Tue. Nov 3rd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

पानी का रंग : विनोदकुमार विमल

 

विनोदकुमार विमल, अप्रैल 12, काठमांडू । ‘गांव के बीचोंबीच स्थित शंकर भगवान और भगवती मंदिरों के परिसर  में लगे ट्यूबवेल पर पानी भरने के लिए हमेशा भीड़ लगी रहती थी । दलित परिवार की 13 वर्षीय बेटी नैना कुमारी हमेशा दूर स्थित ट्यूबवेल  से पानी भरती थी । कभी उसकी माँ  तो कभी उसकी भाभी पानी लाने जाती थीं ।  जिस ट्यूबवेल से वह, उसकी माँ  और उसकी भाभी पानी लाती थीं, वह सूख गया । उच्च जाति के लोग दलितों को मंदिर परिसर में स्थित ट्यूबवेल  को छूने नहीं देते थे । उच्च जाति की महिलाएं और पुरुष पानी के बर्तन भरकर दलित समुदाय को देते थे । और वह भी तब जब उच्च जाति के लोग उसे भर चुके होते थे । नैना कुमारी उस गाँव में वर्षों से चली आ रही इस परंपरा से भलीभांति परिचित थीं । मजबूर होकर एक सुबह वह मंदिर परिसर में स्थित ट्यूबवेल  से पानी भरने गईं ।

यह भी पढें   सरकार संविधान और कानून की अनदेखी कर सत्ता का दुरुपयोग कर रहा है : प्रदीप पौडेल

गांव के महतो की पत्नी और उच्च जाति की अन्य महिलाएं ट्यूबवेल में पानी भर रही थीं । नैना कुमारी ने भी अपनी दो बड़ी बाल्टियां पास ही रखी हुई थीं । “ नैना !  तुमने क्या किया ?  तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था । तुम दूर के ट्यूबवेल से पानी लाती हो । फिर यहाँ क्यों आई हो ? तुम दलितों को ट्यूबवेल को नहीं छूना चाहिए । और हम तुम्हारे छुए हुए पानी को नहीं पीते । क्या तुम्हें पता नहीं ? थोड़ा दूर रहो ।  बाल्टियाँ भी दूर रखो । हम तुम्हारी बाल्टी को भी नहीं छू सकते ।“ महतो  की पत्नी ने कहा l

उसकी बातें सुनकर नैना कुमारी  की आँखों में आँसू भर आए । काफी देर बाद जब नैना कुमारी   वापस नहीं लौटी, तो उसकी भाभी भी वहाँ पहुँची । दोनों ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप बाल्टियाँ लेकर घर लौट गईं ।

यह भी पढें   नेपाल फुल कोर्ट : सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों और बिचौलिये इनम सापकोटा की मुलाकात का मामला गरमाया, जांच समिति बनाने की मांग

अगले दिन, महाशिवरात्रि के अवसर पर  गाँव में एक बड़ा मेला लगा था । महतो  की पत्नी की चार बाल्टियाँ और अन्य महिलाओं की लगभग दस बाल्टियाँ भी ट्यूबवेल के आसपास रखी थीं । नैना  कुमारी  ने 65 वर्षीय ग्रामीण असर्फी महतो को देखा, जो ट्यूबवेल से पानी पीने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उस तक पहुँच नहीं पा रहे थे । नैना कुमारी, जो असर्फी को ” दादाजी ” कहकर पुकारती थी, ने चारों ओर देखा और हिम्मत जुटाकर ट्यूबवेल से एक छोटी बाल्टी में पानी भरकर असर्फी को पीने के लिए दिया ।

उसी क्षण, महतो की पत्नी और अन्य महिलाओं ने देखा कि वह बूढ़ा व्यक्ति गांव का असर्फी  चाचा था, जो नैना कुमारी  के मानवीय व्यवहार की प्रशंसा कर रहा था । असर्फी ने महतो की पत्नी और अन्य महिलाओं से कहा, “ देखो ! नैना कुमारी दलित लड़की होते हुए भी  कितनी दयालु और नेक है वो, जिसने मुझे पानी पिलाया । जब मैं प्यासा था, तब यहाँ कोई नहीं था । अगर नैना कुमारी  न होती, तो मैं पानी के लिए रोते – रोते मर जाता ।”

यह भी पढें   राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी द्वारा आयोजित किया गया शुभकामना आदान-प्रदान कार्यक्रम

महतो की पत्नी और उसके साथ आई महिलाएं शर्म से लाल हो गईं । वे समझ गईं कि पानी तो एक समान होता है, उसका कोई रंग  नहीं होता, लेकिन लोगों के दिलों में मौजूद भेदभाव ही उन्हें छोटी – बड़ी जातियों में बांट देता है । उस दिन के बाद से नैना कुमारी  को उस ट्यूबवेल से पानी भरने से किसी ने नहीं रोका । और वह ट्यूबवेल दलित समुदाय के उपयोग के लिए खोल दिया गया, जिसमें लगभग 20 घर हैं ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com