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यार मधेश को मनाओ..नहींतो आडवाणी जी की तरह पीएम् इन वेटिंग ही रह जायेंगे : भावी प्र.म.

 
मुरली मनोहर तिवारी(सिपु)
मुरली मनोहर तिवारी(सिपु)

मुरली मनोहर तिवारी ( सिपु ),बीरगंज ,२६ जुलाई | ०७२ श्रावण ४ और ५ को मधेश में मिले जनसमर्थन से, नेताजी बहुत खुश हुए। कुछ दिनों से निराश और बुझे-बुझे से थे, अब उनके एक आंख में तेजी आ गई। पुराने मित्रो को फ़ोन लगाया, महफ़िल सज गई। हिमाल, पहाड़, मधेश के बड़े-बड़े नेता सरीक हुए। नेताजी ने जाम टकराया, शुभकामना-बधाइयों का दौर शुरू हुआ।

एक बड़े पहाड़ी नेता ने, दरियादिली दिखाते हुए – “यार मधेश को मानना पड़ेगा। लोग कहते है बहादुर हम है पर असली बहादुर तो मधेशी है”।

दूसरे नेता भी आ टपके -“तभी तो हम इन्हें मिला कर रखते है, और हमारी पार्टी मधेश में, ज्यादा सिट लाती है। २००७ साल का क्रांति हो, किसान आंदोलन हो, राजा महेंद्र से खिलाफत हो, गणतन्त्र का संघर्ष हो, या लोकतंत्र पुनर्बहाली ये हमेशा साथ देते है”।

पहले नेता ने कटाक्ष किया – “अरे ! आपके नेता ने ही मधेशी को कायर कहा था”।

दूसरे नेता – “तो आपका जनयुद्ध भी, मधेशी के बदौलत ही सफल हो पाया। वरना आपलोग तो हथियार डालने वाले थे”।

मामला गर्म होते देख कर, मेजबान ने बिषय बदला – “पर मधेश को पांच टुकड़ा में नहीं बाटना चाहिए”।

m4 पहले नेता चिकेन अटकते हुए बोले – “ये भी आपके ख़ुशी के लिए किए, अब मधेश में इतने पार्टी और अध्यक्ष है की जब मिलकर चुनाव नहीं लड़ सकते तो मधेश कैसे चलाएंगे। अब पांच मुख्यमंत्री होंगे। सब खुश”।

मेजबान नेता अपनी झेंप छुपाते हुए- “पर ब्यवस्थापिका और राष्ट्रीय सभा में मधेश का प्रतिनिधित्व कम तो किया गया है ना। अब कोई मधेशी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकता”।

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सारे क्रन्तिकारी नेता ग्लास ख़ाली करके बोले – “आपको राष्ट्रपति क्यों दे, आप तो समानुपातिक भी बेच देते है, समधिन को, प्रेमिका को, पत्नी को देते है।

मेजबान नेता को तैश आ गया – “आप लोग भी दूध के धुले नहीं है। यही पर हिंदी में बात करते है, हिंदी फिल्में देखते है, भारत जाते है तो हिंदी का भीतरी ज्ञान प्रदर्शित करते है, और पुरे नेपाल में नेपाली भाषा थोपते है”।

क्रन्तिकारी नेता – “बोलने को तो हम चाइनिज, रुसी भी बोलते है और पसंद बिदेशी मेंम को करते है पर उसे साथ रख तो नहीं सकते। यार हमलोग सियासतदान है, हमें बहुत कुछ परदे में ही रखना होता है, तभी तो हम राष्ट्रीय नेता है। आपलोग क्षेत्रीयता से बाहर ही नहीं आते”।

तभी प्रधानमंत्री के भावी उम्मीदवार नेता भी बोल पड़े- “आपको राष्ट्रिय नेता बनाने के लिए संसं२ चुनाव से पहले, हातिबंन रिसोट में मधेश कितने टुकड़ो में बटेगा, भेष, भूषा,भाषा इन सब बातो पर सहमती हुई थी। आज आप बखेड़ा कर रहे है। आपलोग किसी बात पर टिकते ही नहीं। तभी तो कहा था बिहार को भी मधेश में मिला लो”।

मेजबान सफाई देते हुए – “नहीं कामरेड हम लोग तो ठीक ही है, मधेश में अब और भी लोग है, जो बाते खोल देते है। अब हातिबंन रिसोर्ट में सहमती हुआ और पुरे मधेश में हल्ला कर दिया की, मोर्चा ने अपने मृत्युपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया। हमलोगो ने पूरा सहयोग किया, हमारे किसी सभासद ने किसी भी समिति में, कोई बिरोध तो नहीं किया। हमलोग तो समिति में उपस्थित भी नहीं हुए। आपको जो-जो करना था किया। अब मधेश में जाकर कुछ तो बहाना बनाना होगा ना”।

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भावी पी एम् -“बिरोध के कारण ही, संबिधान नहीं बन रहा है। मेरा पी एम् बननें में देरी हो रही है”।

पहले नेता फिर से ग्लास भरकर आए – “आप तो आडवाणी जी की तरह पीएम् इन वेटिंग ही रह जायेंगे। इतनी जल्दी संबिधान बन जायेगा तो चुनाव में जाना होगा अभी तो पुराने चुनाव का खर्च ही वापस नहीं आया है, फिर नया चुनाव खर्च कहा से आयेगा”।

क्रन्तिकारी नेता- “सही कहा आपने, पहले सभी राष्ट्रीय पार्टी बारी-बारी से सरकार बना लें, तब चुनाव की बात होगी”।

मेजबान – “जनता को क्या जबाब देंगे”।

पहले नेता – “जबाब क्या देना है, आप मधेश आंदोलन कीजिए, हम दमन करेंगे, कुछ दिन बिरोध, फिर घायल का इलाज, शहीद की घोषणा, फिर वार्ता-सहमति और बिजय जुलुस में निकल जायेगा”।

दूसरे नेता – “लेकिन इससे मधेश में हमलोग कमजोर हो जायेंगे। लोग हमें दुश्मन मान लेंगे”।

m8पहले नेता – “कुछ नहीं होगा, आंदोलन के बाद मधेशी दल को सरकार में शामिल कर लेगें, और स्थानिय चुनाव करवा देंगे। घर-घर में कांग्रेस, एमाले, माओवादी का झंडा लगेगा। एक ही घर में, भाई-भाई लड़ेंगे।  खेत का झगड़ा, सड़क का झगड़ा, जाती का झगड़ा होगा। सब आंदोलन के कड़वाहट को भूल जायेगे”।

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मेजबान – “ये तो ठीक है, पर नागरिकता के बिषय में, भारत में शादी करने पर अंगीकृत नागरिकता वाले बात पर बहुत आक्रोश है”।

क्रन्तिकारी नेता – “आपलोग शांत कीजिए। कह दीजिएगा मधेश का सब मांग पूरा हो गया। और बिदेश में शादी करने की जरुरत ही क्या है। भारत में शादी करते है, उससे भारतीय दबाव बढ़ता है”।

मेजबान एक ही घूंट में, ग्लास ख़ाली करके बोले – “अगर नेपाल में ही शादी करना है, और नेपाली भाषा ही बोलना है, तो कुछ ही दिन में, मधेशी ये भी सिख लेंगे। मधेशी मजदूर भी, काठमांडू पोखरा में ही ज्यादा काम करते है। अगर ये सब वही शादी करके रहने लगे तो क्या होगा। जिस मधेशी को आप, नौकर रखना पसंद नहीं करते, वही दामाद बन्ने लगे, तो क्या करेंगे। फिर न रहेगा पहाड़, न हिमाल, ना मधेश, तब हमलोग क्या करेंगे।
ऐसा लगा सबको साँप सूंघ गया हो। बिना कोई जबाब दिए अपना अपना ग्लास रखकर सब चलते बने। पीछे धीमे आवाज में गज़ल बजता रहा….
रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे, छोड़ जाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-खुशफहम् का है तुझ से उम्मीदें
ये आख़री शम्मे भी बुझाने के लिए आ।।

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