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लाशों की ढेर पर खड़ा संविधान किसके लिए ? श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १ सेप्टेम्बर |

photo-1मधेश का आन्दोलन बिना कारण और हिंसात्मक है (सत्ता की नजर में) इसलिए सरकार का ध्यान उधर नहीं है, बस वो किसी भी हाल में उसे दबाना चाह रही है, क्योंकि देश की सुरक्षा का सवाल है (सरकार के अनुसार) । आज सिर्फ आठ की मौत हुई है पुलिस की गोली से, पर क्या हुआ यह तो सरकार का धर्म है । वो चाहे तो मारे वो चाहे तो जिन्दा रखे । क्योंकि आज तो यही लग रहा है कि जनता और भेड़ बकरियों में कोई अन्तर ही नहीं रह गया है । क्या सरकार की आत्मा मर चुकी है या उनके अन्दर मानवता या नैतिकता के लिए कोई स्थान ही नहीं रह गया है । क्या उनकी रुह नहीं काँपती इस नृशंस हत्या के दृश्य को देखकर ? किस मुँह से वो फिर उसी जनता के समक्ष जाएँगे जिन्होंने उन्हें सत्ता सुख प्रदान किया था । टीकापुर, बीरगंज, जनकपुर, नेपालगंज क्या ये इस देश का हिस्सा नहीं है या यहाँ की जनता इंसान नहीं है ? मौत के इस तांडव को रोकने के लिए क्यों नहीं आवाज उठ रही है ? कहाँ हैं मानव अधिकारवादी ? हिंसा की राह पर देश को धकेलने वाली सरकार की नजर तो अहिंसात्मक आन्दोलन पर भी नहीं जा रही है । डा. केसी अनशन में हैं, जाहिर है कि वो अहिंसात्मक आन्दोलन की राह पर हैं किन्तु सरकार वहाँ भी उदासीन है, अब यहाँ किस लिए उनकी उदासीनता है ये तो वही जानें ।

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bir-3अब सवाल यह है कि सरकार को कौन सी भाषा समझ में आती है ? आखिर सरकार तक कौन सी भाषा में जनता अपनी बात पहुँचाए ? दो दिन पहले दलित महिलाओं का समूह प्रधानमंत्री के बुलावे पर उत्साहित होकर उनके पास पहुँचा किन्तु वहाँ किसी भरोसे या विश्वास की बात न होकर उनसे कहा गया कि आन्दोलन वापस ले लो । न तो विज्ञप्ति की भाषा, न तो पत्र की भाषा, न संवाद की भाषा, न आन्दोलन की भाषा और न ही अनशन की भाषा, कोई भी माध्यम उन तक पहुँचने में सार्थक सिद्ध नहीं हो रहा है । अब या तो जनता बेवकूफ है कि मर कर भी अपनी बात उन तक नहीं पहुँचा पा रही है, या सत्ता, मद में इतनी मदहोश है कि उन्हें कुछ दिखाई या सुनाई नहीं दे रहा है । लाशों की ढेर पर खड़ा संविधान किसके लिए ?

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डा. केसी की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है किन्तु सत्ता की असंवेदनशीलता चरम पराकाष्ठा पर है । डा. केसी की माँग देश के लिए है, देश की सर्वसाधारण जनता के लिए है, चिकित्सकीय व्यवस्था और शिक्षण प्रणाली के सुधार के लिए है, त्रिभुवन विश्वविद्यालय को राजनीति मुक्त करने के लिए है, किन्तु हर बार उनके प्रयास को झूठे आश्वासन के साथ पीछे कर दिया जाता है । क्योंकि अभी सरकार के पास इन बातों के लिए वक्त कहाँ है ? अभी तो वो जनता की आशाओं और उम्मीदों को उनकी ही लाशों पर पूरा करने के महत् कार्य करने में व्यस्त है ।

दो दिनों के बन्द से काठमान्डौ विचलित हो उठता है किन्तु आज सोलह दिनों के लगातार बन्द से देश का एक हिस्सा किस कदर पीड़ित है उसपर किसी को ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है । देश के अन्य भाग की जनता निरपेक्ष भाव से तमाशा देख रही है । भाईचारा और सद्भाव का इससे अच्छा नमूना और क्या हो सकता है, क्योंकि हम ही तो कहते हैं कि तराई में आँधी आएगी तो पहाड़ उसे रोकेगा और पहाड़ को भूख लगेगी तो तराई खाना देगा । पहाड़ की भूख में तराई के हर घर से अनाज निकला पर आज मधेश की आँधी में पहाड़ उसकी सुरक्षा नहीं कर पा रहा है । अर्थात् हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और ।

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ऐसा नहीं है कि मजबूत सरकार कोई पहल नहीं कर रही । वो तो वार्ता के लिए आह्वान कर रही है किन्तु संविधान प्रक्रिया को जारी रखते हुए । इस तरह वह तो अपनी जिम्मेदारी की औपचारिकता का निर्वाह ईमानदारी से कर रही है । साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे । अब देखना यह है कि कौन किस पर भारी पड़ता है जनता की इच्छा या सत्ता का स्वार्थ । किन्तु देश जिस नाजुक और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है उसका जनता और सत्ता दोनों को समझदारी और धैर्य के साथ सामना करना होगा । संक्रमणकाल के इस वक्त में देश हित को सोचें और निष्कर्ष तक पहुँचे जनता यही चाहती है ।

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