क्या प्रहरी के दमन, हिंसा और मनमानी से ही देश चलायेगें हमारे जिम्मेदार मंत्रीगण ? श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति , काठमांडू ,२२ जुलाई | यदि किसी भवन की बुनियाद कमजोर हो तो वह ज्यादा दिनों तक टिका नहीं रह सकता । इससे भवन निर्माण की लागत बढ़ती है, श्रम भी व्यर्थ जाता है और जगहँसाई अलग होती है । सत्ता कुछ ऐसी ही कोशश में निरंतर लगी हुई है । पिछले दो दिनों के तमाशे को देश ही नहीं विश्व पटल भी अवश्य देख रहा होगा । एक विवेकहीन और मदमत्त सत्ता का स्वभाव कुछ ऐसा ही दिख रहा है, मानो उसपर से बुद्धि का अंकुश ही हट गया हो । जहाँ थोड़ी भी सुबुद्धि नहीं होती वहाँ सिर्फ पशुत्व बच जाता है । राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उत्साहपूर्ण माहौल की चर्चा सुर्खियों के साथ हो रही है और हो भी क्यों नहीं, पहाड़ की उँचाइयों से नीचे की तलहटी स्पष्ट दिखाई नहीं देती, इसलिए जनता की चोट, उनका विद्रोह, उनका रक्त कुछ अस्पष्ट सा इन्हें दिखाई दिया होगा तभी तो देश में उत्साह अधिक नजर आया । किन्तु, आज तो यह खून पहाड़ पर भी बहा है, शायद आज उन्हें कुछ स्पष्ट दिख जाय ।
देश का एक छोर से दूसरा छोर रक्ताम्भ है, जनता विचलित है, उग्र है किन्तु गृहमंत्री वक्तव्य दे रहे हैं कि संघीयता के बिना भी देश चलेगा, संचारमंत्री कह रहे हैं कि मसौदा फाड़ने या जलाने से कुछ हासिल नहीं होगा । तो क्या प्रहरी के दमन, हिंसा और मनमानी से देश चलाने की इच्छा रखे हुए हैं हमारे जिम्मेदार मंत्रीगण ? ये किस देश की बात कर रहे हैं ? जिस देश की आधी से अधिक आबादी इनके विरोध में खड़ी है, जहाँ इनकी उपस्थिति सहन नहीं की जा रही है, जहाँ इन्हें इनके क्षेत्र से ही भगाया जा रहा है, क्या ये इनका देश नहीं है ? या ये जनता इनके नहीं हैं ? सोशल मीडिया दमन चक्र की कहानियों से रंगा हुआ है किन्तु राष्ट्रीय संचार माध्यम जनता के उत्साह की कहानियाँ सुना रहा है ।
सुझाव संकलन का तमाशा समाप्त हो चुका है । सुझाव संकलन के नाम पर एक गरीब और प्राकृतिक आपदा से जूझता देश करोड़ों के बारे न्यारे कर चुका है । आठ साल के निचोड़ के रूप में आया मसौदा जनता नकार चुकी है किन्तु यह न तो प्रधानमंत्री को नजर आ रहा है और न ही गृहमंत्री को और न ही सम्भावित प्रधानमंत्री जी को । करोड़ों की आबादी वाले देश में चंद हजार सुुझाव संकलन कर के सरकार ने अपनी दिखावटी जिम्मेदारी पूरी कर ली है । सरकार के तमाशे का अंत होना अभी बाकी हैं किन्तु देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से को अपने इस कारनामे की वजह से इन्होंने जिस राह पर धकेला है उसकी परिणति अकल्पनीय होगी । मधेश जग चुका है, वहाँ की मिट्टी पहले भी आन्दोलित होकर निर्दोषों के खून से रंगी जा चुकी है, आज फिर उसी पुनरावृत्ति की सम्भावना स्पष्ट नजर आ रही है । नेपाली समाज में मधेशी और अन्य अधिकार से वंचित समुदाय अपने अधिकार के लिए सशक्त रूप में आन्दोलित हो चुके हैं । किन्तु इन पस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए सत्ता, दमन के बल पर इनकी आवाज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं उनकी यही नीति राष्ट्र को विखण्डन की दिशा दिखला रहा है ।
किन्तु मधेशी दलों के नेता अपनी जिम्मेदारी की खानापूर्ति काठमान्डौ में रह कर कर रहे हैं । आज उनकी जरुरत मधेश की जनता के बीच थी किन्तु, अभी भी वो सत्ता के मोह से स्वयं को निकाल नहीं पा रहे हैं और सम्भवतः उनकी इसी कमजोरी का फायदा शासक वर्ग उठाना चाह रहे हैं ।

