मन मयूर : वाणी नित्या
क्या है मन का वास्तविक स्वरूप ?
वाणी नित्या, ९ नवंबर ०२५। तन और मन हमारे साकार रूप के दो तत्व हैं ।तन भी बाह्य कारकों से प्रभावित होता है और मन भी ।क्या है ये मन?
एक रहस्यमय निराकार तत्व या फिर अचेतन मन या फिर चेतन मन ?
क्या है मन का वास्तविक स्वरूप?
अनेक ऋषि मुनियों ने मन को परिभाषित करने का प्रयास किया है । स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा

“मन बहुत शक्तिशाली है ।यदि आत्मा शरीर रूपी रथ का स्वामी है तो मन इस रथ का सारथी है।
मन शरीर का एक अदृश्य हिस्सा है लेकिन इसका सम्बन्ध आत्मा से नही है। यह बहुत चंचल भी होता है।”

मन का मयूर तभी नाचता है जब हम इसकी इच्छा पूरी करते हैं ।इसे फलने फूलने का अवसर देते हैं या यूं कहें इसके इशारे पर नाचते हैं।
हमारे देश मे हमारी प्राचीन संस्कृति रही है मन को साधना ।हमारे ऋषि मुनियों ने मन को नियंत्रित करने पर जोर दिया ।क्यों?
क्योंकि मन कभी संतुष्ट नही होता ,कभीं किसी बात पर ,किसी खुशी पर सदा स्थित नही रह सकता ।
अस्थिर है मन ,चंचल है मन ,
आज यहां तो कल वहां है मन।
अतः ये हमे समझना होगा कि या तो मन के अनुरूप चले हम या फिर मन को नियंत्रित कर चले।
आज के भौतिक युग मे जहां मन को महत्व देते हैं उसकी इच्छानुसार चलते हैं वहीं हमारे शास्त्रों में मन को नियंत्रित करने के लिए साधना पर जोर दिया गया है ।जो कि अत्यंत आवश्यक है। मन को बड़े बड़े ऋषि मुनि प्रसन्न नही रख पाये । उन्हें ज्ञात हुआ कि मन के पीछे भागना सर्वथा अनुचित है।
जब मन कही संतुष्ट नही होता तो इसके पीछे क्यों भागना ?
मन के अनुसार नही चले मन को अपने अनुसार चलाये।इसका केवल एक ही उपाय है ,हम सकारात्मक रहे ,अच्छे विचार को मन मे लाये ,सद्कर्म करे ।
मन की एक इच्छा आज पूरी हो कल वो दूसरी इच्छा रखता है। इसीतरह मन अपने मकड़जाल में हम मनुष्यों को फांस ही लेता है।
सोच के साथ अच्छे विचार अत्यंत आवश्यक है। एहि सदविचार हमे एक सही और सुंदर जीवन प्रदान करते हैं ।जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बनते हैं या यूं कहें हमारा व्यवहार एवम हमारा व्यक्तित्व विचार अनुरूप ही ढलता है।
अतः मन को अच्छे कर्म ,अच्छे विचार से साधना आना चाहिए तभी मन मयूर प्रसन्न रहेगा ।
वाणी नित्या स्वलिखित मौलिक

काठमांडू

