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रदीफ़ “किया मैंने” काफिया “अर” : वाणी नित्या

रदीफ़ “किया मैंने”
काफिया “अर”

ख्वाब कुछ अधूरा सा मुश्तहर किया मैंने
जिंदगी बसर तन्हा इस क़दर किया मैंने

यूँ बहुत रहे अपने लोग साथ कहने को
वक्त देखकर किस्मत से सबर किया मैंने

चाँद भी सितारों में मुस्कुरा रहा कब से
रात को ज़मीं पर क्यों दरबदर किया मैंने

सेज फूल की मिलती है यहॉं नहीं सबको
आसमान को फिर अपना शहर किया मैंने

कौन है जहाँ में हमराज़ कब तलक़ “नित्या “
सोच कर कदम को रखना ठहर किया मैंने

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वाणी नित्या

वाणी नित्या

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