चुनौतियों के बीच चुनाव की चर्चा : डॉ.श्वेता दीप्ति

डॉ श्वेता दीप्ति, आवरण हिमालिनी अंक दिसम्बर,०२५। वर्तमान समय में नेपाल में सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार है । अंतरिम सरकार एक अस्थायी सरकार होती है, जो किसी देश में राजनीतिक उथल–पुथल, क्रांति, या नए संविधान बनने जैसी परिस्थितियों में, एक स्थायी सरकार के चुनाव या गठन होने तक देश का कामकाज संभालने के लिए बनती है, ताकि सत्ता का हस्तांतरण सुचारू रूप से हो सके और देश में कोई शून्य न हो । इसे कार्यवाहक या संक्रमणकालीन सरकार भी कहते हैं, और इसका मुख्य काम सामान्य प्रशासन चलाना और चुनाव कराना होता है । अंतरिम सरकार हमेशा के लिए नहीं होती, बल्कि एक निश्चित अवधि के लिए होती है जब तक नई, स्थायी सरकार नहीं बन जाती । यह एक ‘पुल’ की तरह काम करती है जो पुरानी व्यवस्था से नई और स्थायी व्यवस्था तक ले जाती है । देश में अराजकता न फैले इस वजह से अंतरिम सरकार का गठन किया जाता है । ताकि खालीपन का फायदा राष्ट्रविरोधी लोग न उठा सकें । यह अंतरिम सरकार हालात सामान्य होने तक कामकाज संभालती है । वह स्थिरता देने की कोशिश करती है ताकि सिस्टम ढह न जाए. और फिर जब नई सरकार का गठन हो जाता है तो अंतरिम सरकार की भूमिका समाप्त हो जाती है ।

अंतरिम सरकार में कोई नया कानून पारित नहीं किया जा सकता । इसके अलावा अस्थायी सरकार सेना या विदेश नीति जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सीमित निर्णय लेने का अधिकार रखती है । अमूमन अंतरिम सरकार कुछ हफ्तों से चंद महीनों तक ही चलती है । नेपाल के मौजूदा संकट में युवाओं ने सुशीला कार्की को अपना नेता चुना था जो इस बात का संकेत थी कि, जनता अब भ्रष्टाचार और अस्थिर राजनीति से निजात चाहती है । कार्की को इसलिए भी एक बेहतर विकल्प माना गया कि वे राजनीति से सीधे तौर पर नहीं जुड़ीं थीं और उनकी छवि निष्पक्ष मानी जाती है । और इसलिए यह माना गया कि वो अंतरिम सरकार को संतुलित तरीके से चला सकती हैं । लेकिन वही जेन जी अब कई बार उनसे इस्तीफे की मांग भी कर चुकी है । नेपाल में संसदीय लोकतंत्र है, यहां प्रधानमंत्री का पद कार्यकारी प्रमुख का होता है । देश का प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अधीन आता है । नेपाल के संविधान के अनुसार यहां प्रधानमंत्री का चयन संसद के बहुमत के आधार पर होता है । राष्ट्रपति संसद में सबसे बड़े दल के नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित करता है । उम्मीदवार को ३० दिनों के भीतर संसद में विश्वासमत हासिल करना होता है, अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो दूसरे उम्मीदवार को मौका दिया जाता है । इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए देश में समय पर निर्वाचन की आवश्यकता है ।

इसलिए सरकार ने प्रतिनिधिसभा निर्वाचन की मिति २०८२ फागुन २१ गते निर्धारित की है । प्रतिनिधि दल भी कमोवेश तैयारी में व्यस्त हैं । एमाले ना चाहते हुए भी आगे बढ़ चुकी है । चुनावी प्रक्रिया शुरु है बावजुद इसके जनता और कार्यकर्ता निराश और असमंजस में हैं । कई राजनीतिक दल के नेता तथा मतदाता निर्धारित समय में निर्वाचन होने की संभावना से इनकार कर रहे हैं । निर्धारित फागुन २१ गते आने में तकरीबन तीन महीना बांकी है । निर्वाचन आयोग की तैयारी तीव्र गति ले चुकी है । प्रायः सभी मुख्य दलों ने निर्वाचन आयोग में पंजीकरण करवा लिया है । इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने सभी मुख्य दलों से बातचीत भी की है । किन्तु विभिन्न प्रदेशों में चुनावी चहलपहल में कमी दिख रही है ।
खास कर मधेश प्रदेश की राजनीति में जो उठापटक चल रही है उसने वहाँ चुनाव का कोई माहोल बनने ही नहीं दिया है । सरकार बार–बार यह कह रही है कि निर्वाचन का वातावरण बन चुका है किन्तु जनस्तर में निर्वाचन के प्रति संशय यथावत है । किन्तु प्रधानमंत्री कार्की समय समय पर यह कहती आईं हैं कि चुनाव ही देश को संवैधानिक अनिश्चितता से बचाने का एकमात्र सही तरीका है । इसके लिए वो सभी राजनीतिक पार्टियों से समय पर और जिम्मेदारी से चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने की अपील करती आ रही हैं । उन्होंने कई बार यह कहा है कि मौजूदा सरकार युवाओं के जायजÞ गुस्से और दशकों से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ आंदोलन पर आधारित है, जेन जी के आन्दोलन ने साफ संदेश दिया है कि, ‘बस बहुत हो गया! भ्रष्टाचार, कुशासन और पहुंच की राजनीति अब और नहीं चलेगी ।’
लोकतंत्र का वाहक शक्ति राजनीतिक दल ही होता है । दलों के साथ, सहयोग और सहभागिता के बिना चुनाव की परिकल्पना भी असम्भव होती है । ऐसे में अगर कोई दल चुनाव का बहिष्कार करता है तो यह उसकी अराजकता ही मानी जाएगी । गत भाद्र २३ और २४ को हुए जेनजी आन्दोलन के साथ ही सत्ताच्यूत हुए तत्कालीन सरकार के प्रधानमन्त्री तथा नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली पहले तो निर्वाचन ना होने की बात पर अडिग थे किन्तु अब नेकपा एमाले ने भी निर्वाचन आयोग में पंजीकरण करवा लिया है । इससे यह तो तय हो गया है कि चुनाव होगा । लोकतन्त्र की सुन्दरता ही निर्वाचन है किन्तु मुख्य दलों की नीति की वजह से आम जनता में सशंय बना हुआ है । पिछले दिनों जेनजी आन्दोलन में जो हुआ उसका खौफ बना हुआ है । आज भी जनता की सोच यही है कि अगर सत्तासीन दल अच्छे काम करते तो आन्दोलन के नाम पर जो तबाही देश ने देखा वह नहीं होता ।
भले ही देश निर्वाचन में जा रहा है किन्तु परिदृश्य में कोई बदलाव नहीं दिख रहा है । सभी दलों में वही पुराने चेहरे हैं जो सामने हैं और ऐन–केन–प्रकारेण स्वयं को पुनः स्थापित करने के लिए तत्पर हैं । जनता के समक्ष कोई नया विकल्प नहीं है । ऐसे में क्या देश किसी नवीन परिवर्तन या विकास की कल्पना कर सकता है ? सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री और एमाले अध्यक्ष ओली अभी भी अपने पुराने तेवर में ही दिखाई दे रहे हैं । राजनीति को रोचक बनाने में ओली का विशेष योगदान रहा है । भले ही आज वो सरकार में नहीं हैं किन्तु राजनीति की चर्चा में वही केन्द्रबिन्दु हैं ।
सच तो यह है कि ओली के तेवर को देखते हुए फागुन २१ में होने वाली प्रतिनिधि सभा के चुनाव में निर्वाचन आयोग में पंजीकरण कराने के बाद भी एमाले का सहभागी होना तय नजर नहीं आ रहा है ।
क्योंकि एमाले ने पंजीकरण के साथ ही प्रतिनिधिसभा पुनःस्थापना की मांग करते हुए सर्वोच्च अदालत में रिट भी दायर किया है । एक ओर अदालत की राह और दूसरी ओर निर्वाचन आयोग की राह ऐसे में एमाले चुनाव में आएगी या नहीं ययह संशय बरकरार है । एमाले अध्यक्ष काठमान्डू में किए गए शक्तिप्रदर्शन में खुलकर वर्तमान सरकार के विरोध में बोलते नजर आए । उन्होंने कहा कि सुशीला कार्की को सरकार से हटना होगा और अविलम्ब प्रतिनिधिसभा पुनःस्थापना करना होगा । इतना ही नहीं उन्होंने चेतावनी दी कि इस सरकार को चुनाव कराने का अधिकार ही नहीं है । उन्होंने धमक के साथ कहा कि कार्की को सरकार से हट जाना चाहिए । एमाले डरने वाली नहीं है वह प्रतिनिधि सभा पुनःस्थापना कर के रहेगी ।
वर्तमान सरकार के औचित्य को नेकपा एमाले लगातार चुनौती दे रही है और गैरसंवैधानिक बता रही है । एमाले का मानना है कि निर्वाचन कर्मकाण्डी मात्र है । अगर प्रतिनिधि सभा पुनःस्थापना नहीं होता है तो एमाले सड़क पर आने की धमकी भी देती आ रही है । एक ओर आगामी चुनाव की चर्चा है तो वहीं दूसरी ओर सभी प्रमुख दल अधिवेशन और गठबंधन तथा एकता करने में व्यस्त है ।
कांग्रेस आखिरकार पौष में अधिवेशन करने के नतीजे पर पहुँच गई है, जिससे डेढ़ महीने से चल रही अंदरूनी खींचतान खत्म हो गई है । अगले डेढ़ महीने तक पार्टी अपने अधिवेशन के मुद्दे पर फोकस करेगी ।
एक दर्जन से ज्यादा घटक से बनी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, देश भर में एकता का संदेश देते हुए जनसभा कर रही है । नई बनी पार्टियाँ अभी तक कायर्यदल भी नहीं बना पाई हैं । रास्वपा संभावित चुनाव नतीजों को ध्यान में रखते हुए दूसरी ताकतों के साथ गठबंधन करने पर फोकस कर रही है । इस परिस्थिति में यह सवाल सभी के मस्तिष्क में है कि क्या समय पर चुनाव हो पाएगा ? क्या चुनाव की सारी प्रक्रिया पूरी है ? हाँ प्रधानमंत्री की ओर से अवश्य यह संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव तय समय पर ही होगा और इसके लिए वो सभी मुख्य दलों से विचार विमर्श और सहयोग का अनुरोध भी कर चुकी हैं । उन्होंने प्रधानमंत्री निवास में सर्वदलीय बैठक बुलाया था । जहाँ सभी घटक ने अपने अपने विचार रखे थे । जहाँ सरकार की ओर से यह कहा गया कि चुनाव की तैयारी पर्याप्त है वहीं एमाले की ओर से शंकर पोखरेल ने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि चुनाव का माहौल बन गया है, उन्हें भरोसा नहीं है कि चुनाव होंगे, और ‘जो चुनाव होंगे ही नहीं, उस पर बहस क्यों ?’ अन्य दलों ने सुरक्षा के सवाल पर अपनी चिन्ता व्यक्त की थी ।
परिस्थिति यह है कि जेन जी आंदोलन ने देश में राजनीतिक अस्थिरता ही पैदा नहीं की है बल्कि आर्थिक और सामाजिक संकट को भी गहरा किया है । इस स्थिति से अंतरिम सरकार के लिए उम्मीद के मुताबिक नतीजे हासिल न कर पाने का खतरा है ।
आम हालात में, नेपाल का निर्वाचन आयोग चुनाव की तैयारी के लिए चार महीने का समय मांगता है । मौजूदा हालात नाजुक है । आंदोलन के दौरान सरकारी ढांचे को बहुत नुकसान हुआ है । ऐसे में, देखा जाए तो तय तारीख पर चुनाव कराने का वादा पूरा करना मुश्किल नजर आता है । निर्वाचन आयोग में प्रमुख निर्वाचन आयुक्त और एक दूसरे आयुक्त के पद भी खाली हैं । मौजूदा संविधान में संवैधानिक परिषद की सिफारिश पर इन पदों पर राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्ति का प्रावधान है । किन्तु ऐसा करने में कानुनी बाधा है और इसे हटाने के लिए अध्यादेश लाना होगा । साथ ही मौजुदा निर्वाचन ऐनम में निर्वाचन मिति घोषणा के बाद नये मतदाता का नाम पंजीकृत करने का प्रावधान नहीं है ऐसे में आन्दोलनकारी जेन–जी पीढ़ी के मतदाता का नाम शामिल नहीं हो सकता जिसके कारण युवा मतदाता की सहभागिता सीमित हो जाएगी ।
विदेश में रहने वाले मतदाताओं के हक में सर्वोच्च अदालत ने मतदान करने की व्यवस्था करने का आदेश तो दिया है किन्तु इस दिशा में कुछ खास प्रगति दिखाई नहीं देती है । इस अवस्था में मतदाता अपने मत का उपयोग नहीं कर पाएँगे । इन सब के साथ ही बात चुनाव पर होने वाले खर्च की भी है । २०७९ साल में प्रतिनिधि सभा और प्रदेश सभा निर्वाचन में सुरक्षा निकाय के खर्च के अतिरिक्त करीब सवा पाँच अर्ब रूपया खर्च हुआ था । वर्तमान में देश की आर्थिक अवस्था अत्यन्त ही जर्जर है । इस परिस्थिति में सुरक्षा सहित निर्वाचन का कुल खर्च व्यवस्थापन करना आसान नहीं है । ऐसे कई मसले हैं जो आगामी चुनाव को लेकर संदेह उत्पन्न कर रहे हैं ।
सरकार की मानें तो सरकार के प्रवक्ता एवं सूचना प्रविधि तथा सञ्चार मन्त्री जगदीश खरेल ने यह दावा किया है कि चुनाव को अब कोई नहीं रोक सकता है । नेकपा एमाले को लक्षित करते हुए वो दावा करते हैं कि जो दल यह कह रहा था कि चुनाव में नहीं जाएगा वह भी अब पंजीकरण करा चुका है ऐसे में चुनाव टलने की तो कोई संभावना ही नहीं है । सुरक्षा का वातावरण भी बन चुका है और आठ लाख मतदाता नामावली भी रजिस्टर्ड हो चुके हैं इसलिए चुनावा अपने निर्धारित समय पर ही होगा ।
समय बहुत दूर नहीं है इसलिए जल्द ही तस्वीर का रुख भी साफ हो जाएगा । यह उम्मीद करें कि निर्वाचन के साथ एक नए नेपाल के निर्माण की दिशा भी तय हो ।

सम्पादक, हिमालिनी

