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मिथिलावासियों की शुक्रगुजार हूँ : मैथिली ठाकुर

maithili thakur
 

मुंबई में हाल ही संपन्न राइजिंग स्टार टैलेन्ट शो की उपविजेता मैथिली ठाकुर विराटनगर में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय मैथिल शिक्षाविद् सम्मेलन



maithili thakur
मैथिली ठाकुर

२०१७ में अति विशिष्ट अतिथि के तौर पर भाग ली थीं । सम्मेलन में मैथिली को यथार्थ विजेता और मैथिली भाषा एवम् मिथिला की संस्कृति का ‘यथार्थ दूत’ कहकर सम्मानित किया गया है । सम्मान के तौर पर उसे ३६ वर्ग फीट का ‘सम्मान का प्रमाणपत्र’ जिसमें प्रमुख अतिथि प्रा. डॉ. अरुण कुमार दास सहित आयोजकों एवं प्रायोजकों के हस्ताक्षर हैं । इसके अलावे उपरोक्त सम्मेलन में उमड़ी सैकड़ों प्रशंसक दर्शकों के भी हस्ताक्षर सम्मिलित हैं ।

मैथिली ठाकुर विलक्षण सुर और राग की मलिका के रूप में उभरी है । शास्त्रीय गीत–संगीत का जमाना जबकि अब पुराना हो चुका है, आधुनिक धूनों की दीवानगी नयी पीढी में कुछ ज्यादा ही लोकप्रियता हासिल कर ली है, परन्तु मैथिली ने इसे झूठा प्रमाणित करते हुए अपनी विशिष्ट गायकी से शास्त्रीय गायन शैली को नया जीवन देने का कार्य किया है । मैथिली अपनी विशिष्ट गायन–शैली के चलते गीत–संगीत से सम्मोहन पैदा करने की शक्ति रखती है । गीत–संगीत के दुनिया की बादशाहत रखनेवाले शंकर महादेवन व अन्य निर्णायकों ने उक्त शो में मैथिली ठाकुर की हर प्रस्तुति का खुलकर प्रशंसा करते नहीं थकते थे ।

ऐसा लगने लगा था कि इस शो की विजेता भी मैथिली ठाकुर ही बनेगी क्योंकि गाने से लेकर वोटिंग करने के लिए चेक–इन सबसे अधिक मैथिली के लिए होता था जो इस शो के एंकरों ने भी स्वीकारा था । अचानक ही ग्रान्ड फिनाले में तब अफरातफरी मच गई जब कुछेक तकनीकी गड़बडि़याँ होने के कारण प्रतिद्वन्द्वी का आवाज भी म्युट हो गया था । प्रतिद्वंद्वी बैनेट दोसाँझ को मिले वोट ६१५ पर क्लोज होने का संकेत भी आ चुका था ।

अन्तिम २ सेकेन्ड मे वोटिंग अचानक से ७७५ पर जाकर रुक गई जो मैथिली ठाकुर के ७६५ से १५ अधिक थी ।
इस प्रकरण से मैथिली के चाहनेवालों में भारी आक्रोश व असंतोष व्याप्त है और इसी का परिणाम है कि आज मैथिली के प्रशंसकों ने खुद ही उसे उस ऊंचाई पर पहुँचाने का संकल्प ले लिया है जो बड़े–बड़े गायकों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि महज गीत गाने की कला से किसी को प्राप्त हो सकता है । मैथिली सचमुच नाम के अनुरूप ही जानकी के हरेक स्वभाव को प्रस्तुत करती है – दहेज मुक्त मिथिला के अन्तर्राष्ट्रीय संयोजक व विराटनगर के उपरोक्त सम्मेलन के भी संयोजक प्रवीण नारायण चौधरी ने बार–बार यही प्रतिक्रिया देकर मैथिली ठाकुर की हौसला बढाते रहे थे । उनका कहना था कि मिथिलावासी खुद इतना अधिक सम्मान देंगे कि दुनियावाले फिर किसी दूसरे मैथिली के साथ इस तरह विवादपूर्ण निर्णय से बचेगी । इसी कार्यक्रम के सह–संयोजक एवं हिन्दुस्तान दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार वरुण मिश्र ने भी विवादित निर्णय पर असन्तोष जाहिर किये व मैथिली ठाकुर जैसी प्रतिभासंपन्न गायिका को विश्व प्रसिद्धि दिलाने के लिए दृढसंकल्प जाहिर किये । इसी सम्मेलन के दौरान हिमालिनी की प्रतिनि–ि माला मिश्रा के साथ मैथिली ठाकुर से हुई बातचीत का संपादित अंश प्रस्तुत है–
० यह विलक्षण सुर और साधना की मलिका कैसे बन सकी ?
– मैं ऐसे परिवार में पली–बढ़ी हूँ जिसके जर्रे–जर्रे में गीत–संगीत का वास है । मेरे दादाजी, मेरे पिताजी – दोनों ही संगीत के क्षेत्र में मंजे हस्ती हैं । और मुझे दादाजी के साथ सत्संग करने का भरपूर मौका बचपन से ही मिला । फिर बाद में पिताजी ने मेरी क्षमता को पहचानकर हीरे के तराशने जैसे मेरी गाने की कला को निखारा है । कठिन परिश्रम से ही यह संभव हो सका है, मैं ऐसा मानती हूँ ।
० इतनी कम उम्र में बड़े–बड़े स्टार शंकर महादेवन, विद्या बालन, अनिल कपुर और करोड़ों गीत–संगीतप्रेमियों को प्रशंसक पाकर कैसा लग रहा है तुम्हें ?
– सौभाग्य मानती हूँ । ऐसा लग रहा है कि गीत–संगीत और गायकी के लिए की गई कठिन तपस्या पूरा हुआ । बहुत अच्छा लग रहा है । ईश्वर के साथ प्रशंसकों और खासकर मिथिलावासियों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे प्रोत्साहित किये, कलर्स टेलिविजन और राइजिंग स्टार शो का आभारी हूँ जो मुझे यह सुनहरा अवसर मिला । सचमुच एक सुन्दर सपना पूरा होने जैसा अनुभव करती हूँ ।

० तुम्हें मिथिला से इतना लगाव कब से हुआ ?
– बचपन से ही मुझे विद्यापति स्मृति पर्व समारोहों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता रहा है । सचमुच ऐसे मौकों पर जब बड़े–बुजुर्गों से मिथिला की प्राचीनता, ऐतिहासिक उपलब्धियाँ, एक से बढ़कर एक विद्वानों, ऋषियों, मुनियों, जनक, जानकी से लेकर आजतक जो शिक्षा, संस्कार और स्वाभिमान का सद्गुण मिथिलावासियों में मुझे दिखा है यह अविस्मरणीय छाप छोड़ा है मेरे मानसपटल पर । जबकि आज मिथिला भूगोल में सिर्फ भावनाओं में जिन्दा है, परन्तु मुझे हमेशा यही प्रेरणा मिलता रहा कि अपनी मातृभूमि और मातृभाषा के लिए विश्वस्तर पर नाम को बढ़ाना है । हमारे यहाँ का गीतगायनी परम्परा और एक से बढ़कर एक लोकगीत जिसे मैं बचपन से गाती आ रही हूँ और इसे सुनकर मुझे अक्सर लोगों ने खूब वाहवाही–शाबाशी दिये, यही वजह है कि मैं मिथिलाभाव में खोए सी गई हूँ । मुझे अपने मातृभूमि मिथिला के लिए अभी और भी बहुत कुछ करना है ।
० गुरु कौन हैं तुम्हारे ?
– निस्सन्देह मेरे दादाजी और पिताजी मेरे गुरु हैं । गाने का अन्दाज से लेकर संगीत की बारीकियाँ हर कुछ मैंने इन्हीं से सीखी हूँ । घर में ही गुरु मिलने के कारण मेरी साधना भी सहजता से पूरी हो पायी है । आज भी मुझको पिताजी के निर्देशन में गाना अच्छा लगता है । किसी भी प्रस्तुति के बाद गलतियाँ कहाँ हुई यह सिखाते रहते हैं ।
० कितने भाई–बहन हो ? क्या औरों में भी संगीत और गायकी के प्रति तुम्हारे जितनी ही रुचि हैं ?
– मेरे दो छोटे भाई हैं । दोनों तबला बजाते हैं । वे भी मेरी तरह संगीत में उतनी ही रुचि रखते हैं । उन्हें भी दादाजी और पिताजी से सब कुछ सीखने को मिला है । जब मैं गाती हूँ तो वो तबला बजाकर संगीत का धुन पूरा करते हैं । हमलोग परिवार में ही संगीत की पूरी टोली मौजूद रहते हैं ।
० लाइव शो में तुमने अपनी पढ़ाई के बारे में भी गंभीरता दिखायी थी, अभी कहाँ और क्या पढ़ती हो ?
– फिलहाल मैं दिल्ली की बाल भवन इन्टरनेशनल स्कूल– द्वारका में १२ वीं कक्षा की छात्रा हूँ । ह्युमैनिटिज स्ट्रीम से पढ़ाई कर रही हूँ । पढाई में भी मेरी उतनी ही रुचि है जितना की संगीत में । पढाई में बेहतर करने से कला और संस्कार विकास में प्रगति मिलती है । मुझे अपने विद्यालय से स्कॉलरशीप भी मिलती रही है ।
० आगे गायिका तो बनोगी ही, और भी कुछ लक्ष्य है क्या ?
– यूपीएससी की तैयारी करूँगी । कुशल प्रशासक बनने का लक्ष्य है । गायन के क्षेत्र में तो करियर आगे बढाना है ही ।
० हिमालिनी के माध्यम से अपने हमउम्रों को और प्रशंसकों को क्या सन्देश देना चाहोगी ?
– कठिन परिश्रम से संसार में हर कुछ संभव हो पाता है । किसी भी लक्ष्य के लिए परिश्रम करना बहुत जरुरी होता है । चाहे पढ़ाई हो या कला विकास, हमें अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभव मेहनत करनी चाहिये । मेरी शुभकामना हिमालिनी के पाठकों के लिए, आपके लिए, मेरे सभी प्रशंसकों के लिए । व्

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प्रस्तुति, माला मिश्रा

 

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