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“समरथ को नहीं दोष गोसाईं” : अजयकुमार झा

 

“समरथ को नहीं दोष गोसाईं”

अजयकुमार झा, जलेश्वर । लोकजीवन का वह युगबोध है जिसमें शक्ति और सामर्थ्य को दोष से परे माना जाता है। सामर्थ्यवान व्यक्ति को समाज और इतिहास अक्सर दोषी नहीं ठहराते, क्योंकि परिणाम ही उसकी सफलता का परिचायक माना जाता है। यह कहावत राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सत्यों को समझने की एक प्रमुख कुँजी भी है। नेपाल जैसे विविध, जटिल और संक्रमणशील राष्ट्र के संदर्भ में यह उक्ति अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। नेपाल ने एक छोटे हिमालयी राज्य से शुरू होकर राजतंत्र, प्रजातंत्र, संविधान, युद्ध, शांति-प्रक्रिया और वैश्विक भू-राजनीति तक कई रूपांतरण देखे हैं। नेपाल के इतिहास को ध्यान से देखने पर स्पष्ट होता है कि जो भी काल, नेतृत्व या व्यवस्था सामर्थ्यवान रही – उसे इतिहास ने दोष न देकर उपलब्धियों के रूप में याद किया। चाहे वह राजा पृथ्वीनारायण शाह का अखण्ड नेपाल निर्माण हो, राणा शासन की दीर्घकालिक सत्ता-स्थिरता, राजतंत्र की आधुनिकीकरण प्रक्रिया,  लोकतान्त्रिक आंदोलन या नरसंहारक भीषण माओवादी जनयुद्ध; – हर काल में “सामर्थ्य” ने “दोष” पर विजय पाई। वर्तमान में स्कूली बच्चों के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार करते हुए नृशंस हत्या करनेवाले, देश को खुलेआम लुटते हुए विदेशियों के अड्डा बनानेवाले लोग मतवाले हाथियों की तरह सिंहदरवार के चौराहे पर हुंकार भरते हुए सरकारको चुनौती दे रहे है, और सरकार बूढ़े पिता की तरह असहाय और कातर नजरों देख मौन साधे हुए है। शायद नेपाल सरकार अपने पूर्वज के दिव्य सामर्थ्य को भूल गए हैं।

पृथ्वीनारायण शाह जब गोर्खा के छोटे राज्य से निकले और १ राज्य को ५४ राज्यों में बदलने की प्रक्रिया शुरू की, तो विरोध, युद्ध और पराजय भी सामने आए। परंतु परिणाम यह हुआ कि नेपाल व्यापक भूगोल, राजनीतिक आकार और एकीकृत राष्ट्र के रूप में सामने आया। इसलिए इतिहास ने उन्हें दोष नहीं दिया; बल्कि उन्हें “राष्ट्र निर्माता” की उपाधि प्रदान की। यह इस उक्ति की पहली व्यावहारिक अनुभूति है। ध्यान रहे, “सफल सत्ता ही दोष से मुक्त होती है।” इसी तरह राणा शासन को अक्सर तानाशाही कहा जाता है। परंतु उन्होंने लगभग १०४ वर्षों तक नेपाल को एक शासनिक प्रणाली में निरन्तर चलाए रखा। इस काल खंड में प्रशासनिक ढाँचा विकसित हुआ। केन्द्रीय सत्ता संगठित रही। बाहरी शक्तियों से नेपाल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा। आज भले ही लोकतांत्रिक दृष्टि से आलोचनाएँ होती हों, परंतु यह सत्य भी है कि इतने लम्बे काल तक सत्ता का टिके रहना सामर्थ्य का प्रमाण है। इसलिए इतिहास राणा शासन को केवल दोष की आंख से नहीं देखता, बल्कि उसे निर्माणशील सामर्थ्य के रूप में भी स्वीकार करता है। ऐसे ही जब राजतंत्र के हाथों में नेपाल का शासन रहा तो विश्वविद्यालय स्थापित हुए, टेलीफोन, सड़क, स्वास्थ्य सेवाएँ, बैंकिंग मजबूत हुई, सेना और प्रशासनिक तंत्र विकसित हुआ।नेपाल की वर्तमान संस्थाओं का ढांचा राजतंत्र के काल से ही आता है। आलोचनाएँ भी हुईं, विरोध भी हुआ, लेकिन जो सत्ता राष्ट्र को ठोस परिणाम देती है, उसे इतिहास दोष नहीं देता।

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सन 1990 और 2005-06 के जनआंदोलनों के बाद नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हुआ। जनता की अपेक्षा बढ़ी। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी। संविधान सभा बनी। नया संविधान लागू हुआ। राजा को संविधान के भीतर लाया गया। राजा को जनभावना के दोषी ठहराते हुए नेपाल के लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम हुआ। इतिहास में यह उपलब्धि अद्वीतीय साबित हुई। उस समय के नेतृत्व को जननायक की उपाधि से नवाजा गया। ध्यान रहे, जो परिणाम लाता है, उसे इतिहास दोषी नहीं ठहराता। प्रमाण के रूप में माओवादी जनयुद्ध को प्रत्यक्ष रूप से दोष, हिंसा और विनाश की दृष्टि से देखा जाता है, परंतु यह भी सत्य है कि युद्ध ने राष्ट्रीय प्रश्नों को खुलकर सामने रखा। जातीय, क्षेत्रीय और सामाजिक समानता की माँग संस्थागत हुई। संविधान निर्माण का रास्ता तैयार हुआ। इसलिए परिणाम यह कि माओवादी आंदोलन इतिहास में केवल हिंसा के रूप में नहीं, बल्कि परिवर्तन की शक्ति के रूप में भी अंकित हुआ।

नेपाल की वर्तमान राजनीति में “सामर्थ्य” और सामर्थ्यवान के पांच आयाम को समझने की जरूरत है। पहला है सत्ता प्राप्ति की सामर्थ्य। दूसरा: सत्ता बनाए रखने की सामर्थ्य। तीसरा: विकास परिणाम देने की सामर्थ्य: जनसमर्थन बनाए रखने की सामर्थ्य और पांचवा है अंतरराष्ट्रीय संतुलन को निष्कलंकित रखने की सामर्थ्य। आज भी जो दल या नेता इन पाँचों को साधने में सफल हो जाते हैं, जनता उन्हें अधिक दोष नहीं देते। बल्कि उनके कुकर्मों में भी बहादुरी और राष्ट्रीयता के राग अलापने लगते हैं। अभी अभी जहां जेन जी आंदोलन के सफलता को विश्व उदाहरणीय मानता है वहीं सत्ताच्युत पार्टी इस आंदोलन को राष्ट्रघात और संवैधानिक संकट तथा राष्ट्रीयता के संपत्ति के विनाश हेतु आतंकी घोषित करने के लिए दिनरात कसरत कर रहे हैं। जेन जी लोग भी यह समझने लगे हैं कि यदि हमारी सामर्थ्य कम हुई तो हमारा गंतव्य जेलखाना ही है। इस प्रकार सब अपनी अपनी सामर्थ्य अनुसार जनता को समझने में लगे हैं। आम जनता भीतर भीतर सबकुछ समझती है लेकिन वह बार बार प्रतिक्रिया नहीं करती। वर्षों में एक बार प्रतिक्रिया करती जब भीषण परिवर्तन किया जाता है। आम आदमी को राष्ट्रीय परिवर्तन हेतु सड़क पर उतारना सामान्य बात नहीं है। इसके युगबोध से युक्त वैचारिक क्रांति की आग और सशक्त तथा विश्वसनीय सांगठनिक शक्ति के छाया का होना आवश्यक होता है। वर्तमान में जेन जिओ के पास न युगबोध वैचारिक सामर्थ्य है और न सशक्त सांगठनिक शक्ति ही है। यही कारण है कि बुड्ढे गिद्ध लोग इनकी रक्त से अपनी राजनीतिक प्यास को बुझाने में जुटे हुए हैं। शारीरिक सामर्थ्य तत्काल परिणाम लाने में सफल दिख सकता है लेकिन दूरगामी और सुफल परिणाम लाने के लिए बौद्धिक तथा सांगठनिक सामर्थ्य ही साथ निभा सकती है। युवाओं ने जोश में यहीं पर अपनी होश को गंवाया है जैसा लग सकता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। सैकड़ों युवाओं ने अपनी प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र को एक योग्यतम् व्यक्ति के हाथों में सौंपा है। अब वहीं लोग उन्हें धोखे में डाल दे तो कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर उन्हें कही और सुरक्षा के दृष्टि से अपने को केंद्रित करना होगा। अन्यथा सारे दोष इनके मत्थे मढ़े जाएंगे। अतः वे लोग भी अपनी सामर्थ्य को ध्यान में रखते हुए एक सशक्त सांगठनिक शक्ति के साथ जुड़ने का प्रयास करेंगे।

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वैसे भी नेपाल की बहुदलीय राजनीति में गठबंधन, विभाजन, जोड़ तोड़, अचानक फैसले, संवैधानिक बदलाव आम हैं। जनता आलोचना करती है, लेकिन जिन्हें परिणाम मिल जाते हैं; इतिहास उनकी दोषों को धुंधला कर देता है। विरुद्ध सैद्धांतिक दलों से गठबंधन सफल होने को भी सामर्थ्य ही कहा जाता है। यदि सरकार गिर गई और किसी भी अनैतिक कार्य के द्वारा वापसी हो गई तो पिशाचनिति ही सही लेकिन सामर्थ्यवान के बिल्ला के साथ वाहवाही मिल जाता है। और अगर प्रदेश से केन्द्र तक पकड़ बन गई तो यह सफलता जन गण मन के हृदय में आसीन हो जाते हैं। इसलिए सत्ता का नैतिक मूल्य अक्सर परिणाम के बाद निर्धारित होता है।

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जब किसी नेतृत्व को आर्थिक परिणाम अच्छे आते हैं, तब सरकार, व्यवस्था और नेतृत्व को सराहा जाता है। जब आर्थिक विकास धीमा पड़ता है, तब नेतृत्व को दोष देने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि सरकारों का मूल्यांकन परिणाम से होता है – ठीक उसी उक्ति की तरह “सफल हो जाओ, दोष स्वतः मिट जाएगा।” इसलिए नेपाल का नागरिक आज परिणाम–आधारित लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ रहा है, जहाँ किसी को स्थाई सम्मान या निंदा नहीं मिलती; सम्मान उसके वर्तमान सामर्थ्य से निर्धारित होता है। इसलिए “समरथ को नहीं दोष गोसाईं” आज भी नेपाल में शासन, अर्थ, समाज और राजनीति को समझने की वैज्ञानिक कसौटी है। तुलसीदास की यह उक्ति नेपाल के इतिहास, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति में आज भी जीवित है क्योंकि जो नेता, दल या काल अपनी सामर्थ्य सिद्ध कर देता है, उसे दोष देने का अधिकार इतिहास खुद छीन लेता है।

अजय कुमार झा
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