आम आदमी का संत्रास बयां करने वाले कवि विनय सौरभ : शहंशाह आलम
संथाल परगना का यह छोटा–सा गाँव ः नोनीहाट
जो असल में अब गाँव भी नहीं रहा
कÞस्बा कह सकते हो
लेकिन इसकी पहचान पर
अब शहर के कपड़े हैं
छोटे से बस स्टाप पर जब उतरोगे
पूछोगे मेरे यहाँ आने का रास्ता
वहाँ जलपान की दो चार दुकानें होंगी
तीन रिक्शे, पाँच ठेले और कुलियों की एक छोटी जमात
वही बताएँगे हाँ, कौन ?
वही, वैद्यनाथ बाबू का लड़का, जो दोहा करता है ।
– विनय सौरभ
कविता हरेक के बारे में हरेक बात की चश्मदीद होती है– एक कवि कितना बोलता है, कितना मौन रहता है । कितना इस जीवन को जीता है या कितना इस जीवन को मारता है । यह सच है, एक कवि अगर नादाँ कवि है, तो वह अपनी कविता में जीवन को मारता भी है, जीवन को बिना देखे जीवन के बारे में बेधड़क लिखते हुए । इसमें कुछ भी अचरज जैसा नहीं है कि कविता कवि–आत्मा की ध्वनि है, जिस ध्वनि को कवि सुनता है, उसे ही गुनता रहता है, कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम संगीत बनाते । कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम रंग बनाते । कविता को अपने लिए मनुष्य जाति का आदिम ढंग बनाते । अब जो बेढंग कवि होते हैं, वे ही तो रोजÞ कविता का जीवन खÞराब करते हैं । कोई बेढंग कवि कविता के बारे में यह नहीं मानता कि एक कविता चमचम बहती वह आदिम नदी है, जिसमें नहा धोकर हर कवि अपने को ताजÞादम करता रहा है, पूरी पवित्रता से । जबकि ढेर सारे बेढंग कवि इस चमचम बहती हुई आदिम नदी में बस अपने हिस्से का कचरा फेंकते जाते हैं । जिस तरह हम आप किसी नदी में जाकर अपने जीवन का कचरा बहा आते हैं और मान लेते हैं कि ऐसा करते हुए हमारा जीवन सफल, सार्थक, फलदाई हो गया । यह नहीं सोचते कि उस नदी का क्या हो गया । उस नदी का कितना कुछ हमने मैला कर दिया । ठीक वैसे ही कविता के नाम पर कचरा लिखने वाला कवि यह मान लेता है कि उसने जो लिखा, ऐसा तो कोई लिख नहीं रहा विश्व कविता में । यह कूड़ा करकट किसके काम आता है, खÞुद उस कवि के भी नहीं, जिसने कविता के नाम पर कूड़ा लिखा और कविता के जीवन के साथ साथ कविता का जादू, कविता का रहस्य, कविता का वायु तक खÞराब किया ।
संभव है, आप मेरे विचार से सहमत ना हों। संभव है, आपको मेरा लिखा कूड़ा ही लगता आया हो । तब भी यह निवेदन तो मैं कर ही सकता हूँ कि आप कविता लिखते हो, तो विनय सौरभ जैसी कविता लिखो । तभी कविता की यह आदिम बहती हुई नदी अनवरत बहती रहेगी । विनय सौरभ कविता संसार के उन कवियों में हैं, जिनकी हर कविता में यह चमचम आदिम नदी बहती दिखाई देती है, अपनी चमक थोड़ी और अधिक बढ़ाती हुई । विनय सौरभ की हर कविता में जीवन की ध्वनि सुनाई देती है । विनय सौरभ की हर कविता में आपका अपना परिवार दिखाई देता है, पिता की शक्ल में, माँ की शक्ल में, भाई की शक्ल में, बहन की शक्ल में, पत्नी की शक्ल में, बेटे बेटी की शक्ल में, दोस्त की शक्ल में । प्रेमिका के शक्ल में भी ः
घड़ी की टिक–टिक सुनाई पड़ रही है
और एक नल जो ठीक से बंद नहीं हुआ है
माँ के लगातार खाँसने की आवाजÞें हैं
बहनें इस घर से विदा ले चुकी हैं
बड़ा भाई आज की रात किसी दूसरे शहर में है
महेंद्र, मेरे बचपन का दोस्त जो अपने पिता की अप्रत्याशित मृत्यु के बाद बचपन से ही सब्जिÞयों के कारोबार में लगा था
अपने पिता की उम्र में ही दो महीने पहले मरा दर्दनाक तरीकÞे से
एक गोरखा गुजÞरा है सीटी बजाता हुआ गली से
पिता की तस्वीर पर जमी धूल सुबह पोंछूँगा
एक बंगाली मित्र की याद आ रही है
कब उसे उधार लेने की आदत पड़ गयी, पता नहीं
अब वह मुख्य रास्ते से कहीं नहीं आता जाता
जिन हरे भरे पहाड़ों के नीचे हमने साल का पहला दिन गुजÞारा
बदरंग और अजीब शक्लों का बना दिया उसे पहाड़चोरों ने
माँ की खाँसी थम नहीं रही है
रात एक पैंतालीस की हुई है ।
विनय सौरभ की कविता उस आदमी का संत्रास बयाँ करती है, जो आदमी अपने जीवन में जीवन की यातना सह रहा होता है । जो आदमी अपना सर्वस्व दाँव पर लगाए रहता है । जो आदमी विवश है । जो आदमी अभिशप्त है । जो आदमी कभी किसी झील का राजहंस नहीं हो पाता है । और जिस आदमी के पास कठिनाइयों से भरा जीवन जीने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है । लेकिन यह वह आदमी भी है, जिसे आपकी सहानूभूति नहीं चाहिए होती है । विनय सौरभ सहानूभूति चाहने वाले कवि हैं भी नहीं । ना आपकी कृतज्ञता इन्हें चाहिए होती है । विनय सौरभ ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास जी रहे, संघर्ष कर रहे, मर रहे आदमियों का अकेलापन देखते हैं, तो अपना वायलिन संभालते हैं और जीवन का कभी ना खÞत्म होने वाला राग छेड़ देते हैं । यही वजह है कि विनय सौरभ की दुनिया में यातना है, त्रासदी है, अकेलापन है, तनाव है, प्रेत है । लेकिन विनय सौरभ अपने आसपास की दुनिया का सारा घटित अघटित अपने बूते संभालते हैं । यानी जीवन का प्रेत ये अपनी कविता की शक्ति के बूते मार भगाते हैं । सच यही है, विनय सौरभ की कविता प्रकाश की कविता है, जिस प्रकाश में इनका पूरा मनुष्य÷संवाद यहाँ से वहाँ तक फैला हुआ दिखाई देता है। विनय सौरभ की अपनी धरती है। आकाश भी अपना है। सूरज भी, चाँद भी अपना है। पानी, पेड़, फूल, संगीत अपना है। विनय सौरभ की कविता खरगोश के बाल की तरह मुलायम है, तो खरगोश के दाँत की तरह तेजÞ और पैनी भी है । यानी विनय सौरभ अपने समकालीन कवियों में जÞ्यादा विलक्षण कवि हैं । यार और दोस्त कवि भी । विनय सौरभ एक यारबाजÞ और दोस्तबाजÞ कवि हैं, तभी इनकी कविता अपने आसपास के आदमियों से एक यार, एक दोस्त की तरह बतियाती हुई अपने घर तक पहुँचती है । यही वजह है, आप अगर अपने घर लौटते हुए लेट हो जाते हैं, तो आप अपने घर पहुँचने की देरी से घबराए हुए दिखाई नहीं देते । आपको पता है कि आपके घर लौटने से पहले विनय सौरभ की कविता आपके घर किसी अपने की मापिÞmक पहुँच चुकी होगी और आपकी खÞबर दे चुकी होगी कि आप जहाँ कहीं पर हैं, खÞैरियत और आपिÞmयत से हैं ः
तबादले का मतलब
एक शहर के जीवन से सभी चीजों का छूटना नहीं है
एक शहर से विदा होने का मतलब
स्मृतियों और यादों का समाप्त हो जाना नहीं है
मैं कमान से निकला हुआ तीर नहीं हूँ जो नहीं लौटूंगा फिर
मैं लौटूँगा तुम्हारे पास
पर उस तरह से नहीं
जैसे लौटकर आते हैं
हर बरसात में इस देश के कुछ हिस्सों में प्रवासी पक्षियों के समूह
या जैसे लौट आते हैं
बसंत के महीने में पेड़ों पर नए पत्ते
या शाम आती है जैसे
नहीं लौटूँगा उस तरह से
जीवन में उम्मीद और किनारों पर लहरों की तरह लौटूँगा
मैं तुम्हारी नींद में लौटूँगा
किसी सुंदर सपने की तरह
विनय सौरभ एक ऐसे कवि हैं, जो आपके सिर पर अगर तेजÞ धूप या तेजÞ बारिश हो रही है, तो अपना छाता आपको सौंपकर खÞुद तेजÞ धूप या तेजÞ बारिश में चलना पसंद करते हैं। ऐसा करना इन्होंने अपने पिता से सीखा है । पिता भी कैसे, जो ताँगा चलाते हैं, रिक्शा चलाते हैं, ठेला चलाते हैं, कारखÞाने में काम करते हैं, पान बेचते हैं, चाय बेचते हैं और जलेबी भी बेचते हैं । जीवन का जो ताना बाना विनय सौरभ अपनी कविता में बुनते हैं, सच है बहुत सारे कवि नहीं बुन पाते । ऐसा इसलिए कि जीवन को निकट से जो देखेगा, वही ना रचेगा सच्चे जीवन की कविता । और एक सच यह भी है कि सच्चा जीवन जलेबी की तरह मीठा तो कÞतई नहीं है रे भाई, ना रसमलाई की तरह मजÞेदार मोरे भय्या ! आपका जीवन सांगीतिक अनुष्ठान से भरा है, तो मेरी और विनय सौरभ की बला से । बाकियों का जीना आप वाला जीना थोड़े ही ना है, जो आप मुँह बिचकाए फिर रहे हैं, हमारे हमेशा परेशानियों से भरा जीने का तरीकÞा देखकर । लेकिन जो जीना आप जी रहे मलाई से भरा, वह तो एक तरह का पÞmजर्Þी जीना है । जो जीवन हमारे पिता जीते रहे, वही सच्चा जीना विनय सौरभ की कविता की असली ताकÞत है । हमारे पिता ही तो जीवन का असल सुर साधते रहे और अब विनय सौरभ साध रहे हैं अपनी कविता में । यही वजह है कि एक पिता का संघर्ष विनय सौरभ की कविता में एक स्थाई भाव की तरह आता रहता है । जीवन का विराट राग एक पिता में ही तो बजता रहा है । यह विराट राग बजता ही रहेगा, जब तक दुनिया बची हुई है पिता के काँधे पर सुरक्षित बिलकुल । तभी कौतुक हैं पिता, ‘तो तय था र पिता चले गए थे ÷ माटी हो चुके थे ÷ लेकिन दुनिया वैसी की वैसी रही ÷ विस्मय से भर गए हम ।’ विनय सौरभ सही ही तो कहते हैं, पिता मरकर भी जिÞंदा रहते हैं, ताँगा वाले की शक्ल में, रिक्शा वाले की शक्ल में, ठेला वाले की शक्ल में, मजÞदूर की शक्ल में ।
‘बूझो तो जानें’ की आवाजÞ अब अकसर गूँजती है । यह आवाजÞ आती कहाँ से है‘ ससंद के गलियारे से, विधान सभा के गलियारे से । ऐसे मुहावरे छोड़कर मुल्क के पालनहार अब भी नंगे पाँव चल रहे आदमी का मजÞाकÞ उड़ाते हैं, जबकि आम आदमी का तो सिपÞर्m पाँव नंगा रहता है, मुल्क के पालनहार पूरे ही नंगे होकर घूम रहे हैं विधान सभा से लेकर संसद तक । नंगा होकर नाच वे ही रहे हैं, भौंक भी वे ही रहे हैं, हग–मूत भी वे ही रहे हैं हमारे मुल्क की छाती पर । वे ही तो कितने पिताओं को एक रोटी तक के लिए तरसाते रहे हैं । पिता की हत्या तक करते रहे हैं । लेकिन पिता सबकुछ बूझते हैं, तभी पिता किसी राजधानी की तरपÞm टकटकी लगाए बैठे नहीं रहते, अपने साहस से अपने घर को रंगते रहते हैं और सत्ता का सुख मार रहे लोगों को इस तरह चिढ़ाते रहते हैं । विनय सौरभ भी एक अच्छे पिता की हैसियत से यही करते हैं और सत्ता के झूठ के बाजÞार को ढाते हैं, ‘हमारी दुनिया में ÷ कोई भी दृश्य साफ नहीं है ÷हत्यारे घूम रहे हैं खुलेआ ÷ और अखÞबारों में उनके भूमिगत होने के अनुमान हैं ÷ तह करके रखा हुआ अखÞबार ÷ काम के बाद घर लौटते पिता की नजÞरों से बचा लेना चाहता हूँ ।’ विनय सौरभ को पढ़ते हुए यह आपको कभी नहीं लगेगा कि इस कवि के भीतर कहीं कोई संशय दुबककर छिपा बैठा है । यह विनय सौरभ का आत्मसंघर्ष है, जो इन्हें हर संशय से दूर रखता आया है । यह सही भी है, कवि अगर संशय में रहेगा, तो उस कवि का आत्मसंघर्ष बिंदास पर्दे से बाहर कैसे आएगा । यही खÞास वजह है कि हम विनय सौरभ की कविता पढ़ते हुए यह कभी महसूस नहीं करते कि यह किसी डरे, सकुचाए, सहमे हुए की कविता है । बल्कि यह कविता उस नेपाली बहादुर की तरह है, जो खÞुद रात भर जागते हुए आपको अच्छी नींद देता आया है । यही खÞास वजह है कि विनय सौरभ हमेशा कविता को एक नया और असाधारण इलाका देते हैं । विनय सौरभ कविता की जो दुनिया बना रहे हैं, इस दुनिया में इनकी अपनी जीवन–दृष्टि है, जो दृष्टि इतना सारा कुछ हमारे घर के अंदर का घर की दीवारों को चीरते देख लेती है कि हमारे


