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प्रथम संविधान दिवस विशेष

sambidhan-sansodhan
 

ऐसी परिस्थिति में हम इस संविधान को कैसे मान सकते हैं ? हमारे घरों में मां, बहन, बेटियां, बच्चे सभी अपने सुहाग, अपने स्वजन, अपने आसरा के वियोग में डूबे हुए थे, बिलख रहे थे और सामन्त वर्ग यह विभेदकारी संविधान जारी कर रहा था । तो ऐसे में हम इस संविधान को कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?


इस संविधान को ‘नेपाल का मनुस्मृति’ कह सकते हैं । इस संविधान को सिर्फ खस ब्राह्मणों का संविधान कह सकते हैं । क्योंकि इस संविधान ने सिर्फ खस आर्य ब्राम्हणों को ही पहचाना है । किसी पिछड़ा को नहीं पहचानता है, न ही किसी दलित, आदिवासी या जनजाति को पहचानता है । किसी तामाङ, गुरुङ, मगर या मुसहर, बाँतर, चमार और डोम को भी नहीं पहचानता है ।

सीएन खड्का
२०७३ आश्विन ३ को नेपाल में प्रथम संविधान दिवस के रूप में एकतरफ पहाडी वर्गों द्वारा खुशियाँ मनायी गयी तो वहीं थारु, मुस्लिम, पिछड़ावर्ग तमाम मधेशी, आदिवासी एवं जनजातियों ने इसे ‘काला दिवस’ के रूप में विरोध जताया । ये दुखद बात है कि कुछ लोग नया संविधान को मान रहे हैं और कुछ लोग नहीं । ताज्जुब है कि इस देश का बड़ा हिस्सा इस बहुप्रतिक्षित संविधान को नहीं मान रहे हैं ।
प्रथम संविधान दिवस के अवसर पर हमें भी खुशी होनी चाहिए थी । किन्तु ऐसा नहीं हुआ, हम खुश नहीं हुए बल्कि दु्खी और निरास ही हुए । ऐसे ऐतिहासिक मौके पर खुश होने के बजाय हम दुखी व निराश हैं, यही ताज्जुब की बात है । हमारी भी इच्छा थी कि नेपाल के इतिहास में पहली बार हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा हमारे लिए संविधान बनाया जा रहा है, इस मौके पर हम खुशियां मनाएँ ।

हमारी भी अपेक्षा थी कि इस संविधान में हमारी पहचान, हमारा अधिकार, हमारा सम्मान और हमारा भविष्य सुनिश्चित हो । और इसके लिए हमने रचनात्मक भुमिका भी खेली समान अधिकार, सम्मानित पहचान और समुन्नत समाज स्थापना के लिए लिखित और मौखिक रूप में रचनात्मक सुझाव भी दिया । अन्य सहयोगी दलों ने भी सुझाव दिया । किन्तु परम्परागत सामन्ती शासकवर्गों के द्वारा हमारी बात नहीं मानी गई । हमारे विचारों को, हमारे सुझावों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया ।

ढाई सौ सालों से जिस तरह हमारे इस देश पर इन सामन्ती वर्गों ने शासन किया है, उसको पुनः निरंतरता देने के हिसाब से एकपक्षीय रूप में संविधान जारी किया । हम विरोध करते रह गए पर ये नश्लवादी दमनकारी शासक हमारे लहु पर से होते हुए इस विभेदकारी संविधान को जारी किया । हमारे तकरीबन ५ दर्जन भाईबन्धुओं की हत्या कर संविधान जारी किया । तो… ऐसी परिस्थिति में हम इस संविधान को कैसे मान सकते हैं ? हमारे घरों में मां, बहन, बेटियां, बच्चे सभी अपने सुहाग, अपने स्वजन, अपने आसरा के वियोग में डूबे हुए थे, बिलख रहे थे और सामन्त वर्ग यह विभेदकारी संविधान जारी कर रहा था । तो ऐसे में हम इस संविधान को कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?
आप कहेंगे कि संविधान में अभी जो कुछ मिला है उसको स्वीकार करते हुए आगे लड़ाई जारी रखनी चाहिए, तो हम वही तो करते आ रहे हैं । पिछले एक साल से संविधान की कमी कमजोरियों को दूर करते हुए सर्वस्वीकार्य बनाने के लिए संशोधन का एक दो नहीं अपितु १०२ बुंदा का विस्तृत प्रस्ताव (कारण सहित) हमने सरकार को दिया और उसपर निरन्तर दबाव भी बनाए हुए हैं, किन्तु अभी तक उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है । तो इस संविधान को हम कैसे स्वीकार करें ?
आपने देखा होगा, पिछले दिनों संविधान के सिर्फ २ दफाओं का संशोधन हुआ जिसके लिए संसद मे अध्ययन व छलफल हेतु ७ (सात) दिन का समय दिया गया, फिर बहस हुई तब प्रस्ताव पारित हुई । किन्तु ३५ भाग, ३०८ दफा (धारा), हजारों उपदफा और ९ अनुसूची सहित का मोटा ग्रन्थनुमा संविधान (तत्कालीन राष्ट्रपति को मोटा महाभारत सा किताब हाथ में उठाए हुए देखा है आपने) सिर्फ २ दिन में संविधानसभा मे पेशकर छलफल कर पारित भी कर लिया गया । ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अगर संविधान के हर दफाओं पर विस्तार से विचार विमर्श होता तो इसकी कमजोरियों का पर्दाफास हो जाता और पास होना मुश्किल हो जाता । इसलिए फास्ट ट्रयाक से संविधान पारित किया गया । तो ऐसे संविधान को हम कैसे मान लें ? इसलिए जबतक संविधान में हम सभी का समान हक और हैसियत स्थापित नहीं हो जाता तबतक हम इस संविधान को नहीं मानेंगे और अपने हक के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष करते रहेंगे ।
आपने पढ़ा है संविधान को और इसके कमजोरियों को भी जाना है ।

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इस संविधान को ‘नेपाल का मनुस्मृति’ कह सकते हैं । इस संविधान को सिर्फ खस ब्राह्मणों का संविधान कह सकते हैं । क्योंकि इस संविधान ने सिर्फ खस आर्य ब्राम्हणों को ही पहचाना है । किसी पिछड़ा को नहीं पहचानता है, न ही किसी दलित, आदिवासी या जनजाति को पहचानता है । किसी तामाङ, गुरुङ, मगर या मुसहर, बाँतर, चमार और डोम को भी नहीं पहचानता है । विश्वास न हो तो पढिए, इस संविधान में सिर्फ खस आर्य की ही परिभाषा मिलेगी, अन्य किसी वर्ग या समुदाय का नहीं । पिछड़ावर्ग जिसको परिभाषित करने की परम जरुरत है, उसकी परिभाषा करने के लिए हमलोग कहते कहते थक गए फिर भी खस ब्राम्हणवादी लोगों ने पिछड़ावर्ग का परिभाषा नहीं रखा, दलित की परिभाषा नहीं रखा, आदिवासी जनजाति की परिभाषा संविधान में नहीं रखा । तो हम इस संविधान को क्यों मानें ?
साथियों, हमारी संस्कृति हमारी परम्परा और हमारा व्यवहार रहा है कि हम सीमावर्ती भारतीय गावों मे वैवाहिक संबन्ध रखते हैं क्योंकि भारत के साथ हमारा सांस्कृतिक समरसता है । किन्तु इन चाइनिज गुलामों को ये बात हजम नहीं होती, ये नहीं चाहते कि हम भारतीयों के साथ कोई संबंध रखें । इसलिए इस पारिवारिक संबन्ध की परम्परा को भंग करने के लिए ही नागरिकता और नागरिक के हक का विवाद खड़ा किया है । तो क्या इनके कहने से हम हमारा सदियों का संबन्ध और परम्परा को तोड़ दें ? हरगिज नहीं ।
हम आप बिहार के किसी लड़की को ब्याह लावें तो इनको खतरा होता है कि कहीं वो लड़की राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री न बन जाए । इतने कमजोर बुद्धि और कमजोर आत्मबल के हैं ये भगौड़ा शासक । पर ये खुद दार्र्जि्लिङ, सिक्किम, आसाम से किसी लड़की या लड़का को लावे तो वो बंशज नेपाली हो जाता है । इसके लिए प्रशान्त तामाङ, तुलसी घिमिरे, कुन्ती मोक्तान, गोपाल भुटानी जैसे भारतीय भी नेपाली है पर कोई कौशल सिंह, चन्द्र नारायण खड़गा, राम औतार मंडल या डा. उपेन्द्र महतो नेपाली नहीं अपितु मधेशी बिहारी है । और, यही नेपाल के वर्तमान द्वन्द्व का मूल कारण है ।
हमने इस बीमारी को संविधान से दूर करने का बहुत प्रयास किया और अन्तिम साँस तक करते रहेंगे । क्योंकि ये खस ब्राह्मण भगौडा प्रजाति लोग हैं और इरान, अरब, कुमाउ, गढ्वाल, कश्मीर, सिक्किम, दार्र्जििलङ लगायत के अपनी भूमि में असफल होकर नेपाल भाग कर आते हैं पर जुझारु देशप्रेमी मधेशी, आदिवासी, जनजाति, पिछड़ावर्ग, दलित लोग कहीं भाग कर जाने वाले नहीं हैं, यहीं लड़कर अपना अधिकार वापस लेकर रहेंगे । यह भूमि हमारी है, यह देश हमारा है । आपको पता होगा, इस देश का पहला राजा हमारे इसी पिछड़ावर्ग के थे, यादव थे, गोपालवंशी थे । तो आज कोई गैर भगौड़ा हमसे हमारी भूमि, हमारा अधिकार और हमारी परम्परा को कैसे छीन सकता है ? और, बिहार का बहुतायत भाग तो पहले नेपाल में ही था, इसलिए उन गावों कस्बों मे हमारे बच्चों की शादी तो हमारी स्वदेशी परम्परा ही हुई ना ।
तीसरी बात, हमने संविधान में ‘राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग आयोग’ का गठन और पिछड़ावर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने का बात कही जो नहीं माना गया । ‘पिछड़ावर्ग’, जिसका जनसंख्या तकरीबन २०५ के आसपास है । पर पारम्परिक एकात्मक शासन व्यवस्था के कारण समाज के बिल्कुल हासिए पर है । सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक रूप से बहुत ही पीछे होने के बावजुद भी राज्य की ओर से इनके लिए कोई विशेष योजना नहीं लाया गया है, आरक्षण के लिए क्लस्टर नहीं बनाया गया है । मधेशी कोटा में रख देने के कारण से मधेशी के नाम पर मधेश के अगड़ा जाती ही सारी सुविधाएं ले जाते हैं और पिछ्ड़े समुदाय के लोग ठगे रह जाते हैं । इसलिए हमने मानव विकास सूचकांक के आधार पर आरक्षण क्लस्टर कायम करते हुए पिछड़ावर्ग के लिए जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने का माग किया पर हमारी बातों को पूरी तरह नकार दिया गया । इसलिए ऐसे संविधान को हम कैसे मानें ?
अधिकार के लिए हुए मधेशी जनजाति आन्दोलन के क्रम में राज्य द्वारा क्रुरतापुर्वक मारे हए वीर मधेशियों को अभी तक शहीद घोषणा नहीं किया गया है क्योंकि ये शासकवर्ग की नजर में हम नेपाली नहीं सिर्फ मधेशी हैं । पहाड़ीवर्ग हमको मधेशी कहता है पर खुद को नेपाली । तो ये मधेशी को नेपाल का शहीद कैसे स्वीकार करे ?

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आदरणीय जनसमुदाय,
प्रादेशिक सीमांकन इस संविधान की सब से बड़ी कमजोरी है । इस संबंध में लोगों का मत भी अलग अलग है । आप जानते हैं कि कमजोर, उपेक्षित, पीड़ित और सीमान्तकृतवर्गों ने जब भी समानता और अधिकार के लिए आवाज उठाया है तब सामन्तों ने उन पर देशद्रोही और विखण्डनकारी का आरोप लगाया है और इसी आड़ में पीड़ितों पर दमन किया है । यही बात अभी मधेशी, जनजाति, पिछÞडावर्ग व दलितों के साथ हुई है ।
समानता, अधिकार और समान सहभागिता के लिए ही संघीयता को लाया गया है । पर जिस प्रकार प्रादेशिक सीमांकन किया गया है कि सिर्फ एक प्रदेश (प्रदेश नं २) को छोड़कर हर प्रदेश में सिर्फ खस आर्य शासक का ही दबदबा रहे । हर प्रदेश में एमाले, काँग्रेस और माओवादी के बडेÞ नेताओं का बोलवाला कायम रखने के हिसाब से ही जिलों का आबंटन किया गया है । और मधेश को इस प्रकार खण्डित किया गया है कि यहाँ कोई स्रोत न रहे, कोई मार्ग न रहे, कोई अधिकार न रहे ।
मै पूछता हुँ, किस सिद्धान्त के तहत सीमांकन किए हो ? चितवन को मधेश से क्यों काटे हो ? झापा, मोरङ, सुनसरी, कैलाली, कंचनपुर को मधेश से क्यों काटे हो ? मधेशी या पहाड़ी प्रदेश बनाने की बात तो नहीं है जो मधेशियों का जनसंख्या थोड़ा कम है या थोड़े बहुत पहाड़ी भी कहीं पर है तो उसे मधेश से अलग कर दिए ? मधेश तो एक भुगोल है जहाँ सभी वर्ग समुदायों के लोग बसते हैं । यहाँ बसने वाले सभी ‘मधेशवासी’ हैं । पर शासन सत्ता की आड़ में आप्रवासन के द्वारा मधेश के जंगलों और उर्वर जमीनों पर पहाड़िया कब्जा जमा लिए तो क्या मधेश ‘मधेश’ नहीं रहा ? या पहाड़ के प्रदेशों के लिए भारत तक मार्ग (नाका) बना रहे थे ? यदि ऐसा था तो मधेश के २ प्रदेशों के लिए भी चीन तक का मार्ग निकाल देते, तब समझता कि बहुत इमानदारीपूर्वक सीमांकन किए हो । किन्तु नीयत में तो बेइमानी है, मधेशियों को मजबुत नहीं होने देना है, इसलिए छिन्नभिन्न कर दो । और मधेशियों ने जब इस षड्यन्त्र का विरोध किया तो मधेशी विखण्डनकारी हो गए ? मधेशियों ने सीमांकन में समानता और एकरूपता की बात की तो मधेशी अराष्ट्रवादी हो गया ?
मैं तो कहता हूँ कि एमाले निहायत ही अराष्ट्रवादी, अराजक और विखण्डनवादी पार्टी है । एमाले नेपाल के एकता के लिए बाधक है । एमाले ने ‘सुषुप्त विखण्डनवाद’ को जन्म दिया है । एमाले मधेशी, जनजाति को इस कदर हासिए पर ठेल देना चाहता है कि जनता का धैर्य टूट जाए और नेपाल खण्डित ही हो जाए, मधेश नेपाल से अलग हो जाए । क्योंकि मधेशियों से इन सामन्ती शासकों के पारम्परिक सत्ता को खतरा है, जिस दिन मधेशी संगठित हो गया एक हो गया उस दिन इनकी कुर्सी गई, इनका धौंस गया, इनका इतिहास गया । इसलिए ये षडयन्त्रकारी, मधेशियों को विभिन्न बातों मे उलझाकर, फँसाकर, भरमाकर बिखेर देना चाहता है, कमजोर कर देना चाहता है, मिटा देना चाहता है ।
अभी भी केपि ओलि का बयान आता है कि ‘मधेशी थारुलाई पेलेर अगाडी बढ्नुपर्छ, संविधान कुनै पनि हालतमा संशोधन गर्न दिनु हुँदैन’ । तो ऐसे में कहाँ से सहमति होगी, कैसे राष्ट्रीय एकता मजबुत होगी ? इसलिए मुल्क को इन सुषुप्त विखण्डनवादियों से बचाना होगा, संविधान में आमूल संशोधन कर इसे सर्वस्वीकार्य बनाना होगा, सभी के पहचान और अधिकार का सम्मान करते हुए राष्ट्र का भावनात्मक एकीकरण करना होगा और समाज में समानता कायम करते हुए सामाजिक लोकतन्त्र का स्थापना करना होगा । इसमें आप सभी का निरन्तर सहयोग रहे, इसकी अपेक्षा रखता हूँ ।

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