महाभियोग, भ्रमण और संशोधन : डा. श्वेता दीप्ति
सही जगह पर कम और गलत जगहों पर अख्तियार ने अपना निरंकुश रूप दिखाया और आतंक का वातावरण कायम करने में कामयाब भी हुआ । व्यक्तिगत कारणों की वजह से शिकायतें दर्ज होती थीं और सही व्यक्ति भी शारीरिक मानसिक और आर्थिक पीड़ा का शिकार हो रहा था ।
मधेश में सबसे अधिक शादियाँ सीमा पार से होती हैं, ऐसे में वैवाहिक अंगीकृत नागरिकों की संख्या वहाँ सबसे अधिक हैं । आलम यह है कि अब ये शादियाँ नजरों को चुभने लगी हैं । शादियाँ अगर रुकेंगी नहीं तो अंगीकृत नागरिक की संख्या तो बढ़नी ही है
एमाले नेतागण चाहे वो खनाल हों, नेपाल हों या ओली हों संविभान संशोधन का औचित्य ही नहीं मान रहे ऐसे में संविधान संशोधन का शगूफा सिर्फ मृगतृष्णा तो नहीं ?

डा. श्वेता दीप्ति
बदलते मौसम के साथ नेपाल की राजनीतिक गलियारों से अधिक आम जनमानस के बीच महाभियोग प्रकरण, भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नेपाल भ्रमण, संविधान संशोधन और काँग्रेस प्रमुख देउवा की भारत यात्रा की चर्चा खास रही । सबसे पहली चर्चा महाभियोग की करें तो इसके समर्थक और विरोधियों की कमी नहीं है । अचानक महाभियोग जैसी संगीन चर्चा आमने आना कई सवालों को जन्म दे गया । संसद में सबसे बड़ी पार्टी काँग्रेस की जानकारी या हस्ताक्षर के बिना इसका पंजीकरण कैसे सम्भव हुआ यह सवाल सबसे पहले सामने आया । ये और बात है कि पीछे चलकर काँग्रेस ने भी अपनी सहमति जता दी ।
अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग प्रमुख लोकमान कार्की राज्य के संविधान और कानून से ऊपर की सोच रखने लगे थे यह तो सर्वविदित है । लोकमान सिंह कार्की के विगत और वर्तमान पर अगर ध्यान दिया जाय तो यह सर्वविदित है कि कार्की का विगत अप्रजातान्त्रिक और भ्रष्ट रहा है और वर्तमान की कार्यशैली हिटलरशाही की रही है । उनके उपर जनआन्दोलन दमन, भ्रष्टाचार आदि के आरोप होने के बावजूद भी उन्हें प्रमुख आयुक्त पद पर नियुक्त किया गया था । इस पद पर आसीन होने की कोई योग्यता उनमें नहीं थी इसके बावजूद इनकी नियुक्ति ने इन्हें निरकुंश और गैरजिम्मेदार बनाया । इनकी कार्यशैली बिल्कुल दबंगीय स्टाइल की रही । अख्तियार का कुछ ऐसा हौव्वा खड़ा हुआ कि कई संस्थाओं में सही काम करने वालों ने भी अपने हाथ पीछे कर लिए ।
विद्युत प्राधिकरण जैसी और भी कई संस्थाओं में त्राहिमाम की स्थिति बन गई थी । लोकमान की बनाई हुई मनमर्जी की नीति का लोगों ने गलत फायदा उठाया । सही जगह पर कम और गलत जगहों पर अख्तियार ने अपना निरंकुश रूप दिखाया और आतंक का वातावरण कायम करने में कामयाब भी हुआ । व्यक्तिगत कारणों की वजह से शिकायतें दर्ज होती थीं और सही व्यक्ति भी शारीरिक मानसिक और आर्थिक पीड़ा का शिकार हो रहा था । इनकी कार्यशैली का असर तो ऐसा था कि पूर्व प्रधानमंत्री ओली भी अपने कार्यकाल में यह कहने से नहीं चूके कि “ये हमें भी तो बन्द नहीं करवा देगा”। सचिव जैसे मर्यादित और उच्च पद का भी कार्की ने ख्याल नहीं किया और उनपर यह प्रभाव डालने की कोशिश की सर्वोच्च मैं हूँ और आप सब मेरे मातहत हैं ।
लोकमान सिंह की कार्यशैली और बदमिजाजी के कारण उनकी बिगड़ी हुई छवि और भी स्तरहीन होती चली गई । उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व, न्यायपालिका, प्रशासन, संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था सभी की धज्जियाँ उड़ा दी । जिसे मन हुआ उसपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना, पकड़ना, अनुसन्धान के नाम पर हिरासत में रखना जैसे काम ने अधिकता पाई । इस तरह अख्तियार एक आतंक की तरह हो गया जिसके नाम से घबराहट होने लगी थी । लोकमानसिंह के पक्षधर भी हैं और वो ऐसे लोग हैं, जिन्हें लोकमान का संरक्षण प्राप्त हुआ । कई ऐसे उदाहरण हैं, जिससे उनकी हठधर्मिता स्पष्ट होती है, मसलन अदालत की अवहेलना, संसदीय समिति की अवहेलना, देश के कानून और संविधान की अवहेलना ये सब काफी हैं आज की हालात को झेलने के लिए । कार्की विरुद्ध के महाभियोग के विषय में संसद में विचार विमर्श जारी है । आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात् निष्कर्ष सामने आ ही जाएगा ।बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ।
दूसरा सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा भारतीय राष्ट्रपति का नेपाल भ्रमण । हर्ष और विषाद के बीच भारतीय राष्ट्रपति की आध्यात्मिक यात्रा सफल और सुरक्षित रही, यह माना जा सकता है । एमाले न तो पूरी तरह अपना विरोध जता पाया और न ही सहमति । किन्तु उनके विरोध की वजह से सरकार को देश की और आनेवाले अतिथि की सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा करनी पड़ी । जो आवश्यक भी था क्योंकि पूरे देश की शाख और सम्मान इस भ्रमण से सम्बद्ध था । किसी भी अवांछित घटना को रोकने के लिए ऐसे कदम उठाए गए जिसकी वजह से सरकार को तीखी आलोचना झेलनी पड़ी ।
राष्ट्रपति प्रणव की यात्रा ने एकबार पुनः संजीवनी का काम किया है । रिश्तों को सुधारने की एक अच्छी पहल दोनों देशों की ओर से रही । १८ वर्षों के बाद भारत के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल का भ्रमण किया जिसने ठंढे पड़े रिश्तों में गर्मी जरुर ला दी है । किन्तु इस भ्रमण के बाद उस तबके में असंतोष ही है, जो यह मान रहा है कि भारत नेपाल के संविधान को समर्थन न देकर नेपाल के आन्तरिक विषय में हस्तक्षेप कर रहा है । संविधान निर्माण के बाद ऐसे कई भ्रमण राजनीतिज्ञों के नेपाल और भारत में हो चुके हैं, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर संविधान कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सहमति जुटाने की कोशिश की गई । किन्तु, भारत आज भी यह चाह रहा है कि नेपाल अपने सभी हिस्सों को संतुष्ट कर के आगे बढ़े । यह बात भले ही यहाँ के एक पक्ष को चुभ जाती हो, इसे भारतीय दखल माना जाता हो, परन्तु यह भी नहीं झुठलाया जा सकता कि संविधान का कार्यान्वयन बिना तराई समस्या को सुलझाए सम्भव नहीं है । देश को संविधान तो मिला परन्तु वैधानिक स्तर पर मधेश समस्या का समाधान नही मिला है । राज्यों की सीमाओं के पुनर्निधारण से जुडी समस्याओं का किस कदर समाधान निकाला जाय और वो समाधान किस तरह सत्ताधारी दल और मधेश को सर्वमान्य हो देश इस में उलझा हुआ है । सरकार बदलती रही पर समस्या के समाधान का विकल्प नहीं मिला ।
फिलहाल यह सम्भावना दिख रही है कि सरकार मधेशी पार्टियों के साथ समझौते के करीब है । मुद्दों को समेट कर समग्र समझौते पर सहमति कैसे बनेगी सबका ध्यान इस ओर ही है । प्रांतीय सीमाएं, नागरिकता, ऊपरी सदन में प्रतिनिधित्व और भाषाओं को मान्यता दिलाने जैसी मांग मधेश की है जिसमे सबसे अहम मांग प्रतिनिधित्व और प्रान्त की है । अब से पहले भी वार्ताएं हुई और कुछ हासिल होने से पहले किसी न किसी बहाने टल गईं । ऐसे में आज भी समाधान होगा या नहीं यह प्रश्न अपनी जगह कायम ही है । अब तक यह सामने नही आ रहा किÞ सीमाओं के मसले को हल करने के लिए कौन सी योजना बनाई गई है । माना यह जा रहा है कि दोनों पक्ष प्रान्त नंबर ५ के पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बंटवारे पर सहमत हो गए हैं ।मगर पूर्व के तीन विवादित जिले झापा, मोरंग, सुनसरी और पश्चिम के २ जिलों कंचनपुर और कैलाली पर स्थिति अब भी साफ नही है । सत्ता इसे प्रान्त नंबर १ और ७ का हिस्सा बने रहने के पक्ष में है तो मधेशी पार्टी इन जिलों को २ और ६ में शामिल कराना चाहती है ।
ऐसे में यह तो जाहिर सी बात है कि किसीं एक को पीछे हटना होगा मगर कौन ?
देखें ऊंट किस करवट बैठता है मधेशियों की शहादत जीतती है या सत्ता की जिद ।
इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मधेश की जनता पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है और सत्ता झुकने के मूड में नहीं है । ऐसे में किसी और पर आरोप लगाने से अच्छा होता कि हमारी समस्या हम स्वयं सुलझा लेते । संविधान संशोधन की चर्चा में अचानक तब ज्यादा गर्मी आई जब अंगीकृत नागरिक को अधिकार देने की बात सामने आई । यह हवा किधर से चली और कैसे सामने आई यह बिल्कुल गौण है क्योंकि हर सम्बद्ध व्यक्ति इससे इंकार कर रहा है । तो क्या यह अपवाह सनसनी फैलाने के लिए थी या जनता के मूड को परखने के लिए ? सामाजिक संजाल पर बहस छिड़ गई, जहाँ राष्ट्रवादिता का हर रूप देखने को मिल रहा है । देश एक अजीब से दौर से गुजर रहा है । मधेश में सबसे अधिक शादियाँ सीमा पार से होती हैं, ऐसे में वैवाहिक अंगीकृत नागरिकों की संख्या वहाँ सबसे अधिक हैं । आलम यह है कि अब ये शादियाँ नजरों को चुभने लगी हैं । शादियाँ अगर रुकेंगी नहीं तो अंगीकृत नागरिक की संख्या तो बढ़नी ही है यह तो तय है चाहे आप कितने भी आँकड़े गिनते रहें । खैर संशोधन की चर्चा कई महीनों से धूमकेतु की तरह सामने आती है और विलीन हो जाती है । एमाले उस घायल की तरह है जिसके घाव ताजे हो जाते हैं जब भी संविधान संशोधन की चर्चा होती है, किन्तु आगामी चुनाव के मद्देनजर मधेश पर काबिज होने की कोशिश उनकी शुरु हो चुकी है ।
इसी दौरान जैसे जैसे प्रचण्ड सरकार के दिन आगे बढ़ रहे हैं वैसे वैसे काँग्रेस प्रमुख देउवा की चर्चा गति पकड़ रही है । शुरु से वर्तमान सरकार के लिए यह माना जाता रहा है कि यह सरकार सिर्फ नौ महीनों के लिए है । वैसे इस बात का खण्डन सरकार कर चुकी है । सरकार का यह कहना है कि समय सीमा निर्धारित नहीं है बल्कि कार्यशैली यह तय करेगी कि वर्तमान सरकार को बने रहना चाहिए या हट जाना चाहिए । खैर, बात जो भी हो परन्तु काँग्रेस की आँखों में सपने तो पलने ही लगे हैं । इस बात को देउवा के भारत भ्रमण से जोड़कर देखा जा रहा है । इन्डिया फाउन्डेशन द्वारा गोवा में आयोजित सेमिनार में शामिल होने के लिए देउवा अपनी पाँच दिनों की यात्रा समाप्त कर के वापस आ चुके हैं । इस बीच कई कयास यहाँ लगाए जा चुके हैं ।
यह माना जा रहा है कि देउवा आगामी महीनों में होने वाले परिवर्तन की तैयारी में हैं । नेपाली संचार माध्यम ने भारत भ्रमण के दौरान देउवा की मुलाकात निर्वासित तिब्बती नेता दलाई लामा के साथ होने की बात को काफी उछाला था, जिसका खण्डन देउवा ने आने के साथ ही किया है । उन्होंने कहा कि ऐसे भ्रामक प्रचार उनके खिलाफ न किया जाय । स्वाभाविक भी है कि अगर ऐसा हुआ तो यह अपने महत्वपूर्ण पड़ोसी को नाराज करने वाली बात होगी, जो देउवा के राजनीतिक भविष्य के खिलाफ जा सकती है । भ्रमण पश्चात् काँग्रेस प्रमुख ने भी यही कहा कि भारत आज भी अपनी पुरानी सोच पर अडिग है कि मधेश को साथ लेकर आगे बढ़ा जाय तभी संविधान के कार्यान्वयन में सहजता आ पाएगी ।उन्होंने स्वयं यह भी माना कि भारत की यह जिज्ञासा गलत नहीं है और संविधान सर्वस्वीकार्य बनाने और कार्यान्वयन के लिए संशोधन आवश्यक है । जबकि एमाले नेतागण चाहे वो खनाल हों, नेपाल हों या ओली हों संविभान संशोधन का औचित्य ही नहीं मान रहे ऐसे में संविधान संशोधन का शगूफा सिर्फ मृगतृष्णा तो नहीं ? व्

