छठ महापर्व: प्रकृति-पूजा, धार्मिक समन्वय और स्वदेशी चेतना का अमर प्रतीक : संतोष मेहता
संतोष मेहता, सुनसरी, २७ ऑक्टोबर ०२५। नेपाल के मधेश से लेकर भारत के बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड तक फैला छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का जीवंत स्पंदन है। यह वह दुर्लभ पर्व है जो प्रकृति-पूजा, लोक-आस्था और धार्मिक समन्वय का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे वे गहरे सांस्कृतिक सूत्र हैं जो हमारी प्राचीन सभ्यता की आत्मा से जुड़े हैं।
प्रकृति की प्रत्यक्ष आराधना: पंचतत्व का महायज्ञ
छठ की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि यहाँ मूर्ति-पूजा के स्थान पर प्रकृति के पंचतत्वों की सीधी उपासना होती है। सूर्य, जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु – ये सभी तत्व जीवन के मूल आधार हैं।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में इन पंचतत्वों की महिमा विस्तार से वर्णित है। ऋग्वेद में सूर्य की स्तुति करते हुए कहा गया है – “आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥” (सूर्य अपने स्वर्णिम रथ पर चढ़कर समस्त लोकों को देखते हुए अमृत और मृत्यु दोनों का संचालन करते हैं)। यजुर्वेद में पंचमहाभूत की महत्ता बताते हुए कहा गया है – “पृथिव्यै नमः, आपो नमः, अग्नये नमः, वायवे नमः, आकाशाय नमः” (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को नमस्कार)।
बौद्ध साहित्य में भी इसी भाव को देखा जा सकता है। महासतिपट्ठान सुत्त में भगवान बुद्ध कहते हैं कि साधक अपने शरीर में विद्यमान पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) का चिंतन करे। अंगुत्तर निकाय में सूर्य को ‘लोकचक्खु’ (जगत की आँख) कहा गया है – वह प्रकाश जो अंधकार का नाश करता है और ज्ञान का मार्ग दिखाता है।
प्रातः और सायंकालीन सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती उस ऊर्जा स्रोत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जो समस्त जीवन का पोषक है। नदी के पवित्र जल में खड़े होकर, पृथ्वी पर फैली सूप में सात्विक प्रसाद रखकर, और निर्मल वायु में श्रद्धा के गीत गाते हुए व्रती प्रकृति के साथ एकाकार हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण में भी कहा गया है – “भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च” – यह पंचमहाभूत ही समस्त सृष्टि का आधार हैं। छठ पर्व इसी वैदिक और लौकिक ज्ञान को व्यवहार में उतारता है, हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के पुत्र हैं, उसके स्वामी नहीं।
निर्मध्यस्थ भक्ति-मार्ग: वज्जि गणराज्य की लोकतांत्रिक चेतना
छठ की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता इसका पुरोहित-विहीन, निर्मध्यस्थ स्वरूप है। यहाँ कोई मध्यस्थ नहीं, कोई जटिल कर्मकांड नहीं। व्रती स्वयं ही अपनी श्रद्धा से सीधे प्रकृति देवता से संवाद करते हैं।
यह परंपरा उस प्राचीन वज्जि गणराज्य की लोकतांत्रिक भावना का प्रतिबिंब प्रतीत होती है, जहाँ निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते थे और किसी एक व्यक्ति या वर्ग का वर्चस्व नहीं था। बौद्ध ग्रंथ ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ में भगवान बुद्ध ने वज्जि गणराज्य के सात अपरिहानीय धम्मों (सिद्धांतों) की प्रशंसा करते हुए कहा था कि जब तक लिच्छवी गणतंत्र में सभी की समान भागीदारी रहेगी, तब तक उनकी उन्नति होती रहेगी।
छठ में यही लोकतांत्रिक भावना दिखाई देती है। यहाँ जाति, वर्ग, धन-संपत्ति, शिक्षा या सामाजिक प्रतिष्ठा का कोई भेद नहीं। गंगा, कोसी, गंडक या कर्णाली के घाटों पर खड़े सभी व्रती समान हैं – चाहे वह मंत्री हो या मजदूर, उद्योगपति हो या किसान, ब्राह्मण हो या दलित।
वैशाली के घाट पर जब हजारों व्रती एक साथ अर्घ्य देते हैं, तो यह दृश्य उसी प्राचीन गणतांत्रिक परंपरा को जीवित करता है जहाँ सभी नागरिक समान थे। पटना के गाँधी घाट पर विभिन्न धर्मों, जातियों के लोग एक साथ खड़े होते हैं – यह दृश्य भारतीय संविधान की समानता के मूल्य को साकार करता है। काठमांडू के कमलपोखरी से लेकर छपरा के सरयू घाट तक – हर जगह यही सामाजिक समरसता का अनूठा दृश्य दिखता है।
यह छठ को सच्चे अर्थों में ‘लोक’ का पर्व बनाता है – जहाँ धर्म का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष श्रद्धा है; जहाँ समाज का अर्थ विभाजन नहीं, बल्कि समरसता है।
सात्विकता और कृषि-संस्कृति की सुगंध: कार्तिक का पर्यावरणीय महत्व
छठ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री हमारी कृषि-प्रधान संस्कृति की पहचान है। ठेकुआ, भुसवा जैसे पारंपरिक पकवान, गन्ना, नारियल, केला, नींबू, अदरक, शकरकंद जैसे स्थानीय उत्पाद – ये सभी हमारी धरती की उर्वरता और श्रम की पवित्रता के प्रतीक हैं।
छठ का समय – कार्तिक शुक्ल षष्ठी – केवल धार्मिक कैलेंडर का अंग नहीं, बल्कि कृषि चक्र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह वह समय है जब धान की कटाई पूर्ण हो चुकी होती है और किसान अपनी मेहनत का फल देख चुके होते हैं। ऋग्वेद में कहा गया है – “कृषिं च कर्षणीं च” (कृषि ही जीवन का आधार है)। छठ इसी कृषि-जीवन की कृतज्ञता का महापर्व है।
इस समय सूर्य की किरणें विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, कार्तिक माह में सूर्य की किरणें शरीर के लिए अत्यंत स्वास्थ्यवर्धक होती हैं – “कार्तिके षष्ठी तिथौ सूर्यस्य किरणाः सर्वव्याधिहरणाः” (कार्तिक की षष्ठी को सूर्य की किरणें सभी व्याधियों का हरण करती हैं)। यह वह मौसम है जब न अधिक गर्मी है, न अधिक सर्दी – प्रकृति अपने संतुलित रूप में होती है।
इस समय जो प्राकृतिक उपज मिलती है, वही छठ की पूजा में प्रयुक्त होती है: गन्ना (ऊख) – शरद ऋतु में परिपक्व होने वाला, जो मिठास और ऊर्जा का प्रतीक है। केला – इस मौसम में पकने वाला पौष्टिक फल है, नारियल – तटीय और तराई क्षेत्रों की विशेष उपज है, अदरक-हल्दी – ताजा खोदी हुई जड़ें, जो औषधीय गुणों से भरपूर है, शकरकंद – इस मौसम में खोदा जाने वाला स्वास्थ्यवर्धक कंद, अरबी (अरुवा), सुथनी लगायत स्थानीय मौसमी ताज़ी सब्जियाँ प्रसाद होते हैं।
यह पर्व हमें सिखाता है कि भोजन और पूजा दोनों में स्थानीय (Local) और मौसमी (Seasonal) उत्पादों का प्रयोग ही सर्वोत्तम है। इसमें किसी बाहरी, महंगी या कृत्रिम वस्तु का स्थान नहीं।
पर्यावरणीय संदेश:
छठ का यह संदेश आज के जलवायु परिवर्तन के युग में अत्यंत प्रासंगिक है। जब पूरा विश्व कार्बन फुटप्रिंट कम करने की बात करता है, छठ सदियों से यही संदेश दे रहा है – स्थानीय उत्पाद, न्यूनतम प्रसंस्करण, प्रकृति के साथ तालमेल। बाँस की दउरी, मिट्टी के दीये, पत्तल-दोना – ये सभी बायोडिग्रेडेबल और पर्यावरण-मित्र हैं।
यह सादगी और सात्विकता ही छठ को आधुनिकता के शोरगुल में भी प्रासंगिक बनाए रखती है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची समृद्धि प्रकृति के साथ सामंजस्य में है, उसके दोहन में नहीं।
ऐतिहासिक जड़ें: मगध-मधेश की सांस्कृतिक धरोहर
छठ का सर्वाधिक प्रचलन उस भू-भाग में है जो प्राचीन काल में मगध और वज्जि संघ के नाम से जाना जाता था। यह वही क्षेत्र है जहाँ पुर्वीय (भारतवर्षीय) सभ्यता के कुछ सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लिखे गए। सौर्य संप्रदाय की प्राचीन परंपरा यहाँ गहरे तक पैठी थी। शाकलद्वीपी ब्राह्मणों द्वारा स्थापित सूर्य मंदिरों की श्रृंखला इस क्षेत्र की सौर्य-उपासना की गवाह है।
परंतु इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यह वही भूमि है जहाँ तथागत बुद्ध का जन्म हुआ, जहाँ उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया और धर्मचक्र प्रवर्तन किया। लुम्बिनी से लेकर बोधगया और वैशाली तक – यह पूरा प्रदेश बौद्ध धर्म का पालना रहा है। छठ की लोकप्रियता को समझने के लिए इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।
बौद्ध साहित्य, विशेषकर पालि त्रिपिटक, सूर्य और प्रकृति के प्रति गहन सम्मान प्रदर्शित करता है। ‘अंगुत्तर निकाय’ में सूर्य को ‘लोकचक्खु’ (जगत की आँख) कहा गया है – ठीक वैसे ही जैसे छठ में सूर्य की पूजा होती है। ‘महासतिपट्ठान सुत्त’ में पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) पर ध्यान करने का उपदेश दिया गया है – और छठ इन्हीं पंचतत्वों की सामूहिक आराधना है।
बौद्ध धर्म में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव केंद्रीय है। छठ भी मूलतः कृतज्ञता का पर्व है – उन प्राकृतिक शक्तियों के प्रति जो हमारे जीवन को संभव बनाती हैं। यह साम्य संयोग नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण है।
लोक-मान्यता के अनुसार, भगवान बुद्ध के जन्म के बाद उनकी माता या फुआ ने संतान की दीर्घायु के लिए छठ व्रत किया था। यद्यपि इसका प्रत्यक्ष साक्ष्य बौद्ध ग्रंथों में नहीं मिलता, परंतु यह लोक-विश्वास दोनों परंपराओं के बीच की घनिष्ठता को दर्शाता है।
छठी मैया: लोक देवी का करुणामय स्वरूप
छठी मैया को सूर्य देव की बहन और संतानों की रक्षिका माना जाता है। नेपाल और बिहार में शिशु के जन्म के छठे दिन छठियार पूजा की परंपरा है, जिसमें माना जाता है कि छठी मैया बच्चे का भविष्य लिखती हैं। यह मातृत्व और संरक्षण का भाव छठ को एक कोमल, मानवीय आयाम प्रदान करता है।
दिलचस्प बात यह है कि बौद्ध परंपरा में भी ‘हारीती’ नामक देवी हैं जो शिशुओं की रक्षिका मानी जाती हैं। यह समानता पुनः दोनों परंपराओं के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का संकेत देती है। छठी मैया वास्तव में प्रकृति की उन सभी शक्तियों का समन्वित रूप हैं जो जीवन को पोषित करती हैं।
सर्वधर्म समभाव: साझा संस्कृति का उत्सव
छठ की सबसे सुंदर बात यह है कि यह धार्मिक सीमाओं को लाँघकर एक साझा सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन – सभी समुदायों के लोग इसमें श्रद्धा से भाग लेते हैं। हिन्दू के भी सभी वर्ण के लोग इस परम्परा में सहभागी होते है। छठ की तैयारी और आयोजन में विभिन्न जातियों और समुदायों का अनूठा सहयोग देखने को मिलता है:
बाँस की दउरी, सूप, और अन्य पूजा-सामग्री बनाने में डोम जाति के कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनकी कुशलता से बने ये पारंपरिक उत्पाद छठ पूजा का अभिन्न अंग हैं। बाँस की बुनाई की यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है। कुम्हार समुदाय के कारीगर मिट्टी के दीये बनाते हैं, बढ़ई लकड़ी की सामग्री तैयार करते हैं। घाटों की सफाई और सजावट से लेकर प्रसाद वितरण तक – सभी काम सामूहिक सहयोग से होते हैं। किसान ताजी उपज उपलब्ध कराते हैं, और स्थानीय व्यापारी पूजा-सामग्री की व्यवस्था करते हैं। यह सहकारिता छठ को केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का महोत्सव बनाती है।
बिहार के बेगूसराई, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर जैसे जिलों में कई मुस्लिम परिवार दशकों से छठ व्रत करते आ रहे हैं। कुम्हार समुदाय के मुस्लिम कारीगर मिट्टी के दीये बनाते हैं, लहेरी/मालाकार समुदाय के मुस्लिम कारीगर फूलों की माला, धागे की लहठी और सजावट की सामग्री तैयार करते हैं। पटना के लालजी टोला में पिछले 15 वर्षों से हिंदू और मुस्लिम समुदाय मिलकर छठ घाट की तैयारी कर रहे हैं।
मुजफ्फरपुर की मल्लिका बानो 22 वर्षों से छठ व्रत कर रही हैं, और बेगूसराई के कई मुस्लिम परिवार पाँच दशकों से यह पर्व मना रहे हैं। ये परिवार गर्व से कहते हैं कि वे रमजान का रोजा भी रखते हैं और छठ का व्रत भी – दोनों परंपराएँ उनकी पहचान का हिस्सा हैं।
छठ में मूर्ति-पूजा न होने के कारण मुस्लिम समुदाय भी इस पर्व से जुड़ा। सूर्य की प्रत्यक्ष उपासना, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता – ये सार्वभौमिक मूल्य हैं जो सभी धर्मों में स्वीकार्य हैं। इस्लाम में भी सूर्य को अल्लाह की महान कृति माना गया है।
परंतु यह भी सत्य है कि हाल के दशकों में कट्टरपंथी विचारधाराओं और धार्मिक शुद्धता के अभियानों ने इस साझा संस्कृति को कुछ हद तक प्रभावित किया है। पहले हर छट की घाटपर कुछ मुस्लिम परिवार मिल जाते थे। फिर भी, नेपाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी जीवित है, जो हमारी मिली-जुली संस्कृति की शक्ति का प्रमाण है।
यह सर्वधर्म समभाव छठ को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाता है। यह दर्शाता है कि हमारी लोक-संस्कृति में वह शक्ति है जो सभी धार्मिक विभाजनों को मिटाकर मानवता के स्तर पर हमें जोड़ सकती है। जब विभिन्न समुदाय के लोग एक साथ मिलकर छठ मनाते हैं, तो यह केवल एक पर्व नहीं रह जाता – यह भारतीय समाज की बहुलतावादी परंपरा और साझा संस्कृति का जीवंत उदाहरण बन जाता है।
तपस्या और आत्मशुद्धि का मार्ग
छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत, ठंडे जल में खड़े होकर अर्घ्य देना, और सख्त नियमों का पालन – यह सब एक कठोर तपस्या है। यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि संपूर्ण आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है।
नहाय-खाय से शुरू होकर खरना, संध्या अर्घ्य और प्रातः अर्घ्य तक – यह चार दिवसीय अनुष्ठान शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर साधना है। व्रती पूरी तरह सात्विक जीवन अपनाते हैं – न प्याज-लहसुन, न किसी प्रकार की अशुद्धता। यहाँ तक कि व्रती के लिए अलग रसोई, अलग बर्तन की व्यवस्था की जाती है।
कार्तिक माह की ठंड में नदी के जल में घंटों खड़े रहना, बिना जल ग्रहण किए सूर्योदय की प्रतीक्षा करना – यह शारीरिक सामर्थ्य और मानसिक दृढ़ता दोनों की परीक्षा है। परंतु यही कठोरता व्रती के आत्मविश्वास को बढ़ाती है।
यह तपस्या हमें याद दिलाती है कि जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण प्राप्त करने के लिए कठिन साधना आवश्यक है। आधुनिक युग में जब सब कुछ सरल और त्वरित चाहिए, छठ की यह तपस्या धैर्य, समर्पण और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है। व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए यह कठिन साधना करते हैं, जो निःस्वार्थ प्रेम और त्याग का प्रतीक है।
स्वदेशी चेतना का जागरण: न भव्यता, न दिखावा, केवल शुद्ध लोकाचार
छठ पर्व हमारी स्वदेशी चेतना को जगाने का सबसे प्रामाणिक माध्यम है। यह वह दुर्लभ पर्व है जिसने आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के तूफान में भी अपनी मौलिकता को पूरी तरह बचाए रखा है।
छठ में न कोई भव्य मूर्ति है, न कोई विशाल मंदिर, न कोई सोने-चांदी का दिखावा। नदी का साधारण घाट ही पूजा-स्थल है, बाँस की साधारण दउरी ही पूजन-पात्र है, और मिट्टी के साधारण दीये ही आलोक-स्रोत हैं। यह सादगी ही छठ की सबसे बड़ी विशेषता है – यह दर्शाती है कि आध्यात्मिकता के लिए न तो भव्य इमारतों की आवश्यकता है, न महंगे आयोजनों की।
जहाँ अन्य आधुनिक पर्वों में बाजारीकरण हावी हो गया है, वहीं छठ ने अपनी लोक-परंपरा को अक्षुण्ण रखा है। कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी छठ को अपने उत्पादों से जोड़ नहीं सकी, कोई व्यावसायिक संस्था इसे अपने मुनाफे का साधन नहीं बना सकी। यह पर्व आज भी उतना ही शुद्ध है जितना सदियों पहले था।
छठ के प्रसाद में एक भी आयातित वस्तु नहीं होती। सब कुछ स्थानीय मिट्टी में उगाया गया जैसे; ठेकुआ, भुसवा में गेहूँ का आटा, गुड़, घी – सभी स्थानीय है। गन्ना, केला, नारियल – अपनी धरती की उपज है। चावल का लावा – देशी धान से बना है। अदरक, हल्दी, मुली, अरबी – अपने खेतों से खोदा गया है। बाँस की दउरी, सूप, मिट्टी के दीये लगायत स्थानीय शिल्पकारों द्वारा निर्मित है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था (Local Economy) को मजबूत करने का सबसे सुंदर उदाहरण है। कोई मल्टीनेशनल कंपनी, कोई बड़ा कॉरपोरेट – इस पर्व में उनका कोई स्थान नहीं। यह पूरी तरह से लोक द्वारा, लोक के लिए आयोजित होता है।
यहाँ तक कि प्रसाद बनाने में भी कोई आधुनिक मिठाई या पैकेज्ड सामान का प्रयोग नहीं होता। न चॉकलेट, न बिस्कुट, न कोई फैंसी केक – केवल परंपरागत पकवान जो सदियों से बनते आ रहे हैं। यह आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण है।
सांस्कृतिक स्वायत्तता का प्रतीक
जब लाखों लोग एक साथ अपनी नदियों, अपने घाटों पर, अपने पारंपरिक छठ गीत गाते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो यह हमारी सांस्कृतिक स्वायत्तता और आत्म-सम्मान का प्रबल प्रदर्शन होता है। ये गीत भी कोई आधुनिक फिल्मी धुन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे लोकगीत हैं – “केलवा जे फरेला घवद से…”, “उगी हे सूरज देव…” – जिनमें हमारी माटी की सुगंध बसी है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान हमारी धरती, हमारी नदियों, हमारे सूर्य और हमारी लोक-परंपराओं से जुड़ी है। आधुनिकीकरण के दौर में भी छठ की बढ़ती लोकप्रियता यह संदेश देती है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं।
आज जब हर पर्व व्यावसायिक हो रहा है, जब परंपराएँ बाजार की भेंट चढ़ रही हैं, छठ अपनी मौलिकता के साथ खड़ा है। यह स्वदेशी आंदोलन का जीवंत प्रतीक है – बिना किसी नारे के, बिना किसी आंदोलन के, केवल अपनी शुद्ध परंपरा के बल पर। यह साबित करता है कि यदि हम अपनी संस्कृति में विश्वास रखें, तो किसी बाहरी चमक-दमक की आवश्यकता नहीं।
छठ हमें सिखाता है: सादगी में ही सच्ची भव्यता है, परंपरा में ही सच्ची आधुनिकता है, और स्वदेशी में ही सच्ची समृद्धि है।
उपसंहार: लोक-संस्कृति का अमर संदेश
छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है – यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक निरंतरता और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यह वह दुर्लभ सांस्कृतिक साक्ष्य है जो प्रमाणित करता है कि हमारी लोक-परंपराएँ विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और विचारधाराओं को आत्मसात करते हुए एक समृद्ध, समावेशी और सर्वस्पर्शी संस्कृति का निर्माण कर सकती हैं।
यह पर्व हमें एक साथ कई महत्वपूर्ण संदेश देता है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता – ऋग्वेद और बौद्ध साहित्य दोनों में वर्णित पंचतत्वों की उपासना, हमें याद दिलाती है कि हम प्रकृति के पुत्र हैं, उसके शोषक नहीं।
सरल जीवन की महिमा – न भव्य मूर्तियाँ, न विशाल मंदिर, न आयातित प्रसाद – केवल स्थानीय मिट्टी में उगे उत्पाद और स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित सामग्री। यह सादगी ही छठ की सबसे बड़ी शक्ति है।
सामाजिक समरसता – वज्जि गणराज्य की लोकतांत्रिक परंपरा की तरह, छठ में सभी समान हैं। डोम जाति की बाँस की कला हो या मुस्लिम कुम्हार के मिट्टी के दीये या लहटी, मल्लिका बानो का 22 वर्षों का व्रत हो या लालजी टोला का हिंदू-मुस्लिम सहयोग – यह पर्व सच्चे अर्थों में सर्वधर्म समभाव का उत्सव है।
आध्यात्मिक साधना: 36 घंटे का निर्जला व्रत, ठंडे जल में खड़े होकर अर्घ्य – यह तपस्या हमें आत्मशुद्धि और आत्मविश्वास का मार्ग दिखाती है।
मगध-मधेश की गौरवशाली विरासत: यह पर्व हमारी प्राचीन मगध-मधेश संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जहाँ सनातन सौर्य परंपरा, बौद्ध दर्शन और लोक-आस्था का अद्भुत त्रिवेणी संगम है। लुम्बिनी से पाटलिपुत्र तक, वैशाली से कपिलवस्तु तक – यह पूरा प्रदेश छठ और बुद्ध दोनों की साझा भूमि है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण है।
आधुनिक युग में प्रासंगिकता: आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रहा है, छठ हमें समाधान का मार्ग दिखाता है; जैसे – स्थानीय और मौसमी उत्पादों का प्रयोग, जैव-अपघटनीय सामग्री, न्यूनतम कार्बन फुटप्रिंट, स्थानीय कारीगरों और किसानों को सशक्त बनाना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुक्ति, बाजारीकरण के दौर में भी अपनी मौलिकता को बचाए रखना और जाति, धर्म, वर्ग से परे मानवीय एकता आदी।
वैश्वीकरण के दौर में जड़ों से जुड़ाव: छठ हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करता है। जब वैशाली, पटना, बीरगंज, जनकपुर, बिराटनगर, काठमांडू, मुजफ्फरपुर के घाटों पर लाखों लोग एक साथ “केलवा जे फरेला घवद से…” गाते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता – यह हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का जयघोष बन जाता है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति वह है जो अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए, प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखते हुए, और सभी मनुष्यों को समान मानते हुए आगे बढ़े। जो विकास अपनी जड़ों से कटकर होता है, वह केवल भटकाव है, प्रगति नहीं।
छठ महापर्व सही मायने में ‘लोक’ का, ‘लोक’ के लिए और ‘लोक’ द्वारा मनाया जाने वाला महोत्सव है। यह एक ऐसा पर्व है जो हमें बताता है कि: सादगी में ही सच्ची भव्यता है, परंपरा में ही सच्ची आधुनिकता है, स्वदेशी में ही सच्ची समृद्धि है, और प्रकृति के साथ ही सच्ची प्रगति है।
यह पर्व हमारी सांस्कृतिक समृद्धि, धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का वह गौरवशाली संदेश है जो सदियों से अखंड है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
जब तक गंगा-कोसी-गंडक बहती रहेंगी, जब तक सूर्य उगता रहेगा, तब तक छठ महापर्व हमारी लोक-चेतना का अमर प्रतीक बना रहेगा – हमें हमारी जड़ों से जुड़ावन के लिए हमें स्वदेशवादी बनना ही होगा जो हमारे गौरव का बोध कराता है, और हमें एक समरस, संवेदनशील समाज बनाने की प्रेरणा देता है।

लेखक: संतोष मेहता


