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महात्मा गांधी, असहमति की राजनीति और नेपाल – चन्द्रकिशोर


चन्द्रकिशोर, बीरगंज, 30 जनवरी। नेपाल में महात्मा गांधी के चर्चा से कतराने वाले एक बड़ा वर्ग है। कुछेक है जिन्हें उनके बारे में अधूरी जानकारी है। वाट्सएप से सूचित भी एक तप्का है जो गलत तथ्य लेकर बैठा है। इसी बीच विश्वनाथ ढुङ्गाना का ” गांधीको जीवनी र विचार ( ऐतिहासिक केही व्यक्तिहरूले संक्षिप्त परिचय सहित)’एक पुस्तक आया है और इस पुस्तक ने नेपाली पाठक को एक बार फिर से महात्मा गांधी से साक्षात्कार का अवसर देता है।तीस जनवरी उन्नाईस सय अडचालिस में गांधी का हत्या हुई लेकिन गांधी जी आज भी उतने ही आवश्यक है। नेपाल के सन्दर्भ में विश्वनाथ जी की तरह छोटे छोटे प्रयत्न की जरूरत है जिससे गांधी विमर्श एक फैलाव ले के। इसलिए उनकी कृति पठनीय है।

मै अब इस आलेख में नेपाल में महात्मा गांधी की आवश्यकता बोध पर विस्तार से चर्चा करना चाहता हूं।महात्मा गांधी मूलतः असहमति से संवाद करने की सभ्यता है ।
लोकतंत्र का सबसे कठिन इम्तहान यह नहीं होता कि वह अपने समर्थकों से कैसा व्यवहार करता है, बल्कि यह होता है कि वह अपने असहमतों के साथ कैसा बर्ताव करता है। इस कसौटी पर अगर किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को परखा जाए, तो महात्मा गांधी एक विलक्षण उदाहरण के रूप में सामने आते हैं। गांधी न केवल असहमति को सहन करते थे, बल्कि उसे लोकतांत्रिक जीवन का अनिवार्य पोषक मानते थे। उनके लिए असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि सत्य की खोज में सहयात्री थी।

आज जब असहमति को “राष्ट्रद्रोह”, , “एजेंडा” या “विदेशी साजिश” ” एनजिओ खेतीपाती ” “अस्थिरता फैलाने की कोशिश” कहकर खारिज कर देने की प्रवृत्ति तेज़ हो रही है, तब गांधी का असहमत पक्ष से व्यवहार केवल ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित राजनीतिक और नैतिक प्रश्न बन जाता है।असहमति गांधी के लिए बाधा नहीं, अवसर एक संवाद का अवसर था।गांधी के चिंतन में सत्य एक स्थिर वस्तु नहीं था, बल्कि निरंतर खोज की प्रक्रिया थी। और जहां खोज है, वहां मतभेद स्वाभाविक हैं।महात्मा गांधी के लिए असहमति कोई अवरोध नहीं थी। वे असहमति को सत्य की खोज की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि जहाँ सभी एक ही बात कह रहे हों, वहाँ सोच मर जाती है।नेपाल की राजनीति में इसके उलट प्रवृत्ति दिखती है।

गांधी मानते थे कि कोई भी व्यक्ति या समूह सत्य का पूर्ण स्वामी नहीं हो सकता। इसलिए जो असहमत है, वह भी सत्य के किसी अंश को अपने साथ लिए हो सकता है।

यही कारण है कि गांधी असहमति से डरते नहीं थे। वे कहते थे— “मैं अपने विचारों को बदलने से नहीं डरता, क्योंकि सत्य के प्रति मेरी निष्ठा किसी विचार से बड़ी है।”यह वाक्य असहमति के प्रति उनके पूरे दृष्टिकोण को समेट लेता है।आलोचकों से शत्रुता नहीं, संवाद का मंत्र था।गांधी के जीवन में आलोचकों की कोई कमी नहीं थी। ब्रिटिश सत्ता तो थी ही, लेकिन भारतीय कांग्रेस के भीतर भी बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. आंबेडकर, मोहम्मद अली जिन्ना—ये सभी किसी न किसी स्तर पर गांधी से असहमत थे।

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नेपाल आज जिस लोकतांत्रिक दौर से गुजर रहा है, उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ चुनाव हैं, संविधान है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी औपचारिक रूप से मौजूद है—लेकिन असहमति के प्रति धैर्य और सम्मान लगातार सिकुड़ता जा रहा है। सत्ता असहज है, आम जन उत्तेजक है, और नागरिक आवाज़ें अक्सर संदेह की दृष्टि से देखी जाती हैं। ऐसे समय में महात्मा गांधी का असहमत पक्ष से व्यवहार केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक तीखा समकालीन हस्तक्षेप बन जाता है।गांधी यह सिखाते हैं कि लोकतंत्र की आत्मा सहमति में नहीं, बल्कि असहमति को संभालने की क्षमता में बसती है।

विपक्ष भी सत्ता की हर बात को स्वतः गलत ठहराने की सुविधा में जीता है।बीच में नागरिक—पत्रकार, शिक्षक, छात्र, बुद्धिजीवी—अक्सर पिस जाते हैं।गांधी इस पूरे परिदृश्य में असुविधाजनक प्रश्न खड़े करते हैं—क्या राज्य आलोचना से डर सकता है?
क्या बहुमत को विवेक का प्रमाण मान लिया जाए?गांधी बहुमत को सत्य का अंतिम पैमाना नहीं मानते थे। वे स्पष्ट कहते थे—“एक अकेला व्यक्ति भी, यदि सत्य के साथ है, तो वह बहुमत से बड़ा है।”नेपाल के हालिया राजनीतिक अनुभव इस चेतावनी को पुष्ट करते हैं।संविधान संशोधन, नागरिकता विधेयक, संघीयता का क्रियान्वयन, या चुनावी प्रणाली—इन तमाम मुद्दों पर बहुमत के बल पर निर्णय लिए गए, लेकिन असहमति को गंभीरता से नहीं सुना गया।मधेशी, जनजाति, दलित, थारू इन पहचानों से उठने वाली असहमत आवाज़ों को अक्सर “समस्या” माना गया, समाधान नहीं।

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है?उन्होंने माना कि जो सबसे ज़्यादा पीड़ित है, उसकी असहमति सबसे पहले सुनी जानी चाहिए।मधेश आंदोलन, थारू संघर्ष, जनजातीय असंतोष—इन सभी को लंबे समय तक “अस्थिरता” या “राजनीतिक साजिश” के चश्मे से देखा गया। आज चुनाव के माहौल में जब मधेश केन्द्र बिन्दु में है तब यह बात उठना लाजिमी है।गांधी का दृष्टिकोण इसके ठीक उलट होता—वे कहते कि असहमति दरअसल राज्य के स्वास्थ्य की जाँच रिपोर्ट है।अगर असहमति तेज़ है, तो कहीं न कहीं अन्याय मौजूद है।

गांधी असहमति को उच्छृंखलता में बदलने के पक्षधर नहीं थे।उन्होंने सत्याग्रह के ज़रिए एक नैतिक असहमति का मॉडल दिया—विरोध होगा,लेकिन हिंसा नहीं,सत्ता को चुनौती होगीलेकिन घृणा नहीं ,नेपाल में विरोध आंदोलनों का इतिहास बताता है कि अक्सर राज्य और आंदोलनकारी—दोनों ही धैर्य खो देते हैं। जेन जी संघर्ष में हमने देखा किस तरह हिंसा, ध्वंश और घृणा का फैलाव हुआ। अभी तक का रवैया रहा है या तो सरकारी दमन होता है,या फिर जन विरोध उग्र होकर अपनी नैतिक बढ़त खो देता है।
गांधी याद दिलाते हैं कि असहमति की ताक़त उसकी नैतिकता में होती है, न कि उसके शोर में।

गांधी के लिए प्रेस संस्थापन सत्ता, व बर्चश्वशालीयों का भोंपू नहीं, बल्कि सार्वजनिक विवेक था।वे अपने अख़बारों में आलोचनात्मक पत्र भी छापते थे—यहाँ तक कि अपने विरुद्ध भी।नेपाल में आज मीडिया पर दबाव की शिकायतें आम हैं।कभी विज्ञापन रोकने का भय,कभी उकसाने का आरोप,तो कभी ट्रोल संस्कृति का हमला।गांधी का सवाल यहाँ सीधा है।क्या सत्ता इतनी कमजोर है कि एक सवाल से डगमगा जाए?

गांधी सिखाते हैं कि पार्टी के भीतर असहमति, लोकतंत्र की बीमारी नहीं—उसकी जीवन-रेखा है।नेपाल की पार्टी राजनीति में स्थिति उलट है।यहाँ असहमति का मतलब होता है
दल विभाजन,चरित्र हत्या,या संगठन से निष्कासन।गांधी अपने निर्णयों की समीक्षा करने से नहीं डरते थे।नेपाल की राजनीति में आत्मालोचना दुर्लभ है।
गांधी कहते हैं जो नेतृत्व अपनी गलती नहीं मान सकता, वह असहमति को भी नहीं सह सकता।

गांधी आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन इसलिए नहीं कि वे आरामदेह हैं ।बल्कि इसलिए कि वे सत्ता, विपक्ष और समाज तीनों को असहज करते हैं।वे सत्ता से कहते हैं —आलोचना सहो।वे विपक्ष से कहते हैं—नैतिक रहो।वे नागरिक से कहते हैं—हिंसा नहीं,

विवेक से बोलो।नेपाल का लोकतंत्र आज एक चौराहे पर खड़ा है।एक रास्ता है—असहमति को नियंत्रित करने का,दूसरा—असहमति से संवाद करने का।
महात्मा गांधी दूसरा रास्ता सुझाते हैं।वे याद दिलाते हैं किलोकतंत्र वह नहीं, जहाँ सब चुप हों ।लोकतंत्र वह है, जहाँ असहमत भी सुरक्षित हों।अगर नेपाल को केवल चुनावी लोकतंत्र से आगे बढ़करलोकतांत्रिक संस्कृति बनानी है,तो गांधी को किताबों से उतारकरराजनीतिक व्यवहार में लाना होगा।

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उन्होंने कभी आलोचकों को अपमानित नहीं किया, न ही उनके देशप्रेम या नीयत पर सवाल उठाया। वे व्यक्ति और विचार को अलग रखते थे। विचार से असहमति होती थी, व्यक्ति से नहीं।गांधी असहमति को अराजकता में बदलने के पक्षधर नहीं थे। उनके लिए असहमति का अधिकार नैतिक अनुशासन से जुड़ा था। सत्याग्रह इसी विचार का राजनीतिक रूप था।सत्याग्रह का मूल तत्व था—अन्याय का विरोध।
लेकिन अन्यायी से घृणा नहीं।संघर्ष, परंतु अपमान नहीं।दृढ़ता, परंतु हिंसा नहीं
यह असहमति का एक उच्चतम नैतिक मॉडल था, जिसमें विरोध भी था और संवाद की संभावना भी।बहुमत बनाम विवेक ।गांधी बहुमतवाद के आलोचक थे। वे जानते थे कि बहुमत हमेशा सत्य के पक्ष में नहीं होता। उन्होंने लिखा—
“एक अकेला व्यक्ति भी, यदि उसके पास सत्य है, तो वह बहुमत से बड़ा है।”
यह कथन आज के लोकतंत्र के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि आज बहुमत को ही वैधता का अंतिम प्रमाण मान लिया गया है। गांधी इसके उलट, अल्पमत की आवाज़ को सुनने का आग्रह करते हैं।

नेपाल सहित पूरे दक्षिण एशिया में लोकतंत्र संस्थागत तो है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर है। असहमति को सहने की परंपरा विकसित नहीं हो पाई है। सत्ता आलोचना से चिढ़ती है, विपक्ष जिम्मेदारी से बचता है, और समाज ध्रुवीकरण का शिकार होता है।गांधी यहां प्रासंगिक हो जाते हैं—एक ऐसे लोकतांत्रिक आचरण के रूप में, जहां असहमति से डर नहीं, संवाद होता है।महात्मा गांधी हमें सिखाते हैं कि असहमति कोई दीवार नहीं, पुल हो सकती है—यदि उसमें नैतिकता, विनम्रता और सत्य के प्रति ईमानदारी हो।वे यह भी सिखाते हैं कि सत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि वह कितनों को चुप करा सकती है, बल्कि यह कि वह कितनों को बोलने की जगह दे सकती है।आज अगर गांधी जीवित होते, तो शायद वे यही कहते—
“अगर तुम्हारे समाज में कोई असहमत नहीं, तो समझ लो सत्य ने विदा ले ली है।”महात्मा गांधी को कोटी कोटी प्रणाम!

चन्द्रकिशोर
( नेपाल के जाने-माने गांधीवादी चिंतक)

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