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फिर एक बार मधेशियों का मूल्यांकन

 

मनोज कुमार कर्ण:madhesiबकि २०÷२१ जुलाई को नेपाली हुकुमत ने १७ अगस्त तक जारी की जानेवाली नेपाल के संविधान २०१५ के वास्ते दो दिन आम जनता से रायसुुझाव प्राप्ति के लिए अपील की और छुट्टियाँ भी दी, हम इस वक्त मधेशवादी दल व नेताआेंको चौबीस कैरेट सोना ‘मधेशवाद’ की कसौटी में परखना चाहते हैं । क्योंकि यह समय शुरुआत का न होकर मधेशी अवाम् को अपने हक हित के लिए सड़क और सदन पर आन्दोलन करके नेपाल के पहाड़ी हुकुमत को अपनी बात सुनाने का है । परन्तु चूँकि हम उन मधेशियो ंकी बात कर रहे हैं जो इक्कीसवीं सदी में भी मीडिया से कोई लगाव नहीं रखना चाहता है और रोजमर्रा से बचे हुए थोर–बहुत पैसे पान, पराग और लोकल दारु में उड़ा लेते हैं, सो हमें अपनी जमीर हकीकत से आरम्भ करना पड़ रहा है । यूँ कहिए की अपने अधिकार के लिए सोए हुए या फिर ‘मुर्दों’ को जगाना पड़ रहा है । आज वह मीडिया की ताकत है जिसके तहत टाइम्स अफ् इन्डिया का पूर्व सम्पादक तथा काँग्रेस आई के सांसद शशी थरुर अक्सोफर्ड यूनिवर्सिटी के टॉक प्रोग्राम में अंग्रेजो ंका भारत के प्रति का विगत का इतिहास याद कराया और भारत जैसे देश के लिए कम्पेन्सेसन कोई बड़ी बात नहीं है पर आत्मसम्मान के लिए थोड़ा सा भी प्रति कात्मकरुप में क्यों न सही पर अपनी कोहिनूर हीरे लौटाने के साथ कम्पेन्सेसन दिया जाय कहा । प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी समेत ने थरुर को अन्तरआत्मा से धन्यवाद कहा । मधेशी अवाम् को यह जानना बहुत जरुरी है कि आज विश्व में किसी राष्ट्र के पास बहुत मिसाईल या टैंक है और फिर किसी के पास बहुत डॉलर है विश्व बैंक में तो भी वह उतना पावरफुल नहीं है और इज्जतदार नहीं है जितना किसी और देश में मीडिया शक्तिशाली है । हाल ही में अरब के बहुत देशों में डॉलर और टैंक होने के बावजूद भी मीडिया के दम पर लोकशाही के लिए अवाम् ने बड़े–बड़े का छक्का छुड़ा दिया और शासन सत्ता को गिरा दिया है । मधेशी अवाम् को यह असलियत मैं बताना चाहता हूँ कि वे संचारमाध्यम से मतलब रखें और अपना न सही तो फिर अपनें भविष्यकी पीढि़यों के लिए आलस तथा स्वार्थीपन को त्यागकर वे मिलकर अपनी बात नेपाल के पहाड़ी हुकुमत को सुनावें ।
अमेरीका में सन् १९५५ में एक अश्वेत् या हब्सी महिला (रोजा पाक्र्स)ने किसी श्वेत् या गोरा आदमी के लिए सार्वजनिक बस की सीट नहीं छोड़ी और उनकी इसी हिम्मत ने हार्लेम रेनेसॉ अर्थात् अश्वेत् के अन्दर मानवता और अपने हक के लिए बहुत बड़ा पुनर्जागरण किया औैर देश के बाँकी हिस्सों के अश्वेत् के आन्दोलन को बुलन्दी के उँचाई पर पहँुचाया । यह वही समय के इर्दगिर्द था जब केवल सत्ताईस वर्ष का अनुभवहीन पर उत्साहयुक्त नौजवान मार्टिन लुथर किंग जुनियर (एक अश्वेत् या काला), जो डेक्सटर एभेन्यू बैप्टिस्ट चर्च के नए इञ्चार्ज थे, महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आन्दोलन, कड़ा अनुशासन तथा विश्वास अपनें में होना जैसे गुण के भक्त थे, उन्होंने अश्वेत् के आन्दोलन को नया रूप दिया और मन्ट्गोमेरी बस कम्पनी को सेग्रिगेसन वाला सरकारी बस को डेढ साल से ज्यादा दिनतक बाइकट किया यह कह कर कि यह बस दफ्तर के समय जैसे अश्वेत् को ले जाता है, वह जानवर से भी बदतर है । सन् १९६३ के अगस्त माह में फिर एक ऐसा समय आया जब करीब पचीस हजार गोरा और काला लोग वासिंगटन शहर में सबों के लिए न्याय ९व्गकतष्अभ ायच ब्िि० का मांग सरकार के तरफ से जारी हो कह के किंग के अगुवाई में मांग किया । यह वही क्षण था जब उन्होंने ‘मेरा एक सपना है’ विश्वप्रसिद्ध भाषण किया जो सभी को भाया । उनके अनुशासन की वह पराकाष्ठा ही थी जिससे तत्कालीन अमेरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी जो पहले अश्वेत् के विपक्ष में थे, वो भी पक्ष में आ गए और सन् १९६४, १९६५, १९६८ में नागरिक हक ऐन पारित करने में संसद में मदद किया और अश्वेत् के सुरक्षा के लिए कैम्पसों में फेडरल टु«प्स अर्थात् संघीय सुरक्षा बल को भेजा  । हालांकि मार्टिन लुथर का सन् १९६८ में ही मेम्फीस शहर में आततातियों के द्वारा हत्या किया गया पर उससे और भी आन्दोलन में ऐसे जान आ गई जैैसे जंगल में सूखे पत्तो ंमें कोई आग लगा दे ! इस तरह काला जात की विजय हुई और मानवता के कुछ दुश्मनो ंका अमेरीका में खात्मा हुआ । हालांकि आज भी अमेरीका में अश्वेतों के विरुद्ध सूक्ष्म फरक व्यवहार गोरा शासकों से किया जाता है पर आज अमेरीका के बहुत युनिवर्सिटी में अश्वेत् सम्बन्धी पीएचडी तक की पढ़ाई की व्यवस्था भी की गयी है । नेपाल के मधेशी नेता और जनता ‘मधेशवाद’ भी संभव है ? इसी प्रश्न में उलझे हुए हैं । यह मधेशी अवाम् के साथ सोची समझी प्लान के मुताबिक ठगी है । सबसे पहले मधेशवादी दल और नेता नेपाल में एक वृहत सोचवाली साझा टेलिविजन या अखबार की स्थापना करें जो उन्हीं के काला कर्तूत और ठगी कार्यों को जनमानस में पोल खोल दे तो भी पत्रकार और पत्रिका या मीडिया के प्रति द्वेषभाव न देखावें । यह हिम्मत है तो ही मधेश में नेता लोग अपना राजनैतिक खेतीपाती करें अर्थात् निःस्वार्थ भाव से पहले कॉमन मीडिया की धारणा पर आयें और लगानी का वातावरण बनावें ।
जो संविधान नेपाल में बनने जा रहा है, उसमें मधेशी के मांग अनुसार न एक मधेश प्रदेश दिया जा रहा है, न दो । हाँ, दो शब्दों में दिया जा सकता है पर पूरब के झापा, मोरंग, सुनसरी और पश्चिम के कंचनपुर और कैलाली पांच जिले को काटकर और एमाओवादी सुप्रिमो का बस चले तो भविष्य में एमाले के साथ पार्टी विलयकर एमाले के जैसे मधेशविरोधी चितवन भी उसमें से बीच में से हटा दें ! आज मधेशी को यह जानना जरुरी हो गया है कि पहाड़ी बहुल पार्टियां कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी और मधेशी को उल्लू बनाने वाला डुप्लिकेट म्यान विजय गच्छदार का फोरम लोकतान्त्रिक नें संघीयता ही नहीं अपितु गणतन्त्र को ही नेपाल से इराडिकेट करना चाहता है । प्रचण्ड को अब कोई इलेक्शन नहीं जीतने के भय से पार्टी मर्ज करके कल माओवादी लड़ाके का पैसा का घोटाला और युद्ध अपराध से बचने के लिए जल्द ही कोइ पदपर आसीन होना है तो वहीं विजय गच्छदार हमेशा से मधेशी मुद्दो ंको बेचकर केवल सत्ता पर टिके रहना चाहा है । सुनने में आ रहा है कि मधेशी के मांग पे गद्दारी के लिए उन्हें उपराष्ट्रपति पदसे ‘सम्मानित’ किया जाएगा । हाय तौबा !
इधर मधेशवादी पार्टियां विगत में तीन से आज तेरह में बदल गये हैं । उनपर से मधेशी अवाम ्का विश्वास उठ गया है क्योंकि वे जब सत्ता में थे तब नेपाल में किसी मधेशी को राजनैतिक नियुक्ति जैसे युनिवर्सिटी, कूटनीतिक नियोग, संचारक्षेत्र कही ंपर भी नहीं किया और जिसको किया वे या तो उनका रिश्तेदार था या फिर जात, गोत्र, मोलाहिजा, रिश्वत्के तहत हुवा था । इस कन्फ्यूजन में मधेशी अवाम् सप्तरी के विश्वविख्यात युवा डॉ सीके राउत की मांग का समर्थन करते हैं जो मधेशी की मांग इस नेपाल से अलग होकर ही संभव है मे विश्वास करते हैं और वे जयकृष्ण गोइत के जैसे पृथकतावादी मांग को लेकर राजनीति में होने के बावजूद गोइत से विपरीत अहिंसात्मक आन्दोलन गान्धी, बुद्ध और नेल्सन मन्डेला के सिद्धान्त पर मार्टिन लुथर किंग के जैसे संभावनावाले हैं । आज नेपालके सरकारी कार्यालय में दर्ता हुए पार्टी के नेता उनकी जान लेने की धमकी देता है और सरकार जानबूझ कर चुप है

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