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पानी का रंग : विनोदकुमार विमल

 

विनोदकुमार विमल, अप्रैल 12, काठमांडू । ‘गांव के बीचोंबीच स्थित शंकर भगवान और भगवती मंदिरों के परिसर  में लगे ट्यूबवेल पर पानी भरने के लिए हमेशा भीड़ लगी रहती थी । दलित परिवार की 13 वर्षीय बेटी नैना कुमारी हमेशा दूर स्थित ट्यूबवेल  से पानी भरती थी । कभी उसकी माँ  तो कभी उसकी भाभी पानी लाने जाती थीं ।  जिस ट्यूबवेल से वह, उसकी माँ  और उसकी भाभी पानी लाती थीं, वह सूख गया । उच्च जाति के लोग दलितों को मंदिर परिसर में स्थित ट्यूबवेल  को छूने नहीं देते थे । उच्च जाति की महिलाएं और पुरुष पानी के बर्तन भरकर दलित समुदाय को देते थे । और वह भी तब जब उच्च जाति के लोग उसे भर चुके होते थे । नैना कुमारी उस गाँव में वर्षों से चली आ रही इस परंपरा से भलीभांति परिचित थीं । मजबूर होकर एक सुबह वह मंदिर परिसर में स्थित ट्यूबवेल  से पानी भरने गईं ।

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गांव के महतो की पत्नी और उच्च जाति की अन्य महिलाएं ट्यूबवेल में पानी भर रही थीं । नैना कुमारी ने भी अपनी दो बड़ी बाल्टियां पास ही रखी हुई थीं । “ नैना !  तुमने क्या किया ?  तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था । तुम दूर के ट्यूबवेल से पानी लाती हो । फिर यहाँ क्यों आई हो ? तुम दलितों को ट्यूबवेल को नहीं छूना चाहिए । और हम तुम्हारे छुए हुए पानी को नहीं पीते । क्या तुम्हें पता नहीं ? थोड़ा दूर रहो ।  बाल्टियाँ भी दूर रखो । हम तुम्हारी बाल्टी को भी नहीं छू सकते ।“ महतो  की पत्नी ने कहा l

उसकी बातें सुनकर नैना कुमारी  की आँखों में आँसू भर आए । काफी देर बाद जब नैना कुमारी   वापस नहीं लौटी, तो उसकी भाभी भी वहाँ पहुँची । दोनों ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप बाल्टियाँ लेकर घर लौट गईं ।

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अगले दिन, महाशिवरात्रि के अवसर पर  गाँव में एक बड़ा मेला लगा था । महतो  की पत्नी की चार बाल्टियाँ और अन्य महिलाओं की लगभग दस बाल्टियाँ भी ट्यूबवेल के आसपास रखी थीं । नैना  कुमारी  ने 65 वर्षीय ग्रामीण असर्फी महतो को देखा, जो ट्यूबवेल से पानी पीने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उस तक पहुँच नहीं पा रहे थे । नैना कुमारी, जो असर्फी को ” दादाजी ” कहकर पुकारती थी, ने चारों ओर देखा और हिम्मत जुटाकर ट्यूबवेल से एक छोटी बाल्टी में पानी भरकर असर्फी को पीने के लिए दिया ।

उसी क्षण, महतो की पत्नी और अन्य महिलाओं ने देखा कि वह बूढ़ा व्यक्ति गांव का असर्फी  चाचा था, जो नैना कुमारी  के मानवीय व्यवहार की प्रशंसा कर रहा था । असर्फी ने महतो की पत्नी और अन्य महिलाओं से कहा, “ देखो ! नैना कुमारी दलित लड़की होते हुए भी  कितनी दयालु और नेक है वो, जिसने मुझे पानी पिलाया । जब मैं प्यासा था, तब यहाँ कोई नहीं था । अगर नैना कुमारी  न होती, तो मैं पानी के लिए रोते – रोते मर जाता ।”

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महतो की पत्नी और उसके साथ आई महिलाएं शर्म से लाल हो गईं । वे समझ गईं कि पानी तो एक समान होता है, उसका कोई रंग  नहीं होता, लेकिन लोगों के दिलों में मौजूद भेदभाव ही उन्हें छोटी – बड़ी जातियों में बांट देता है । उस दिन के बाद से नैना कुमारी  को उस ट्यूबवेल से पानी भरने से किसी ने नहीं रोका । और वह ट्यूबवेल दलित समुदाय के उपयोग के लिए खोल दिया गया, जिसमें लगभग 20 घर हैं ।

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