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स्त्री, अब न भटको : तूलिका मिश्र

 

 तूलिका मिश्र

स्त्री, अब न भटको लौट आओ अब माया मृगों के जाल से !!
झाड़ डालो अब बेकार सपनों के पराग,
होश में आओ और पहचानो उनको
जो तुम्हें ,तुम्हारी ताकतों को ढक कर
बेवजह देवियों के समकक्ष बैठाए हुए हैं.
ये सपने भरमाने वाले हैं,
तुम्हें अपनी असल क्षमताओं से दूर रखने वाले हैं ..
तुममे देवियों वाली मायावी शक्तियां नहीं
ना ही उन जैसी कोई जादुई छड़ी
जिसे घुमाते ही तुम नैसर्गिक सुखों में
विचरण करने लग जाओ.
हाँ, तुममे अपूर्व मानव शक्ति है,
असहनीय वेदना को सह कर
मानव होकर मानव को जन्म देने की ,
जनों के मर्म में उतरने की !!
जैसे प्रसव वेदना से पार उतारकर
मिलता है एक अवर्णनीय सुख,
पा जाओ बेबसी और मजबूरियों के पार जाकर,
अपने आप को साबित कर एक विलक्षण चरम सुख!!!
स्त्री , अब न भटको,
घर की चारदीवारी में रहने के अनुपम तारीफों में,
तुममे शक्ति है जीने की, जहाँ जीना, एक विवशता है!
उम्र की सारी ताकÞत लगा कुछ हासिल करने की—
जहाँ उम्र एक सजा है !
खुश होवो जÞरूर माँ, पत्नी और बहन होने के अलंकारों से,
पर अपने असीमित भुजाओं को खोलकर समेटो
विस्तृत संसार निज कर्म से
वो संसार जहाँ ज्ञान तुम्हारा गहना हो,
आत्मनिर्भरता तुम्हारा सम्मान,
जहाँ आत्मविश्वास तुम्हारा रक्षक हो
और साहस तुम्हारा गुमान !
स्त्री, जÞरूरी नहीं कि तुम सीता बनो
दुःशासनों के रक्त पान किये बिना चैन न लेने वाली,
तुम द्रौपदी बनो, नहीं है जÞरूरी, तुम हमेशा सुरमई गीत बनो
तुम अपने इज्जÞत से खेलने वालों पर
पांच उँगलियों का हस्ताक्षर बनो –
जिसकी गूंज भरी सभा में इतनी हो
कि हर मक्कारों के गाल पर अपनी एक अद्दृश्य छाप छोड़ जाये !
अब मत गीत गाओ अपने घर चलाने की महानता का,
वक्त आया अब विश्व को
अपनी सशक्त उँगलियों पर कराने नृत्य का !
करुणा की गंगा के संग अपनी आकांक्षाओं के समुद्र मंथन का
जिससे निकलेगी एक अभूतपूर्व स्त्री,
जो सौंदर्य और कोमलता ही से नहीं बल्कि ताकÞत ,
इज्जÞत, संकल्प और विश्वास से पूर्ण होगी !
तुम औरों के संग स्वयं के लिए कर्तव्यों को,
अपनी असंख्य भुजाओं से पूरी करते रहना,
और गर जो इंद्र अपनी माया से छलित करें
तो अहिल्या सी पाषाण नहीं,
बल्कि दुर्गा और काली सी अग्निमुखी, रौद्ररूपी बनना !
परंपरा निभाते हुए आधुनिकता के हर मापदंड पर खरी उतरने को,
स्त्री , तुम लौट आओ माया मृगों के जाल से अब न भटको !!

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