मधेश की मिट्टी में क्रांति के बीज स्वतः प्रस्फुटित होते हैं : श्वेता दीप्ति
क्या प्रहरी का काम सिर्फ नेताओं को सुरक्षा देना है ? क्या प्रहरी या प्रशासन सिर्फ समुदाय विशेष के लिए है ?
वैसे पिछले आन्दोलन में सद्भावना अध्यक्ष महतो जी को जिस तरह प्रहरी ने पीटा था उससे तो यही लगता है कि प्रहरी भी सिर्फ समुदाय विशेष के ही लिए तैनात की जाती है ।
क्या एमाले अब भी मधेश की माँग को नजरअंदाज कर, संविधान संशोधन न होने की जिद के साथ चलेगा या फिर देश की असंतुलित गति को स्थिर करने में अपनी कोई निर्णायक भूमिका का निर्वाह करेगा ?

जहाँ नैतिकता है, चेतना है, कुछ पा लेने का जज्बा है और अगर यह जज्बा अपनी पहचान का, अधिकार का है, तो वहाँ की मिट्टी में क्रांति के बीज स्वतः प्रस्फुटित होते हैं और क्रांति के बीज कभी सूखते नहीं, बंजर चाहे जमीं क्यों ना हो । मधेश की धरती तो उर्वरा है, यहाँ जोश भी है और उबाल भी, यह उसने साबित कर दिया । हाँ अपनों के खोने का दर्द रिसता जरुर है, पर यही दर्द हिम्मत और जुनून भी पैदा करता है ।
कोई भी राष्ट्र किसी एक समुदाय का नहीं होता यह तो मानना ही होगा । एमाले अध्यक्ष के प्रति रोष पिछले आन्दोलन से ही है मधेशी जनता में । उन्होंने अपने चुटीले प्रहारों से कई बार वहाँ की जनता की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, सप्तरी में भी उन्होंने यही किया । एमाले वहाँ सद्भाव कायम करने गई थी या यह बताने कि वह कितनी शक्तिशाली पार्टी है, उन्हें काले झण्डे से डराया नहीं जा सकता । क्या किसी आहत को मरहम ऐसे ही लगाया जाता है ? जहाँ की जनता को आपने कभी आम, तो कभी मक्खी, कभी भारतीय तो कभी मधेश के अस्तित्व को ही नकार कर ठेस पहुँचाई क्या वहाँ आपकी नम्रता नहीं होनी चाहिए थी ? सिर्फ धोती कुर्ता पहन कर या मैथिली, भोजपूरी में बोलकर आप दिए हुए जख्म को नहीं भर सकते । एमाले का मधेश में जाना कुछ इस तरह प्रचारित किया गया मीडिया की ओर से, मानो वो मधेश नहीं किसी तालीबानी इलाके में चले गए हैं । आखिर यह स्थिति आई क्यों कि आपको अपने ही देश के भूखण्ड में जाने के लिए इतनी सुरक्षा निकाय की आवश्यकता पड़ गई ? एक ओर यह कहा जाता है कि मधेश की जनता आयातीत है, तो फिर उनसे वोट की अपेक्षा क्यों ? यानि आप जानते हैं कि वो भी नेपाली हैं, फिर उन्हें इतनी दुत्कार क्यों ? विगत में जो मधेश की जनता के लिए कहा गया और राष्ट्रवाद की दुहाई दी गई इसका असर और परिणाम से आप वाकिफ थे, इसलिए साफ है कि आप भी समझ रहे थे कि जो बोया है, उसे ही काटने का वक्त है । इसलिए सतर्कता पहले से अपना ली जाय । परन्तु जो सप्तरी के कार्यक्रम स्थल पर हुआ वह निन्दनीय ही नहीं अतिनिन्दनीय है । नेताओं का अधिकार है अगर कार्यक्रम करना तो काला झण्डा दिखाना भी विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार के तहत ही आता है । जनता ने आपा खोया, वो भी तब जब कार्यक्रम समाप्त होने वाला था । प्रहरियों ने नेताओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा भी दिया था, फिर गोली चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ गई ? अश्रु गैस काफी होते हैं भीड़ को तितर बितर करने के लिए ।
मधेशी जनता अपने बीच अपने नेता को देखना चाह रही है, जबकि अब तक ये सत्ता मोह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं । आखिर ये अपनी धरती पर क्यों नहीं जा रहे ? क्या कोई बाह्य दवाब है इन पर ?
आज बिहार की एक घटना याद आ रही है । बिहार के मधेपुरा जिले में उस वक्त की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का कार्यक्रम था । दस लाख से अधिक लोगों की भीड़ जमा थी । उनके भाषण के क्रम में ही भीड़ से किसी ने उन पर पत्थर फेंका जो सीधी उनकी नाक पर लगी, जिसकी वजह से उनकी नाक की हड्डी टूट गई थी । उस दस लाख की आक्रोशित और बेकाबु भीड़ को सिर्फ अश्रुगैस से नियंत्रित किया गया था । कोई हताहत नहीं हुआ था । पर यह कैसी व्यवस्था है, जहाँ इतनी कम संख्या वाली भीड़ को तितरबितर करने के लिए सीधे गोली चलाने का निर्देश दे दिया जाता है ? वो भी भगाने के लिए नहीं बल्कि मौत को अंजाम देने के लिए । यह जनता है कोई आतंककारी नहीं । प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है और सच्चाई कई कैमरे में भी कैद है कि मोर्चा के कार्यकर्ता विरोध जताने के बाद बैठे हुए थे और कार्यक्रम खत्म होनेवाला था तभी प्रहरी के पीछे से एमाले कार्यकताओं ने पत्थरबाजी शुरु की और शांत माहोल बिगड़ता चला गया । इतना ही नहीं पानी चलाने वाले फव्वारे भी सिर्फ दिखाने के लिए रखे गए थे । उनका प्रयोग ही नहीं किया गया बल्कि, सीधे अश्रुगैस और हवाई फायर शुरु कर दिया गया और बिना माइकिंग के सीधे लक्षित कर के गोली चलाई गई । आखिर ये सभी परिदृश्य क्या दर्शाते हैं ? क्या प्रहरी का काम सिर्फ नेताओं को सुरक्षा देना है ? क्या प्रहरी या प्रशासन सिर्फ समुदाय विशेष के लिए है ? वैसे पिछले आन्दोलन में सद्भावना अध्यक्ष महतो जी को जिस तरह प्रहरी ने पीटा था उससे तो यही लगता है कि प्रहरी भी सिर्फ समुदाय विशेष के ही लिए तैनात की जाती है ।
एमाले की यह यात्रा चुनावी परिवेश को तैयार करने के लिए था परन्तु अब उन्हें भी समझ आ रहा होगा कि मधेश उनकी कटुक्तियों को इतनी आसानी से भूलने वाला नहीं ।
राजविराज में हुए गोलीकाण्ड ने कई सवालों को जन्म दिया है । आखिर देश की सुरक्षा निकाय किसके लिए है ? जनता के लिए या स्वयं के लिए ? उनमें इतना अधैर्य क्यों है कि उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है, या फिर इन सबके पीछे कुछ और वजह है ? मधेश की धरती बार बार रक्ताम्भ होती रही है । ज्ञात है कि मधेश आन्दोलन के समय में भी प्रहरी का दमन चक्र नृशंसता के साथ चला था । ऐसी जगहों पर जनता को मारा गया था जहाँ कोई औचित्य नहीं था गोली चलाने का । घरों में जाकर गोली चलाई गई थी, रुपन्देही के बेथरी में प्रहरी की गोली से बालिका की मौत हुई थी । प्रहरी की गलती को मानवअधिकार आयोग ने भी मान लिया है । बार–बार यह मधेश की धरती पर होता आ रहा है । बहुत वक्त नहीं गुजरा है जब बेथरी, रंगेली, टीकापुर, गौर, लहान में यही सब दमन वहाँ की जनता झेल चुकी है और एक बार फिर वही दृश्य राजबिराज में देखने को मिला । क्या इससे लोकतंत्र की नवनिर्मित नींव नहीं हिल गई है ? आश्चर्य तो उस वक्त होता है जब गृहमंत्री, प्रधानमंत्री या आइजीपी यह बोलकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हमने आदेश नहीं दिया । इतना ही नहीं सम्बद्ध अधिकारियों को निलम्बित करने की बजाय उनका तबादला कर दिया जाता है, जिसकी वजह से जनता की चोट पर मलहम नहीं लगता बल्कि, उनकी चोट को और कुरेद दिया जाता है ।
सप्तरी की घटना ने राजनीतिक गलियारे में जो तूफान ला दिया है, उससे निकलने के लिए सभी दल प्रयासरत हैं । मोर्चा के समर्थन वापसी की घोषणा ने माओ सरकार की चिन्ता बढ़ा दी है, वहीं नियत वक्त पर निर्वाचन होने की सम्भावना पर भी शंका के बादल घिर आए हैं । एमाले की मेची महाकाली सद्भाव यात्रा भी वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव नजर नहीं आ रही । एमाले की यह यात्रा चुनावी परिवेश को तैयार करने के लिए था परन्तु अब उन्हें भी समझ आ रहा होगा कि मधेश उनकी कटुक्तियों को इतनी आसानी से भूलने वाला नहीं । उनके कह देने मात्र से कि मधेश को सभी अधिकार प्राप्त है, मधेशी जनता को बरगलाया नहीं जा सकता, यह सच अब तो उन्हें भी मानना होगा । मधेश की जनता को अब तक दोयम दर्जा का ही माना जाता रहा है । जिन्हें हर निकाय में सौ में से दो स्थान देकर बहलाया जाता रहा है, कल तक जाने अन्जाने मधेश इस विभेद को सहता आ रहा था । क्योंकि तब मधेश की मिट्टी में खुद के लिए अधिकार चेतना की लहर नहीं थी, वो जो भी लड़ाई लड़ रहे थे सम्पूर्ण देश के लिए था । तब तक वो नेपाली थे किन्तु जब अपने अधिकार को माँगना शुरु किया तो विदेशी हो गए । पर अब जो लहर आई है, उसे दबाना सम्भव नहीं है ।
आज जो परिस्थिति सामने है उसमें सवाल यह उठता है कि, अब इन तीन बड़ी पार्टियों की नीति क्या होगी ? क्या एमाले अब भी मधेश की माँग को नजरअंदाज कर, संविधान संशोधन न होने की जिद के साथ चलेगा या फिर देश की असंतुलित गति को स्थिर करने में अपनी कोई निर्णायक भूमिका का निर्वाह करेगा ? मोर्चा अगर समर्थन वापस लेती है तो प्रचण्ड सरकार का गिरना तय है ऐसे में सरकार किस तरह अपने पक्ष में सभी को लेकर आ पाती है ? काँग्रेस की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं कही जा सकती क्योंकि सप्तरी की घटना ने गृहमंत्री की भूमिका पर सवाल उठा दिया है । मधेशी नेता होने का जो फायदा उन्हें मिल रहा था, फिलहाल यह समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा है । ऐसे में मधेश में काँग्रेस को अपनी स्थिति साफ करने के लिए सप्तरी कांड की निष्पक्ष जाँच कराने के आदेश देने होंगे और दोषियों के लिए कड़े कदम उठाने होंगे ।
एक अहम सवाल मोर्चा के सामने भी है कि आखिर मोर्चा इस दुर्घटना को किसी तरह लेती है ? क्या अब भी उसे इंतजार करना चाहिए ? वैसे सात दिनों की मोहलत देकर मधेश के रोष का शिकार मोर्चा बन ही गई है । मधेशी जनता अपने बीच अपने नेता को देखना चाह रही है, जबकि अब तक ये सत्ता मोह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं । आखिर ये अपनी धरती पर क्यों नहीं जा रहे ? क्या कोई बाह्य दवाब है इन पर ? अगर कोई दवाब है भी तो फिलहाल इन्हें अपनी मिट्टी को तरजीह देनी चाहिए क्योंकि यही वक्त है खुद को साबित करने का । अगर इन्हें यह डर है कि समर्थन वापस लेने से एमाले फिर से सत्ता में आ जाएगी, तो इन्हें समझना चाहिए कि एमाले का आना मधेश के हक में ही होगा क्योंकि, या तो वो मधेश की अवहेलना करेगा या फिर उन्हें साथ लेकर चलना चाहेगा । ये दोनों ही पक्ष मधेश के हित में है । अगर अवहेलना करता है तो फिर आर–पार की लड़ाई होगी क्योंकि, यह तो साबित हो चुका है कि मधेश की आग शांत होने वाली नहीं है । वैसे अगर एमाले सही राजनीति जानते हैं, तो वो अवहेलना करने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि, इसका परिणाम वो भुगत चुके हैं और वह पुर्णतः बहुमत में भी नहीं है कि वो अपनी हिटलरशाही चला सके । राष्ट्रवाद के नारे के साथ चलने की सोच उन्हें लम्बी दूरी तय नहीं करने देगा यह भी उन्हें पता चल ही गया होगा । दूसरी स्थिति में अगर वो मधेश को साथ लेकर चलते हैं, तो भी मधेश के हक में ही होगा और यही राष्ट्र के हक में भी होगा । इसलिए मोर्चा को अपनी स्थिति स्पष्ट कर लेनी चाहिए । उन्हें किसी अनावश्यक दवाब में आने की आवश्यकता ही नहीं है । अगर वो चाहें तो मधेश की राजनीति उनके हाथों में है, जिसका प्रयोग कर वो मधेश को एक निश्चित दिशा दे सकते हैं । उन्हें अब अपनी परिवारवाद वाली राजनीति से बाहर आना होगा ।
जहाँ तक निर्वाचन का प्रश्न है तो वर्तमान परिस्थितियाँ निर्वाचन के अनुकूल तो बिल्कुल नहीं है । क्योंकि न तो आवश्यक पूर्वाधार की तैयारी है और न ही सही परिवेश ही है । परीक्षा की घड़ी सिर्फ सत्ता पक्ष के लिए ही नहीं है, बल्कि जो बाहर हैं उनके लिए भी है । एक सही निर्णय सही दिशा तय करेगी तो एक गलत निर्णय पूरी समीकरण और गणित बदल देगा ।
(जलता मधेश, रिसता दर्द : श्वेता दीप्ति , मार्च अंक)

