चलेगी शरद की दादा’गिरी
कुशल राजनीतिज्ञ, आम जनता में पकड, कुशल रणनीति बनाने में माहिर, लोगों को सहज ही अपनी ओर आकषिर्त करने में सक्षम, आकर्ष व्यक्तित्व, विषय वस्तु की पर्याप्त जानकारी, लोकप्रिय ऐसे कई गुण हैं जिससे शरद सिंह भण्डारी समकक्षी अन्य नेताओं से अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। १४ बार मंत्री बनने के बाद अचानक दिए अपने एक बयान के कारण उन्हें मंत्री पद गंवाना पडा था। रक्षा मंत्री रहते हुए मधेश के बारे में दिए अपनी अभिव्यक्ति के कारण नेपाल की मधेश विरोधी मीडिया ने अतिरंजना के साथ उनके इस बयान को ऐसे पेश किया कि कांग्रेस एमाले सहित अन्य पार्टियों ने सरकार की नाक में दम कर दिया था। उनकी बढÞती हर्ुइ लोकप्रियता से घबराए उनकी ही पार्टर्ीीध्यक्ष विजय कुमार गच्छेदार को उन्हें ‘र्साईज’ में लाने का अच्छा मौका मिल गया। भारत भ्रमण की तैयारी में रहे प्रधानमंत्री विरोधी दलों के कडे तेवर को झेल नहीं पाए और उन्होंने शरद सिंह भण्डारी को हटाने का फरमान सुना दिया।
भण्डारी को हटाए जाने को लेकर उनकी ही पार्टर्ीीmोरम लोकतांत्रिक में काफी बवाल खडÞा हो गया। मधेश के मुद्दे पर पद गंवाने की नौबत आने के बाद अपने कुछ र्समर्थकों के साथ भण्डारी ने मधेश के मुद्दे को ही पकड कर आगे चलने की बात सोची। कांग्रेस से अपनी राजनीतिक की शुरूआत करने वाले भण्डारी गच्छेदार के साथ ही मधेश आन्दोलन के बाद उन्होंने फोरम नेपाल का दामन थामा था और चुनाव जीत कर आए थे। बदलती हर्ुइ हवा और मधेश में ही राजनीतिक आधार रहे भण्डारी को मधेशी पार्टर्ीीें जाना उचित लगा। आम जनता के बीच लोकप्रिय और उनके लिए सदा ही काम आने वाले शरद दादा को नहीं पता था कि उन्हें उनके सबसे बडे शुभचिन्तक और विश्वास पात्र गच्छेदार के द्वारा ही धोखा दिया जाएगा। मंत्री पद से हटाने के बाद उन्होंने मधेशी पत्रकार समाज के साथ मिलकर मधेश के कई जिलों में मधेश जागरण अभियान के तहत अपनी बातों को लोगों के बीच तक पहुंचाते गए। मधेशी मोर्चा के नेताओं ने भले ही उनका साथ नहीं दिया लेकिन मधेशी जनता को यह अहसास था कि मधेश के मुद्दे पर ही उन्हें मंत्री पद गंवाना पडा था इसलिए भण्डारी के प्रति आम मधेशी जनता में काफी आकर्षा बढ गया था। और राजनीति के माहिर खिलाडी माने जाने वाले भण्डारी को यह अच्छी तरह मालूम है कि राजनीति में यदि आप सक्रिय नहीं रहे तो आपका खेल खत्म होने में देरी नहीं लगती है। इसलिए कभी मधेश जागरण अभियान के तहत तो कभी अपने बयानों से हमेशा ही वे आम जनता और मीडीया में छाए रहे। उस दौरान लोगों की तरफ से और पार्टर्ीीें ही अपने र्समर्थकों के द्वारा काफी दबाब दिए जाने के बाद भी उन्होंने उस समय नई पार्टर्ीीी घोषणा नहीं की बल्कि पार्टर्ीीे भीतर ही अपने अधिकार की लर्डाई लडते रहे। कुछ दिनों तक वे अपनी पार्टर्ीीे खिलाफ लडते आए फिर उसके अध्यक्ष के खिलाफ इसलिए भी नहीं बोले क्योंकि प्रधानमंत्री और गच्छेदार दोनों के ही तरफ से उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि मामला शान्त होते ही उन्हें दुबारा मंत्री बना दिया जाएगा। इसी आस में भण्डारी ने खुल कर ना तो नई पार्टर्ीीा गठन ही किया और ना ही गच्छेदार के खिलाफ बगावत ही की। हां पार्टर्ीीे भीतर ही भीतर वो अपने पक्ष को और मजबूत करने की कवायद में लग गए। जैसा कि सभी मधेशी पार्टियों का हाल है उसी जैसा गच्छेदार की भी पार्टर्ीीें वही होता था जो कि वो खुद चाहते थे। यह विडम्बना कमोबेश हर पार्टर्ीीी है। हर मधेशी पार्टर्ीीसके अध्यक्ष का पर््राईवेट लिमिटेड जैसा हो गया है। इससे गच्छेदार भी अछूते नहीं थे और इसके कारण फोरम लोकतांत्रिक के कई सभासद और नेता उनसे असंतुष्ट थे। कुछ मंत्री नहीं बनाए जाने के कारण असंतुष्ट थे तो कुछ इसलिए थे कि उनसे जूनियर लोगों को मंत्री बना दिया गया। भण्डारी ने इस असंतुष्टि का पूरा फायदा उठाया और सभी नाराज नेताओं को अपना बनाने में जुट गए। इसी बीच भण्डारी के ही पहल पर वृहत मधेशी मोर्चा का भी गठन किया गया। इस मोर्चा को बार्गेनिंग के लिए बनाया गया था। हर तरह की बार्गेनिंग चाहे मधेश के मुद्दे पर हो या फिर सत्ता में भागीदारी को लेकर। लेकिन यह भी मामला जेठ १४ गते के बाद नहीं बन पाया।
इसी बीच भण्डारी और गच्छेदार के बीच की दूरी और बढती गई और भण्डारी को पार्टर्ीीें रखना गच्छेदार के लिए असंभव होता जा रहा था। गच्छेदार को पहले यह लगा कि शायद भण्डारी खुद ही पार्टर्ीीे अलग हो जाएंगे। लेकिन भण्डारी भी कोई कच्चा खिलाडी नहीं थे। इसलिए उन्होंने पार्टर्ीीारवाही का इंतजार करने लगे। फोरम लोकतांत्रिक से उन्हें निकाले जाने के बाद उन्होंने अपनी नई राजनीतिक शुरूआत करने की ठानी। भण्डारी को यह अच्छी तरह मालूम था कि राजनीतिक दल खोलना आसान है लेकिन उसे चला पाना काफी मुश्किल है। साथ ही उनके पास कई प्रकार की चुनैतियां थी। पार्टर्ीीोलें तो कैसा खोले, किस आधार पर खोले, अपने समुदाय को साथ रखे या फिर जहां पर उनका राजनीतिक आधार है वह कायम रखे। ऐसे कई सवाल थे, जिनसे भण्डारी को दो दो हाथ करना पडा। और भविष्य में भी करना पडेगा।
मधेश के मुद्दे पर मंत्री पद छोडने, चुनाव क्षेत्र मधेश ही रहने और उनके र्इद-गिर्द या उनके र्समर्थक नेता मधेशी ही होने के कारण वे इसका भरपूर फायदा उठाना तो चाहते थे लेकिन साथ ही वे उस समुदाय को भी नहीं छोडना चाहते थे जिसका वो प्रतिनिधित्व करते हों। उनके करीबी रहने वाले लोगों का मानना है कि राजनीतिक दल खोलने में हर्ुइ देरी के पीछे ऐसे ही कई कारण थे जो उनके लिए परेशानी का सबब बने हुए थे। उन्हें हमेशा इस बात का भय लगा रहेगा कि मधेश के लोग उन पर कितना विश्वास कर पाएंगे। जैसा कि रक्षा मंत्री का पद गंवाने के बाद कई लोग उनके मधेशी नेता होने पर सवाल खडे करते नजर आए। मधेशी मोर्चा के नेताओं का यह कहना था कि एक पहाडी होकर वह कैसे मधेश के नेता बन सकते हैं या फिर कहीं यह कांग्रेस-एमाले सरीखे मधेशी विरोधी दलों की कोई चाल तो नही है कि उनके दिए हुए बयान पर शोर शराबा कर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया जाए और इसकी सहानुभूति लेकर उन्हें मधेश का नयां नेता के रूप में स्थापित कर दिया जाए। इसी वजह से भी भण्डारी को जो र्समर्थन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया।
इस बात का डर भण्डारी को आगे भी सताता रहेगा। पहाडी समुदाय के होने के कारण मधेशी जनता उनका कितना विश्वास करेगी। कहीं ऐसा ना हो कि मधेश के मुद्दे को लेकर वे नयी पार्टर्ीीोले तो ना मधेशी जनता उन्हें पहाडी कह कर स्वीकार करे और मधेश का मुद्दा उठाने के लिए पहाडी समुदाय भी उनसे कन्नी काटने लगे। इसलिए भी उन्होंने अपनी नई पार्टर्ीीो मध्यमार्गी बनाने का फैसला किया है। राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टर्ीीामक दल की घोषणा की गई है। इस दल को समावेशी बनाने का दावा भी किया है। पार्टर्ीीो समावेशी और राष्ट्रीय बनाने के चक्कर में भी भण्डारी को घाटा लग सकता है। इस समय देश की जो राजनीतिक परिस्थिति है, उस में आप ढुलमुल रवैया नहीं अपना सकते हैं। राजनीति करने वाले सभी को अपना रास्ता स्पष्ट बताना होगा। दोनों नांव पर पैर रखने पर स्थिति कष्टदायक हो सकती है।
भण्डारी के सामने दूसरी बडी चुनौती यह है कि जिस तरीके से उन्हें मंत्री पद से हटाने के बाद एक खास समुदाय का होकर दूसरे समुदाय पर अपना दबदबा कायम करने की बात उठा कर फिर से उनके राह में रोडा ना खडा कर दे। मधेशी समुदाय हमेशा ही अपने कौम के बारे में अधिक संवेदनशील होती है। उनके मन में जरा भी यह बात घर कर गई कि एक दूसरे समुदाय का व्यक्ति उन पर शासन करने का प्रयास कर रहा है तो इसका नकारात्मक असर भण्डारी को भुगतना पड सकता है।
एक और बडी चुनौती यह है कि जिन लोगों के दम पर भण्डारी नई पार्टर्ीीा गठन कर आगे बढे हैं, उनके व्यक्तित्व और उनके आचरण पर भी बाद में सवाल किए जा सकते हैं। कल तक कभी उपेन्द्र यादव, कभी विजय कुमार गच्छेदार कभी अन्य दल में रहने वाले आज भण्डारी के साथ हैं। वैसे तो दल बदलना यहां की राजनीति में नई बात नहीं है लेकिन मुद्दों पर दल बदलना और कर्ुर्सर्ीीे लिए दल बदलना दो अलग अलग बातें है। भण्डारी के साथ आने वाले अधिकांश नेता के बारे में सभी लोग यह जानते हैं कि जिन लोगों को उपेन्द्र यादव और गच्छेदार के यहां कोई पद नहीं मिल पाया वही लोग अपना राजनीतिक अभीष्ट पूरा करने के लिए भण्डारी के साथ आए हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि भण्डारी के साथ जुडने वाले कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो सिर्फपैसों की खातिर ही उस पार्टर्ीीें है। उन्हें मालूम है कि भण्डारी के पास पैसे की कोई कमी नहीं है और अपनी पार्टर्ीीो बढÞाने और अपने यहां लोगों का जमावडा लगाने के लिए इस समय खुल कर खर्च भी कर रहे हैं तो इसी का फायदा उठाते हुए वैसे लोग भण्डारी के करीब जा रहे हैं।
वैसे तो भण्डारी एक मंझे हुए खिलाडी हैं इसलिए राजनीति में होने वाले नफा नुकसान को वे अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन फिर भी अच्छे-अच्छे दिग्गज के भी इस भंवरजाल में फंसने की खबर समय समय आती रहती है। भण्डारी के बारे में एक और बात सामने आई है कि वे इस बार अपना चुनाव क्षेत्र बदलने वाले हैं। पहले जिस चुनाव क्षेत्र से वे जीत कर आते थे वहां के मतदाता उनसे खफा हैं इसलिए वो चुनाव क्षेत्र बदलना चाहते है। दरअसल बात यह है कि जलेश्वर से सरकारी सेवा के कार्यालयों को बर्दिबास लाने का जो काम सरकार की तरफ से की गई थी, उस में भण्डारी की भी सक्रिय भूमिका रही है। इस बात की जानकारी जलेश्वर के मधेशी समुदाय के लोगों को मिलते ही उन का गुस्साना लाजिमी था। भण्डारी के भी क्षेत्र में लोगों को यह मालूम चला कि मधेश से सरकारी सेवा को पहाडी क्षेत्र में ले जाने के निर्ण्र्ाामें भण्डारी का ही हाथ है तो बाद में उनके द्वारा इस तरह की और भी बात हो सकती है। यह मधेश विरोधी कार्य होने के कारण भण्डारी का अपने ही क्षेत्र में लोगों के विरोध का सामना करना पडÞ सकता है।
लोगों का यह भी मानना है कि बर्दिबास में पहाडी समुदाय के लोगों को ही अधिक से अधिक फायदा पहुंचाने के लिए भण्डारी ने इसमें सक्रिय भूमिका निर्वाह की थी। बाहर से कर्ुता पायजामा चढाकर और जरूरत पडने पर मधेश के बारे में बडी बडी बातें करने और मधेशी को अपना बनाने के लिए हिन्दी में भाषण कर लोगों को अधिक दिनों तक नहीं भरमाया जा सकता है।
भण्डारी के मन में वाकई में यदि मधेश के प्रति दर्द है, मधेश के प्रति जज्बा है तो अपने दोहरे चरित्र को त्यागना ही होगा। अन्यथा सिर्फरक्षा मंत्री पद से हटाए जाने के कारण और गच्छेदार को परेशान करने और उनका राजनीतिक ह्रास करने के उद्देश्य से पार्टर्ीीा गठन किया गया है तो उनका भी हस्र औरों जैसा ही होगा।
शरद सिंह भण्डारी को प्यार से दुलार से उन्हें खुश रखने के लिए या फिर उन की चापलुसी करने के लिए उनके कार्यकर्ता, उनके पार्टर्ीीे नेता उनके चाहने वाले उन्हें शरद दादा कह कर पुकारते हैं। नेपाल की राजनीति में मधेश को आधार बनाकर अपनी नई पारी की शुरूआत करने वाले शरद की दादागिरी कब तक और कितने स्तर तक चलती है यह आने वाला समय ही बताएगा। उनके लिए यह राह आसान नहीं हैं। कहते हैं कि ये इश्क नहीं आसां इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। इस आग के दरिया में डूब कर निकल पाने में भण्डारी सफल हो पाते हैं या नहीं यह समय बताएगा।


