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क्या ओली की बलपूर्वक रणनीति, चीनी सम्राट को दण्डवत प्रणाम करेगी ?

 

गीता कोछड़ जायसवाल/सीपु तिवारी

नेपाली प्रधान मंत्री खड़गा प्रसाद शर्मा ओली 1 9 से 24 जून, 2018 को चीन की आधिकारिक यात्रा करेंगे। यह यात्रा 29 मई को नेपाल में संघीय बजट के प्रस्तुत होने के बाद और चीन में एससीओ शिखर सम्मेलन जून 9 से 10 को आयोजित होने के बाद हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह यात्रा विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली  के चीन की यात्रा के बाद हो रही है। मुमकिन है उन्होंने संभावित समझौतों पर हस्ताक्षर के लिए माहौल बनाया हो। ओली के साथ इस यात्रा में गृह मंत्री राम बहादुर थापा, विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली, ऊर्जा मंत्री वर्षमान पुन, भौतिक निर्माण तथा परिवहन मंत्री रघुबीर महासेठ, प्रधान मंत्री के मुख्य सलाहकार बिष्णु रिजाल आदि होंगे। टीम की रचना नेपाल के मुद्दों की संभावनाओं को दर्शाता है और चीन का नेपाली बाज़ार में क्या रुचि है उसकी भी एक झलक नज़र आती है।

इस यात्रा में नेपाल-चीन निःशुल्क व्यापार समझौते पर संयुक्त व्यवहार्यता अध्ययन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर किए जाने की संभावना है, जो नेपाली बाजारों को चीनी सामानों के लिए खोल देगा। पहले से ही नेपाल चीन के संबंध में एक बड़ा व्यापार असंतुलन का संघर्ष चल रहा है, जो कि 20 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है। नेपाल की इस वक़्त आवश्यकता उत्पादन को बढ़ाने में मदद करने वाली नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना पर ध्यान केंद्रित करना है, जो निर्यात को बढ़ावा देने में मदद करेगी। हालांकि, नेपाल में औद्योगिक क्रांति होने की कमी के चलते, निःशुल्क व्यापार समझौते, विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के बजाय, नेपाल की अर्थव्यवस्था को चीन पर अत्यधिक निर्भर बना देगी।

ओली की यात्रा से पहले, चीन ने नेपाली प्रतिनिधिमंडलों की बाढ़ सी आ गई है। चीनी विश्वविद्यालयों के साथ समझौता करने का प्रतिनिधिमंडल, अधिक सीमा बिंदुओं पर समझौते पर हस्ताक्षर के लिए प्रतिनिधिमंडल, ट्रांजिट परिवहन समझौते को अंतिम रूप देने और पर्यटन में सहयोग के क्षेत्रों पर चर्चा करने के लिए प्रतिनिधिमंडल आदि। चीन-नेपाल के मौजूदा संबंधों का सबसे आकर्षक पहलू यह है कि जैसे-जैसे चीन में नेपाली लोगों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे चीनी जांच पदों और औपचारिक सीमा प्रविष्टि बिंदुओं में अधिक कठोर चेक पॉइंट्स की भी बढ़ोत्तरी हो रही है। आधिकारिक तौर पर, नेपाल तीन सीमा बिंदुओं का उपयोग करता है: केरुंग, किमाथंका और तातोपानी, जो तिब्बती राजमार्ग से जुड़े हुए हैं। तिब्बत के किनारे नौ और व्यापारिक बिंदु खोलने के लिए नेपाल उत्सुक है, जबकि चीनी पक्ष केवल सात व्यापारिक मार्ग खोलने पर सहमत है। मूल्यवान तथ्य यह है कि नेपाल सरकार के शीर्ष-प्रयास के बिना भी, नेपाल के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन के साथ वैकल्पिक व्यापार मार्ग बना हुआ है जिससे कम पैमाने पर व्यापार होता है, जो अब चीन वास्तविक आउटफ्लो और माल के प्रवाह पर जांच रखने के लिए कठोर सीमा पदों के रूप में बना रहा है।

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यात्रा का अन्य महत्वपूर्ण पहलू तेल और ऊर्जा समझौते है। नेपाल जो भारत से अपने तेल और ऊर्जा उत्पादों को आयात करने पर अत्यधिक निर्भर है, अपनी बढ़ती जरूरतों के अनुरूप और नेपाल के समग्र विकास को लाभान्वित करने के लिए वैकल्पिक विकल्प की खोज में है। तराई क्षेत्र में 2015 की नाकाबंदी के बाद नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं का आधार एक हॉकिश प्रवचन रहा है, जो भारत पर निर्भरता की नाभि को विच्छेदन करने के लिए कहता है। इस प्रयास में, नेपाल ने तेल आयात करने के लिए चीन के साथ जल्दबाजी में समझौते किए। चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना (बी.आर.आई. BRI) के मौलिक कारणों में से एक कारण चीन की ख़ुद की बढ़ती ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए तेल और पेट्रोलियम पाइपलाइन है। वहीं पर नेपाल चीन की ओर तेल की पाइपलाइन परियोजनाओं को पूरा करने और नेपाल को अधिक तेल आयात करने की उम्मीद से देख रहा है। ओली सरकार ने ‘2018 से 2028’ को ‘ऊर्जा दशक’ के रूप में देखने का फैसला किया है, ताकि अगले दस वर्षों में पर्याप्त ऊर्जा आपूर्ति हो सके। चीन से तेल आयात की उच्च उम्मीदों के साथ समस्या उन नियम और शर्तों पर है, जिन पर चीन ऋण प्रदान करेगा या निवेश करने के लिए समझौते करेगा। क्या नेपाल किसी भी उच्च ब्याज ऋण चुकाने का जोखिम उठा सकता है या क्या नेपाल उच्च ऋण जाल में घिर जाएगा ? वर्तमान स्थिति में नेपाल की आर्थिक विकास दर 4 से 5 प्रतिशत के आसपास है और 25 प्रतिशत से अधिक गरीब आबादी का बोझ है। इसलिए, नेपाल को उन परियोजनाओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और लोगों के समग्र जीवन पर स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं।

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इस यात्रा का उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी योजनाओं को बढ़ावा देना है, जो नेपाल में हाल ही में किए गए संघीय बजट का एक मुख्य आकर्षण भी था। यह उम्मीद की जा रही है कि परिवहन मंत्री तिब्बती राजमार्गों को जोड़ने के लिए चीनी पक्ष के साथ बातचीत करेंगे। यह ओली की ल्हासा यात्रा को चीन की पूरी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है। चीन उदारतापूर्वक अपने रेलवे नेटवर्क को तिब्बत से काठमांडू तक जोड़ रहा है, और कुछ राजमार्ग परियोजनाएं भी पाइपलाइन में हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि पीएम ओली ने भारत के साथ भी रेल कनेक्टिविटी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है, क्योंकि भारत-नेपाल ने भारत में रक्सौल और नेपाल में काठमांडू को जोड़ने के लिए एक नई विद्युतीकृत रेलवे लाइन बनाने का फैसला लिया है इसलिए, नेपाल के समग्र इंफ्रास्ट्रक्चर ढांचे को बढ़ावा देने के लिए ओली की दृष्टि स्पष्ट रूप से सामने आती है और ‘समृद्ध नेपाल’ के अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरी तरह बढ़ावा देती है।

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ओली की यात्रा से नेपाल की उम्मीदें विकास संबंधी जरूरतों पर आधारित है, मगर चीन को इन कनेक्टिविटी के कारण तिब्बतियों के प्रवाह और बहिर्वाह के मुख्य मुद्दों का सामना करना पड़ेगा। वास्तव में नेपाल चीन के गरीब क्षेत्रों और सबसे संवेदनशील क्षेत्र – तिब्बत की सीमा से जुड़ा है। नेपाल, चीन विरोधी गतिविधियों का समर्थन करने के लिए पश्चिमी वित्त पोषण केंद्र के साथ-साथ विशाल तिब्बती आबादी का केंद्र है।  चीन ऐसी गतिविधियों पर जांच रखने और रोक लगाने के लिए उत्सुक है, ना की आर्थिक विकास को पूरे क्षेत्र में फैलाने के लिए उत्तेजित। इसके अलावा, चूंकि चीन मध्य-आय वाले देश से एक आधुनिक उच्च तकनीक वाले देश में बदलाव करने के लिए आगे बढ़ रहा है, इसलिए उसकी अपनी घरेलू ज़रूरत है कि वह तिब्बत समेत अपने पश्चिमी क्षेत्रों का विकास करें, जहां विकास पूर्वी तटीय क्षेत्र के मुक़ाबले बहुत पिछड़ा है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी परिस्थितियों में, क्या चीन कनेक्टिविटी परियोजनाओं के माध्यम से नेपाल विकास एजेंडे का समर्थन करना चाहता है या उसका कोई गहरा राजनीतिक उद्देश्य है? अब प्रधान मंत्री ओली पर निर्भर है कि वह ‘समृद्ध नेपाल’ को वास्तविक रूप देने के लिए सभी दीर्घकालिक समझौतों में छोटे अक्षरों में लिखे गए नियम और शर्तों पर चीनी समकक्षों के साथ कड़े शब्दों में बातचीत करें और बलपूर्वक रणनीति (coercive strategy) का प्रयोग करें। नेपाल के लोग पीएम ओली से ये उम्मीद करते हैं कि वह चीन के प्रति अपने राजनयिक दृष्टिकोण में ‘नेपाल फर्स्ट’ डालें और चीनी सम्राट शी जिनपिंग के आगे दण्डवत प्रणाम (kowtow) ना करें।

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