महिला अधिकार का चीरहरण-श्वेता दीप्ति
वर्ष-१९,अंक-१,मार्च २०१६ (सम्पादकीय)मौसम अपनी करवटें बदल चुका है । बसन्ती बयार और फाल्गुनी फिजा ने अपना रूप दिखाना शुरु कर दिया है । परन्तु, देश का मिजाज नहीं बदल रहा । बेजार आम जनता समझ नहीं पा रही कि, नया नेपाल, नई सरकार और नए संविधान ने उन्हें क्या दिया है ? बदहाली और बेबसी के बीच धूल की गुबारें, सड़कों पर गाडि़यों की लम्बी–लम्बी कतारें, सोलह–सत्रह घन्टे की लोडसेडिंग और सरकार की बड़ी–बड़ी बातें । प्रतीक्षित भारत भ्रमण भी खत्म हो चुका किन्तु परिणाम, वही ढाक के तीन पात । प्रधानमंत्री अपनी सत्कार की खुशी में देश और जनता की समस्याओं को ही भूल बैठे हैं । खैर..। राजधानी काँग्रेस के १३वीं अधिवेशन की सरगर्मी में व्यस्त है और राजनीतिज्ञ इस अधिवेशन के बाद के परिदृशय के लेखाजोखा में व्यस्त हैं । कुछ दिलों में अनदेखे ख्वाब पनप रहे हैं, तो कुछ अपनी डूबती नैया को लेकर सहमे हुए हैं । देखें, ऊँट किस करवट बैठता है ?
मार्च का महीना अर्थात् अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की चर्चा । वक्त गुजरता है, तारीखें बदलती हैं, परन्तु कुछ सोच ऐसी हैं जो कभी नहीं बदलती, चाहे हम कितने भी दावे कर लें किन्तु उनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि, उन्हें उखाड़ना मुश्किल हो रहा है । महिला आज भी अपनी पूर्व स्थिति से उबर नहीं पाई हैं । आज भी आधा आकाश अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है । यहाँ तक कि नेपाल के नए संविधान ने भी समाज में सदियों से व्याप्त रूढि़वादी सोच को ही, नारी सन्दर्भ और अधिकार के मामले में स्थापित किया है । विश्व के उत्कृष्ट संविधान का दावा जिस संविधान के लिए कथित तौर पर कहा जा रहा है, उस संविधान ने महिला अधिकार का ही चीरहरण कर लिया है । इस अवस्था में देश की आधी आबादी का सच क्या हो सकता है, इसका अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है ।
बहरहाल सद्भाव, भाईचारा, मुहब्बत और रंगों का त्योहार होली हमारे सामने है । रंगों की दुनिया हमें उर्जा देती है और आने वाले कल के लिए उम्मीदें भी । रंगो के त्योहार की अशेष शुभकामनाएँ हमारे सुधी पाठकों को और यह उम्मीद कि—
बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा
है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा । (गुप्त) 

