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लेखक की स्याही :

 

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मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज , ११, नवम्बर | पत्रिका के प्रबन्ध निदेशक और सम्पादक महोदया, दोनों गंभीर आर्थिक बिषय पर चर्चा कर रहे थे, काफी विचार विमर्श के बाद पत्रिका से आमदनी में गिरावट का कारण फिजूल खर्ची को माना गया। फिर फिजूल खर्ची के लिए जिम्मेदार की ख़ोज प्रारम्भ हुई, कई फाइलों और बिल-भौचर का संश्लेषण और विश्लेषण करने के बाद पाया गया कि लेखकों को ज्यादा पारिश्रमिक देने के कारण आर्थिक बोझ बड़ गया है। इसमें कटौती करनी होगी।

इसी बीच मेरा ताज़ातरीन लेख पंहुचा, जिस पर गाज गिरना लाज़िमी ही था। कार्यालय से ज़बाब आया, “लेख भेजने के लिए धन्यवाद। आपका लेख कम्युनिस्ट बिचारधारा से प्रभावित पाया गया, जिसे संतुलित करने के लिए कई शब्द और कई अनुच्छेद बदलने पड़े। अतः आपको आधी पारिश्रमिक मिलेगी”।

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मैं तिलमिला उठा, प्रतिक्रिया स्वरुप दूसरा लेख दे मारा, फिर ज़बाब आया,”लेख भेजने के लिए धन्यवाद। आपका लेख अत्यधिक लचीला और काल्पनिक पाया गया, जिसे यथार्थ और वस्तुपरक करने के लिए कई शब्द और कई अनुच्छेद बदलने पड़े। अतः हमारे विधान के धारा १६ के उपधारा ७ के तहत आधी पारिश्रमिक मिलेगी”।

ऐसा लगा मैं १६ मंजिल के ७वे खिड़की के गिरा हो। अपने ज्ञान पिटारे को संचित कर, ईश्वर का नाम लेकर तीसरा लेखबम पटक आया। फिर ज़बाब आया,”लेख भेजने के लिए धन्यवाद। आपका लेख किसी धर्म विशेष के साथ-साथ राजावाद और मंडलिए प्रभाव से ग्रसित पाया गया। जिसे धर्मनिरपेक्ष करने के लिए कई शब्द और कई अनुच्छेद बदलने पड़े। अतः आगे से वाक्य गणना के आधार पर पारिश्रमिक दी जाएगी। अभी आपको आधी पारिश्रमिक मिलेगी। किसी विवाद निपटारे के लिए हुम्ला-जुमला कोर्ट में ही मुकदमा स्वीकार्य होगा”।

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मैं औधें मुह गिर पड़ा, अब मुकदमा के लिए हुम्ला जाना मेरे बस के बाहर था। हार मानकर वाक्य गणना अनुसार लेख लिखा, जो इस प्रकार रहा.….
“राम- तुम आ गए ?
शिव- हाँ, मैं आ गया।
राम- क्या तुम सच में आ गए !
शिव- हाँ, मैं सच में आ ही गया !!”

इस लेख को पढ़ने के बाद प्रबन्ध निदेशक और सम्पादक महोदया असमंजस में पड गए, अब क्या किया जाए। उनका जबाब आया, “लेख भेजने के लिए धन्यवाद। आपको पारिश्रमिक मिलेगा, लेकिन आगे से शब्द गणना अनुसार लेख भेजें”।

थोड़ा सुकून मिला, अगला लेख भेजा, जो शब्द गणना अनुसार इस प्रकार रहा….
“राम ने कहा, शिव, मेरे शिव, प्यारे शिव, तुम आ गए ? शिव ने कहा, राम, मेरे राम, प्यारे राम, हाँ, मैं आ गया। राम ने कहा, शिव, मेरे शिव, प्यारे शिव, क्या तुम सच में आ गए ! शिव ने कहा, राम, मेरे राम, प्यारे राम, हाँ, मैं सच में आ ही गया !!”

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लेख पढ़ने के बाद जबाब आया, “लेख भेजने के लिए धन्यवाद। हमारी संस्था लेखकों का बहुत ही आदर और सम्मान करती है। हम लेखक के कल्पना और कलम पर किसी प्रकार रोक लगाने के ख़िलाफ़ है, अतः आपसे आग्रह है, पूर्व में आप जिस प्रकार लेख भेजा करते थे, कृप्या उसी प्रकार भेजने का कष्ट करें, आपको पूरा का पूरा पारिश्रमिक मिलता रहेगा।
धन्यवाद।

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1 thought on “लेखक की स्याही :

  1. बहुत ही बढ़िया लिखा हैं. पढ़ने में बड़ा मज़ा आया. धन्यवाद

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