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30 वर्ष बाद प्रमुख कमांडर एवं नेकपा संयोजक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ रुकुम पूर्व पहुंचे

 

1 फागुन, रुकुम पूर्व।

वर्ष 2052 विक्रम संवत् के फागुन 1 गते नेपाल में राज्य के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध की शुरुआत हुई थी। ठीक 30 वर्ष बाद प्रमुख कमांडर एवं नेकपा संयोजक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ रुकुम पूर्व पहुंचे हैं।

10 वर्ष तक चले सशस्त्र संघर्ष की स्मृति में ‘जनयुद्ध दिवस’ मनाने के लिए नेकपा ने रुकुम पूर्व में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया है।

भूमे गांवपालिका–2 खाबांग बगर में आयोजित समारोह में 252 शहीद परिवारों को प्रचंड द्वारा सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम है। शहीद और लापता परिवारों, घायलों, अपांगों तथा स्थानीय लोगों से मुलाकात कर सशस्त्र क्रांति की घटनाओं को स्मरण करने की तैयारी की गई है।

रुकुम पूर्व संघीयता के बाद बना ‘सबसे छोटा जिला’ ही नहीं, बल्कि जनयुद्ध का उद्गम स्थल और राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। इसी जिले से प्रचंड 21 फागुन को होने वाले प्रतिनिधि सभा सदस्य चुनाव के उम्मीदवार हैं।

युद्ध से शांति प्रक्रिया तक

तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने 2052 फागुन 1 गते रुकुम के आठबीसकोट पुलिस चौकी, रोल्पा के होलरी पुलिस चौकी, सिन्धुलीगढ़ी पुलिस चौकी और गोरखा के च्यांगली स्थित कृषि विकास बैंक पर हमला कर सशस्त्र युद्ध शुरू किया था। उसी सशस्त्र संघर्ष को माओवादी ‘जनयुद्ध’ कहते हैं।

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रुकुम (पूर्व और पश्चिम) तथा रोल्पा को आधार क्षेत्र बनाते हुए माओवादियों ने चरणबद्ध तरीके से पुलिस चौकियों पर हमले किए।

2053 वैशाख 23 को रुकुम पूर्व के उपल्लो सेरा स्थित छेरावांग में पहली बार एंबुश में एक पुलिसकर्मी की मौत हुई थी। 2054 माघ 16 को क्युवांग में एंबुश हमला कर माओवादियों ने पहली बार ‘थ्री-नट-थ्री राइफल’ कब्जे में ली थी।

2056 असोज 5 को महत पुलिस चौकी पर हमला कर तत्कालीन डीएसपी ठूले राई सहित पुलिसकर्मियों को नियंत्रण में लेने की घटना भी रुकुम के इतिहास से जुड़ी है। 2057 चैत में रुकुमकोट चौकी पर हमले में 32 पुलिसकर्मी और 8 छापामार सहित 40 लोगों की जान गई थी।

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विभाजन की दहलीज और राजनीतिक यू-टर्न

रुकुम पूर्व केवल सशस्त्र गतिविधियों की स्मृति वाला स्थान ही नहीं, बल्कि पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णयों का भी साक्षी रहा है। 2061 माघ में लावांग में आयोजित माओवादी पोलितब्यूरो बैठक ने डॉ. बाबुराम भट्टराई पर कार्रवाई का निर्णय लिया, जिससे पार्टी के भीतर बड़ी हलचल मच गई थी।

इस बार प्रचंड लावांग पहुंचकर उस ऐतिहासिक स्थल का भी दौरा करेंगे।

महतगांव और लावांग में जनभेटघाट के बाद उनका कार्यक्रम चुनवांग जाने का है।

2062 असोज में चुनवांग में हुई केंद्रीय समिति बैठक ने ‘लोकतांत्रिक गणतंत्र’ की कार्यदिशा पारित करते हुए सशस्त्र संघर्ष से शांतिपूर्ण राजनीतिक यात्रा की ओर मोड़ लिया था।

बंदूक से बैलेट की ओर उस निर्णय ने सात दलों के साथ 12 बिंदु समझौते की आधारशिला रखी। उसी के आधार पर दूसरा जनआंदोलन और ‘जनयुद्ध’ का समन्वय हुआ, जिसके परिणामस्वरूप राजतंत्र का अंत, गणतंत्र, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता और समानुपातिक प्रणाली की स्थापना हुई—ऐसा माओवादी नेता बताते हैं।

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चुनवांग बैठक की पृष्ठभूमि में माओवादी व्यापक शांति समझौते में शामिल हुए। 2063 मंसिर 5 गते सरकार के साथ समझौता कर माओवादियों ने हथियार डाल दिए।

युद्ध के नारों से विकास की अपेक्षाओं तक

कभी माओवादी का ‘लाल किला’ कहे जाने वाले रुकुम के पहाड़ों में अब युद्ध के नारों से अधिक विकास की अपेक्षाएं सुनाई देती हैं। जनयुद्ध का केंद्र रहा यह जिला अब शांति, रोजगार, बुनियादी ढांचे और सेवा विस्तार की मांग कर रहा है।

जनयुद्ध और जनआंदोलन की नींव पर स्थापित उपलब्धियां कितनी संस्थागत हुईं और कितनी अधूरी हैं—इस बहस के बीच प्रचंड का यह रुकुम पूर्व दौरा एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कल के छापामार और आज के जनप्रतिनिधियों के बीच खड़े होकर दिया जाने वाला उनका संदेश नेकपा की आगामी दिशा का संकेत भी माना जा रहा है।

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