नेपाल में हिंदी भाषा के विकास में महामना राजेश्वर नेपाली का योगदान : राघवेंद्र साह
राघवेंद्र साह, जनकपुरधाम, २६ फाल्गुन ०८२ । फाल्गुन 26 का दिन नेपाल तथा हिंदी भाषी समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन हिंदी प्रेमी, साहित्यकार तथा बुद्धिजीवी हिंदी दिवस के रूप में भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति अपना सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करते हैं। हिंदी केवल एक भाषा मात्र नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक पहचान भी है। नेपाल के तराई–मधेश क्षेत्रों में हिंदी भाषा लंबे समय से सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। इस भाषा के संरक्षण, विकास और संवर्धन में अनेक साहित्यकारों, पत्रकारों तथा समाजसेवियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार तथा हिंदीसेवी महामना राजेश्वर नेपाली का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है।
महामना राजेश्वर नेपाली द्वारा स्थापित जनकपुर बौद्धिक समाज ने नेपाल में हिंदी भाषा के विकास के लिए ऐतिहासिक पहल की थी। इसी संस्था के आयोजन में वि.सं. 2052 साल फाल्गुन 26 और 27 गते जनकपुरधाम स्थित जगत जननी जानकी मंदिर के प्रांगण में प्रथम नेपाल राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन महिला तथा समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लीला कोइराला द्वारा किया गया था। इस सम्मेलन में नेपाल में हिंदी भाषा को दूसरी राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई थी। इस प्रकार यह सम्मेलन नेपाल में हिंदी भाषा के सम्मान और अधिकार के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शुरुआत सिद्ध हुआ।
प्रथम सम्मेलन की सफलता के बाद यह अभियान निरंतर आगे बढ़ता गया। वीरगंज, भैरहवा, नेपालगंज, विराटनगर सहित विभिन्न शहरों में क्रमशः द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा अन्य राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों का आयोजन किया गया। अब तक कुल 19 राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन संपन्न हो चुके हैं। इन सम्मेलनों ने हिंदी भाषी साहित्यकारों, कवियों और लेखकों की कृतियों के प्रकाशन, सम्मान तथा प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही नेपाल में हिंदी भाषा के संरक्षण और विकास के लिए नेपाल हिंदी प्रतिष्ठान के प्रभावी संचालन की मांग भी लगातार उठती रही है।
नेपाल में हिंदी भाषा का इतिहास अत्यंत पुराना और गौरवशाली रहा है। हिंदी के आदिकवि माने जाने वाले कुक्कुरीपाक का जन्म सन 840 ईस्वी में नेपाल के तौलिहवा में हुआ माना जाता है। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से हिंदी भाषा के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसी प्रकार लगभग साढ़े पाँच सौ वर्ष पहले दांग के राजा रत्नसेन ने रामायण सहित अनेक हिंदी ग्रंथों की रचना की थी। उनके द्वारा रचित “दंगी रामायण” हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
इस साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य जनकपुर स्थित जानकी मंदिर के आद्य महंत सूर किशोर दास ने लगभग तीन सौ वर्ष पहले “मिथिलाविलास” नामक ग्रंथ की रचना करके किया। इस कृति में मिथिला के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का सुंदर चित्रण मिलता है। इसके बाद भी अनेक साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य के विकास में योगदान दिया। जनकराज किशोरी शरण रसिक अली, पंडित रमाकांत झा, गोकुल गिरी, पंडित अवध किशोर दास, पंडित उर्मिलाकांत शरण, श्यामलाल मिश्र, रामस्वरूप प्रसाद बी.ए. तथा डॉ. शिवशंकर यादव जैसे विद्वानों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाते हुए इसकी परंपरा को आगे बढ़ाया। इसे नेपाल में हिंदी साहित्य का स्वर्णिम इतिहास कहा जा सकता है।
नेपाल में हिंदी भाषा की स्थिति और भविष्य के विषय में गहन अध्ययन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार राजेश्वर नेपाली का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल लेखक या पत्रकार ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के समर्पित कार्यकर्ता थे । उनका व्यक्तित्व कर्मठता, जागरूकता, संवेदनशीलता और क्रांतिकारी सोच से परिपूर्ण है। समाज, संस्कृति, राजनीति और भाषा के क्षेत्र में उनका गहरा चिंतन और अध्ययन का विषय वना रहेगा ।
राजेश्वर नेपाली ने हिंदी भाषा के अस्तित्व की रक्षा, उसके उत्थान तथा प्रचार-प्रसार के लिए जीवनभर सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने केवल भाषण और नारों तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यावहारिक और रचनात्मक कार्य भी किए। इसी उद्देश्य से उन्होंने हिंदी भाषा में “लोकमत” नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। उस समय हिंदी में समाचार पत्र निकालना अत्यंत कठिन कार्य था। विभिन्न प्रशासनिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने अभियान को निरंतर आगे बढ़ाया।
हिंदी भाषा की स्थिति और उसके महत्व के बारे में समाज को जागरूक करने के लिए उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना भी की है। साथ ही हिंदी कविताओं के संकलन प्रकाशित करके अनेक नए और प्रतिभाशाली लेखकों को हिंदी में लेखन के लिए प्रेरित किया। वे केवल लेखक और संपादक ही नहीं, बल्कि हिंदी साहित्यकारों के संरक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं। वे देशभर के हिंदी लेखकों और कवियों से स्वयं मिलकर उन्हें प्रोत्साहित करने का कार्य भी करते रहे ।
राजेश्वर नेपाली की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह रहा कि उन्होंने हिंदी साहित्यकारों के सम्मान और प्रोत्साहन के लिए नियमित रूप से राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों का आयोजन किया। इन सम्मेलनों में जीवित लेखकों और साहित्यकारों को सम्मानित करने के साथ-साथ दिवंगत विद्वानों को मरणोपरांत सम्मान देने की परंपरा भी शुरू की गई। उनका मानना है कि किसी भी लेखक, कवि या विद्वान का योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, इसलिए सभी के योगदान का सम्मान होना चाहिए।
रुपन्देही जिले में जन्मे प्रसिद्ध हिंदी इतिहासकार तथा 2007 साल के प्रजातंत्र सेनानी स्वर्गीय काशी प्रसाद श्रीवास्तव तथा प्रख्यात हिंदी विद्वान डॉ. कृष्णचंद्र मिश्र को विशेष रूप से सम्मानित करना भी राजेश्वर नेपाली का प्रशंसनीय कार्य रहा है।
मधेशी समाज में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम, आत्मसम्मान और जागरूकता जगाने के लिए उन्होंने जो उत्साह, परिश्रम और समर्पण दिखाया है, वह वास्तव में अनुकरणीय है। उनके प्रयासों ने हिंदी भाषा को केवल साहित्यिक क्षेत्र तक सीमित न रखकर सामाजिक सम्मान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आज के समय में जब भाषाई विविधता और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, ऐसे समय में हिंदी भाषा के संरक्षण और विकास के लिए ऐसे व्यक्तित्वों का योगदान और भी अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है। हिंदी दिवस हमें यही संदेश देता है कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति, इतिहास और पहचान का आधार भी है।
नेपाल में हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा और राजेश्वर नेपाली जैसे समर्पित व्यक्तित्वों के अथक प्रयासों के कारण हिंदी भाषा आज भी सम्मान के साथ जीवित है। यह इतिहास आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।



