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बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना काे मिली फांसी की सजा

 

काठमान्डू 17नवम्बर

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ लगे 5 गंभीर आरोपों पर अदालत ने फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पूर्व पीएम को दोषी बताते हुए, उन्हें फांसी की सजा दी है। अदालत के इस फैसले से न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई है।

बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने अपने फैसले में शेख हसीना को मानवता के खिलाफ कदम उठाने का दोषी माना है। कोर्ट ने पूर्व पीएम के अलावा बांग्लादेश के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल के खिलाफ भी कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

शेख हसीना को भगोड़ा घोषित किया
जस्टिस मोहम्मद गोलाम मजूमदार की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि तीनों आरोपी प्रदर्शनकारियों की हत्या में शामिल थे, जिसके कारण पूरे देश में हिंसा भड़की थी। कोर्ट ने शेख हसीना और कमाल को भगोड़ा घोषित करते हुए चौधरी अब्दुल्ला को सजा देने की बात कही है।

कोर्ट ने माना कि हसीना सरकार ने छात्रों की मांग को नजरअंदाज किया। वहीं, जब भारी संख्या में स्टूडेंट्स सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने लगे, तो पूर्व पीएम ने आपत्तिजनक बयान देते हुए उन्हें ‘रजाकार’ कह डाला।
शेख हसीना के इस बयान के बाद छात्राओं समेत सभी स्टूडेंट्स का गुस्सा भड़क गया और प्रदर्शनकारियों ने हिंसा शुरू कर दी।
हिंसा पर काबू पाने के लिए शेख हसीना ने सख्त एक्शन लेने का आदेश दिया।
शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के छात्र लीग और युवा लीग समेत अलग-अलग शाखाओं ने ढाका विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स पर हल्ला बोल दिया।
शेख हसीना ने मानवता के खिलाफ अपराध किया है। 5 अगस्त के दिन चंखारपुल में 6 प्रदर्शनकारियों को मारा गया था। शेख हसीना के आदेश पर तत्कालीन गृह मंत्री और आईजी ने एक्शन लिया, जिसमें कई छात्रों की मौत हो गई थी।

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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल हुई बांग्लादेश हिंसा में 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच 1400 लोगों की जान गई थी और हजारों लोग घायल हुए थे। वहीं, बांग्लादेश में हालात बेकाबू होने के बाद शेख हसीना ने 5 अगस्त 2024 को देश छोड़ दिया था। तत्कालीन गृह मंत्री कमाल भी देश से भाग निकले थे। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पिछले 1 साल से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की गुहार लगा रही है, लेकिन भारत ने अभी तक इसपर कोई जवाब नहीं दिया है।

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1975 में जब आधी रात को एक खूनी सैन्य तख्तापलट हुआ तो शेख हसीना जर्मनी में थीं। उस समय उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान, उनकी मां, तीनों भाई और दो भाभियों की ढाका स्थित घर में हत्या कर दी गई थी। कुल 36 लोग मारे गए थे। इस नरसंहार से बची हसीना परिवार के साथ भारत आईं और कई साल तक यहीं रहीं।

कब बनीं प्रधानमंत्री?
इसके बाद 1981 में भारत में रहते हुए वे अवामी लीग की अध्यक्ष चुनी गईं। 1996 में वे पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, फिर 2009 में दोबारा सत्ता में लौटकर लगातार 2024 तक देश की सबसे लंबे समय तक रहने वाली प्रधानमंत्री बन गईं।

हसीना के कार्यकाल में ढाका-दिल्ली रिश्ते अपने सबसे अच्छे दौर में रहे। सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद विरोधी कार्रवाई और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग में बड़ी प्रगति हुई। इसी करीबी रिश्ते के कारण 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में उन्हें शरण दी, जबकि नई बांग्लादेश सरकार लगातार उन्हें सौंपने की मांग कर रही थी।

किस बयान से हुआ भारी बवाल?
अपने चौथे कार्यकाल की शुरुआत के कुछ महीनों बाद ही हसीना को देशभर में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। उन्होंने एक बयान में कहा कि अगर मुक्तियुद्धा के पोते-पोतियों को लाभ नहीं मिलना चाहिए तो क्या लाभ राजाकारों के पोते-पोतियों को दिया जाए?

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यह बयान भारी विवाद का कारण बना और आंदोलन उनके खिलाफ मोड़ ले लिया। सरकार की कड़ी कार्रवाई में 1 हजार से ज्यादा लोगों की मौत का दावा किया गया। आंदोलनों को दबाने की कोशिश नाकाम रही और विरोध सीधे उनके घर तक पहुंच गया। हसीना को बहन रेहाना के साथ भारत भागना पड़ा।

अदालत ने किस आधार पर सुनाया फैसला?
हसीना के निष्कासन के 15 महीने बाद ढाका की अदालत ने उन्हें मानवता विरोधी अपराधों में दोषी ठहराया। अदालत का कहना है:-

हसीना ने प्रदर्शनकारियों पर हमले भड़काए
हत्या के आदेश दिए
नागरिकों की सुरक्षा नहीं की
समन भेजने के बाद भी अदालत में पेश नहीं हुईं
अदालत ने उनके न आने को गुनाह का सबूत बताया। हसीना ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह एक बदले की कार्रवाई है और ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल वास्तव में अंतरराष्ट्रीय या निष्पक्ष नहीं है

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