाली सेना के प्रमुख अशोक सिग्देल ने सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की।

यह भी पढें   जनता की सोच अनुसार नहीं है नीति तथा कार्यक्रम – पद्मा अर्याल
सेनापति

सेना की भूमिका और शीतल निवास में वार्ता

24 भाद्र की रात को सेना की तैनाती के बाद स्थिति और जटिल हो गई। सैनिक मुख्यालय में जेनजी आंदोलन के प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों, जैसे दुर्गा प्रसाईं, के साथ छलफल शुरू हुई। इस दौरान राजनीतिक दलों के नेताओं का कोई अता-पता नहीं था। सैनिक प्रमुख सिग्देल ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के साथ विकल्पों पर चर्चा शुरू की। उनकी रणनीति थी कि पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जाए और तत्काल संसद विघटन कर दिया जाए। राष्ट्रपति पौडेल शुरू में संसद विघटन के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि संसद के भीतर ही युवा नेतृत्व को मौका देकर समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन सिग्देल ने संकटकाल की धमकी देकर दबाव बढ़ाया। उन्होंने राष्ट्रपति को एक पत्र सौंपा, जिसमें संकटकाल लागू करने और सेना को परिचालित करने की बात कही गई थी। इस बीच, बालेन शाह ने संसद विघटन को अपनी न्यूनतम शर्त बनाकर युवाओं को सैनिक मुख्यालय में वार्ता के लिए प्रेरित किया।

यह भी पढें   प्रतिनिधिसभा की बैठक दूसरी बार स्थगित
राष्ट्रपति

 राष्ट्रपति की भूमिका और संकट का समाधान

राष्ट्रपति पौडेल ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’, नेकपा एकीकृत समाजवादी के अध्यक्ष माधवकुमार नेपाल और अन्य नेताओं को शीतल निवास बुलाया। इन नेताओं के बीच संसद विघटन और नई सरकार के गठन पर लंबी चर्चा हुई।

ओमप्रकाश अर्याल
गृहमंत्री बने

जेनजी आंदोलन के प्रतिनिधि ओमप्रकाश अर्याल (जो बाद में गृहमंत्री बने) ने भी माओवादी के नारायणकाजी श्रेष्ठ, कांग्रेस के गगन थापा और एमाले के शंकर पोखरेल जैसे नेताओं के साथ समन्वय किया। राष्ट्रपति पौडेल ने 28 भाद्र को एक बयान जारी कर संविधान, संसदीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक गणतंत्र को बचाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि छह महीने के भीतर संसद का चुनाव कराकर देश को उन्नत लोकतंत्र की ओर ले जाया जाएगा। इस बयान ने साफ कर दिया कि राष्ट्रपति ने सुझबुझ और संयम से स्थिति को संकटकाल की ओर जाने से रोका।

सुशीला कार्की
प्रधानमंत्री

सुशीला कार्की का प्रधानमंत्री बनना

लंबी चर्चा और दबाव के बाद, केपी शर्मा ओली की लिखित सिफारिश पर सुशीला कार्की को 27 भाद्र की रात अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। यह सरकार ओली की सिफारिश और अन्य दलों के समर्थन पर बनी।

यह भी पढें   मंत्रिपरिषद् की बैठक द्वारा नीति तथा कार्यक्रम पारित

हालांकि, बाद में ओली ने इस सरकार को ‘हाहाहुहु’ से बनी सरकार कहकर आलोचना की, जिससे यह साफ हुआ कि वे अपनी सिफारिश के बावजूद इस सरकार के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं थे।

राष्ट्रपति पौडेल ने पहले ओली की सिफारिश पर कार्की को प्रधानमंत्री नियुक्त किया और फिर कार्की की सिफारिश पर संसद विघटन किया। इस तरह, उन्होंने संवैधानिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों को बनाए रखा।

निष्कर्ष

23 और 24 भाद्र की घटनाएं नेपाल के इतिहास में एक ऐसे दौर के रूप में याद की जाएंगी, जब जनआंदोलन, सैन्य दबाव और राजनीतिक रणनीतियों ने देश को संकट के कगार पर ला खड़ा किया। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की सूझबूझ और संयम ने संविधान और लोकतंत्र को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जेनजी आंदोलन ने युवा नेतृत्व और सुशासन की मांग को तो उठाया, लेकिन हिंसा और सैन्य हस्तक्षेप ने इसे एक जटिल दिशा में ले गया। यह दौर नेपाल की राजनीति में एक सबक के रूप में देखा जाएगा कि कैसे संवाद, सहमति और संवैधानिक प्रक्रियाएं किसी भी संकट का समाधान निकाल सकती हैं। विनु सुवेदी olk के आधार पर तैयार किया गया यह रिपोर्ट।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *